सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८८ सूरसागर सार सटीक हमरे गति-पति कमल-नयन की, जोग सिखैं ते रांड़े। कहौ मधुप कैसे समाहिँगे, एक म्यान दो खांड़े। कहु षट्पद कैसें खैयतु है, हाथिन कै संग गांड़े। काकी भूख गई बयारि भषि, बिना दूध घृत मांड़े। काहै कौं झाला लै मिलवत, कौन चोर तुम डांड़े। सूरदास तीनौ नहिं उपजत, धनिया, धान कुम्हांड़े ॥६६॥ अर्थ—आज पाण्डेय (पंडित) योग सिखाने आये है। (व्यावसायिक) सामग्रियों से लदे हुए बैल की तरह परामर्श तथा पुराणो को लादे हैं। हमारी गति (सम्बन्ध) कमल-नेत्र (कृष्ण) पति से है योग सीखने वाली (कुब्जा जैसी कोई अन्य पतिहीन) वेश्याये ही है। मधुप कहो, एक म्यान मे दो तलवार कैसे समा सकती है। हे भ्रमर, बताओ, हाथियो के साथ ईख के टुकडे कैसे खाये जा सकते हैं ? दूध-घृत और मीठी रोटी के बिना किसकी भूख हवा खाकर पूरी हुई है। क्यो अनर्गल बकवास करते हो, तुम कौन ऐसे चोर हो जिसे (झूठ बोलने के कारण) दण्डित किया जायेगा। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कि धनिया, धान और कुम्हडा तीनों एक समान भूमि पर नही उत्पन्न होते ॥६६॥ तीसरा संवाद ज्ञान बिना कहुँवै सुख नाहीँ । घट घट व्यापक दारु अगिनि ज्यों, सदा बसै उर माहीँ । निरगुन छांड़ि सगुन कौं दौरतिँ, मुधौं कहो किहिं पाहीँ । तत्व भजौ जो निकट न छूटै, ज्यौँ तनु तैं परछाई । तिहि तैं कहौ कौन सुख पायौ, जिहिं अव लौँ अवगाहीँ । सूरदास ऐसैं करि लागत, ज्यौँ कृषि कीन्हे पाहीँ ॥७०॥ अर्थ—ज्ञान के बिना कही भी सुख नही है। काठ मे गुप्त अग्नि की भांति वह घट-घट मे व्याप्त है तथा हृदय में सदा निवास करता है। निर्गुण को छोड़कर सगुण की ओर दोडती हो वह तो, कहो किसके पास है। शरीर से निकट परछाईं की भांति उस निकटतम (आत्मब्रह्म) की उपासना करो, वह (सन्निकट) छूटने (योग्य) नही है। उनसे क्या-क्या सुख पाया जिनका (जिन कृष्ण का) अब तक अवगाहन (अनुगमन) किया। सूरदास कहते है कि (उद्धव कहते हैं) यह ऐसे ही लगता है, जैसे पाहो (जोत से दूर बाहर की हुई खेती) मे की गई खेती ॥७०॥ ऊधौ कही सु फेरि न कहिए। जौ तुम हमें जिवायौ चाहत, अनबोले ह्वै रहिए। प्रान हमारे घात होत है, तुम्हरे भाऐं हाँसी। या जीवन तैं मरन भलो है, करवट लैहैं कासी।