सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ सूरसागर सार सटीक भवसागर तैं बूड़त राखै, दीपक हाथ धरै। सूर स्याम गुरु ऐसी समरथ, छिन मैँ ले उघरै ॥१३॥ अर्थ-गुरु के बिना ऐसी [कृपा] कौन कर सकता है ? [वे] माला और तिलक से युक्त मनोहर रूप धारण कर शिर पर छत्र धारण करते है। संसार-सागर मे डूबने से बचाने के लिए [वे] (ज्ञान रूपी) दीपक [शिष्य के] हाथ मे देते हैं। सूरदास कहते हैं कि हे श्रीकृष्ण, गुरु इतने समर्थ हैं कि एक क्षण मे ही सहारा देकर [इस संसार- सागर से] उबार लेते हैं ॥१३॥ नाम महिमा हमारे निर्धन के धन राम। चोर न लेत, घटत, नहि कबहुँ, आवत गाढैँ काम। जल नहिं बूड़त, अगिनि न दाहत, है ऐसौ हरि नाम। बैकुंठनाम सकल सुख-दाता, सूरदास-सुख-धाम ॥१४॥ अर्थ-निर्धनों के धन राम ही हमारे धन हैं। [यह धन ऐसा है कि] इसे चोर नही ले सकते, यह कभी घट नही सकता तथा कठिन परिस्थितियों में काम आता है। वह जल में नही डूबता, आग में नही जलता। भगवान् का नाम ऐसा [धन] है। वैकुण्ठधाम के स्वामी [विष्णु भगवान्] सब सुखो के देने वाले तथा सूरदास के सुखो के भण्डार हैं ॥१४॥ बड़ी है राम नाम की ओट । सरन गएँ प्रभु काढ़ि देत नहिं करत कृपा कैँ कोट। बैठत सबै सभा हरि जू की, कौन बड़ौ को छोट ? सूरदास पारस के परसैँ मिटति लोह की खोट ॥१५॥ अर्थ-राम नाम की आड़ (शरण) बहुत बड़ी है। शरण मे जाने से भगवान् भगा नही देते वरन् [शरणागत की] कृपा रूपी गढ़ मे सुरक्षा करते है। भगवान् की सभा में सभी [समान रूप से] बैठते (आश्रय पाते) हैं [वहां के लिए] कौन बड़ा, कौन छोटा ? सूरदास कहते हैं कि पारस के स्पर्श से लोहे का दोष (कुधातुत्व) मिट जाता है, [वह सोना बन जाता है]; अर्थात् राम नाम में मन लगाने या भगवच्छरणागति से बड़ा-से-बड़ा पापी भी साधु या भक्त बन जाता है ॥१५॥ जो सुख होत गुपालहिं गाऐँ। सो सुख होत न जप-तप कीन्हें, कोटिक तीरथ नहाऐँ। दिएँ लेत नहिं चारि पदारथ, चरन-कमल चित लाएँ। तीनि लोक तृन-सम करि लेखत, नँद-नंदन उर आएँ। बंसीबट, वृन्दावन, जमुना, तजि बैकुण्ठ न जावै। सूरदास हरि कौ सुमिरन करि, बहुरि न भव-जल आवै ॥१६॥