सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
पृष्ठ 26, कुल 359 में से
संदर्भ में पढ़ेंविनय तथा भक्ति २५ अर्थ—जैसा सुख गोपाल (श्रीकृष्ण) के गुण गाने से [प्राप्त] होता है, वैसा सुख जप, तपस्या तथा करोड़ों तीर्थों में स्नान करने से भी नही [प्राप्त] होता। भगवान् के कमलवत् चरणों में मन लग जाने पर चारों पदार्थ (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) को कोई देने से भी नही लेता। नन्द-नन्दन श्रीकृष्ण के हृदय में निवास करने लगने पर भक्त तीनों लोकों [की अखण्ड सम्पत्ति] को तृणवत् समझने लगता है। वंशी-वट (वह बरगद का पेड़ जिसके नीचे श्री कृष्ण बंशी बजाते थे), वृन्दावन तथा यमुना को छोड़ कर वह विष्णु-लोक भी नही जाना चाहता। सूरदास कहते है कि भगवान् का स्मरण करते रहने पर फिर [इस] संसार सागर मे नही आना पड़ता (जन्म-मरण के चक्र से छुट- कारा मिल जाता है) ॥१६॥ बिनती बंदौँ चरन-सरोज तिहारे। सुंदर स्याम कमल-दल-लोचन, ललित त्रिभंगी प्रान पियारे। जे पद-पदुम सदा सिव के धन, सिंधु-सुता उर तैँ नहिं टारे। जे पद-पदुम तात-रिस-त्रासत, मन-बच-क्रम प्रहलाद सँभारे। जे पद-पदुम-परस-जल-पावन, सुरसरि-दरस कटत अघ भारे। जे पद-पदुम-परस-ऋषि-पतिनी बलि, नृग, व्याध, पतित बहु तारे। जे पद-पदुम रमत वृन्दावन, अहि-सिर धरि, अगनित रिपु मारे। जे पद-पदुम परसि ब्रज-भामिनि, सरबस दै, सुत-सदन बिसारे। जे पद-पदुम रमत पांडव-दल, दूत भए, सब काज सँवारे। सूरदास तेई पद-पंकज, त्रिविधि-ताप-दुख-हरन हमारे ॥१७॥ अर्थ—हे कमल के दलों के समान नेत्रों वाले श्याम सुन्दर [वंशी-वादन के समय] रमणीय त्रिभंगी (गरदन, कमर और दाहिने पाँव मे तीन जगह बल वाली) मुद्रा वाले प्राण-प्यारे आपके कमलवत् चरणो की वन्दना करता हूँ। जो कमलवत् चरण शिव की शाश्वत सम्पत्ति है तथा जिन चरणों को लक्ष्मी जी अपने हृदय से नही हटाती जिन कमलवत् चरणो ने पिता के क्रोध से मन वचन कर्म से संत्रस्त प्रह्लाद की रक्षा की। जिन कमलवत् चरणो के स्पर्श से पवित्र जल वाली गङ्गा जी के दर्शन [मात्र] से बड़े-बड़े पाप कट जाते हैं। जिन कमलवत् चरणों के स्पर्श ने [गौतम] ऋषी की पत्नी (अहिल्या), बलि, नृग, व्याध आदि बहुत से पतितों को तार दिया। जिन कमलवत् चरणों से [भगवान् ने] वृन्दावन में विचरण किया और जिन चरणो को कालिय नाग के शिर पर रखकर असंख्य शत्रुओं का विनाश किया। जिन कमलवत् चरणों का स्पर्श कर व्रजांगनाओं ने [भगवान् को अपना] सर्वस्व देकर अपने परिजन तथा घर को भुला दिया, [तथा] जिन चरण कमलो से घूमते हुए [भगवान् ने] पाण्डवों के दूत बन कर [उनके] सभी कार्य सम्पन्न किये। सूरदास कहते हैं कि भगवान् के ऐसे जो चरण- कमल हैं वे हमारे त्रिविध (दैहिक, दैविक और भौतिक) तापो तथा दुखों का हरण करने वाले हैं ॥१७॥