सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ सूरसागर सार सटीक अब कैं राखि लेहु भगवान । हौं अनाथ बैठ्यो द्रुम-डरिया, पारधि साधे वान ! ताकैं डर मैं भाज्यौ चाहत, ऊपर ढुक्यौ सचान । दुहुँ भाँति दुख भयो आनि यह, कौन उबारै प्रान ? सुमिरत ही अहि डस्यौ पारधी, कर छूट्यौ संधान । सूरदास सर लग्यौ सचानहिं, जय जय कृपानिधान ॥१८॥ अर्थ—घोर संकट मे पड़ा हुआ पक्षी प्रार्थना करता है कि हे भगवान् इस वार (इस संकट से) बचा लीजिये । मैं अनाथ वृक्ष की शाखा पर बैठा हूँ, वधिक ने मेरे ऊपर वाण का सन्धान किया है। उसके भय से मै भागना चाहता हूँ [किन्तु] ऊपर वाज [मेरे लिए] ताक लगाए हुए है। दोनो ओर से यह [प्राणो का] संकट आ पड़ा है, कौन [इससे] प्राणो की रक्षा करे ? [इस प्रकार भगवान् का] स्मरण करते ही व्याध को सांप ने डस लिया और [पक्षी को मारने के लिए चढ़ा वाण छूट गया] [और] सूरदास कहते हैं कि [वह] बाण वाज को जा लगा। ऐसे कृपालु [भगवान्] की जय हो, जय हो ॥१८॥ आछौ गात अकार गारचौ । करी न प्रीति कमल-लोचन सौं, जनम जुवा ज्यौं हारचौ । निसि-दिन विषय-विलासनि बिलसत, फूटि गई तब चारचौ । अब लाग्यौ पछितान पाइ दुख, दीन, दई कौ मारचौ । कामी, कृपन, कुचील, कुदरसन, को न कृपा करि तारचौ । तातैं कहत दयाल देव-मनि, काहैं सूर बिसारचौ ॥१९॥ अर्थ—[मैने यह] सुन्दर [मानव] शरीर व्यर्थ मे ही नष्ट कर दिया। कमल नेत्र [भगवान् श्रीकृष्ण] से प्रेम नही किया [तथा इस दुर्लभ मानव] जीवन को जुए [के दाँव] की भांति हार गया (जीवन व्यर्थ मे ही समाप्त कर दिया) रात-दिन [सासारिक] विषय-सुखो की आसक्ति मे लीन रहा। उस समय [मेरी] चारो आँखे फूट गई थी (मेरी बाहरी दोनो आँखे तो फूटी है ही, विषयान्ध होने के कारण भीतरी-ज्ञान की-दोनों आँखे भी फूटी थी) । [परिणाम-स्वरूप] अब दीन-हीन बन कर भाग्य (दई) का मारा हुआ दुःखी होकर पश्चात्ताप करने लगा हूँ। कामासक्त कृपण मैले-कुचैले वस्त्रो वाले (गये- बीते) तथा अपवित्र दर्शन वाले [पापियो] मे भगवान् ने कृपा करके किसे नही (संसार सागर से) तारा ? इसीलिये हे दयालु, देव-देव [भगवन्] आप से फरियाद करता हूँ कि [इस] सूर को क्यों भुला दिया ? (मुझे भी कृपा करके तारिये) ॥१९॥ तुम बिनु भूलोइ भूलौ डोलत । लालच लागि कोटि देवन के, फिरत कपटनि खोलत । जब लगि सरबस दीजै उनकौं, तबहीं लगि यह प्रीति ।