भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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विनय तथा भक्ति २७ फल मांगत फिरि जात मुकर ह्वै, यह देवन की रीति। एकनि कौँ जिय-बलि दै पूजे, पूजत नैँकु न तूठे। तब पहिचानि-सबनि कौँ छाँड़े नख-सिख लौँ सब झूठे। कंचन मनि तजि काँचहिँ सैंतत, या माया के लीन्हे। चारि पदारथ हूँ को दाता, सु तौ विसर्जन कीन्हे। तुम कृतज्ञ, करुनामय, केसव, अखिल लोक के नायक। सूरदास हम दृढ़ करि पकरे, अब ये चरन सहायक ॥२०॥ अर्थ—हे प्रभु, प्राणी जब तक आपकी शरण में नही आता [तुम बिनु] वह निरंतर भ्रम मे पड़ा हुआ [विभिन्न योनियों मे या इधर-उधर] भटकता रहता है, लोभ- वश करोड़ों देवताओ के दरवाजे खटखटाता फिरता है। जब तक उन्हें (देवताओ को) सर्वस्व देते रहे तभी तक उनका प्रेम रहता है किन्तु फल की याचना करने पर वे मुकर जाते हैं (देने को तैयार नही होते) यही देवताओं का नियम है (अर्थात् वे लेना जानते है, देना नही)। कुछ देवताओं की जीवों की वलि देकर पूजा की गई, किन्तु पूजा करने से वे बिल्कुल सन्तुष्ट नही हुए। इस प्रकार सभी देवों को पहचान कर मैंने छोड़ दिया [समझ लिया कि] वे नख से शिख तक झूठे है। इस माया के वश मे होकर मैं [भगवान् रूप] स्वर्ण तथा मणि का त्याग करके [देव-रूप] कांच को समेटता रहा, चारों पदार्थों (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) के दाता भगवान् का परित्याग कर दिया। हे केशव, आप कृतज्ञ (भक्तो का उपकार मानने वाले या मनसा, वाचा, कर्मणा की हुई बातो के जानने वाले) कृपालु तथा सम्पूर्ण लोक के स्वामी हैं। सूरदास कहते हैं कि हमने भगवान् के चरणों को दृढ़तापूर्वक पकड़ा है, अब ये ही मेरे सहारे (सहायक) हैं ॥२०॥ आजु हौँ एक-एक करि टरिहौँ। कै तुमहीँ, कै हमहीँ माधौ, अपने भरोसैँ लरिहौँ। हौँ तो पतित सात पीड़िनि कौ, पतितै ह्वै निस्तरिहौँ। अब हौँ उघरि नच्यौ चाहत हौँ, बिरद बिन करिहौँ। कत अपनी परतीति नसावत, मैँ पायौ हरि हीरा। सूर पतित तबहीँ उठिहै प्रभु, जब हँसि दैहौ बीरा ॥२१॥ अर्थ—[हे प्रभु] आज मैं यह निपटारा करके ही मानूंगा कि [हम दोनों मे] किसकी जीत होती है। मैं अपने [पातित्य के] भरोसे मुकाबला करूँगा, [और] हे माधव या तो मैं ही [पतित] रह जाऊंगा, या तुम ही [पतित-पावन] रह जाओगे। मैं तो सात पीढ़ियों का (खानदानी) पतित हूँ [और] पतित रहकर ही [आप द्वारा भव-सागर से] उद्धार पाऊंगा (निस्तरि हौँ) अब मैं निरावरण होकर (निर्लज्ज होकर) नाचना चाहता हूँ, [जिससे] तुम्हे विरुद्ध, अर्थात् पतित-पावनता की कीर्ति, से विहीन, कर दूँगा। हे हरि, [मेरा उद्धार न करके भक्त-समाज में व्याप्त] अपना विश्वास क्यों नष्ट कर रहे