भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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२८ सूरसागर सार सटीक हो ? मैंने तो [तुम्हारी पतित-पावनता मे वज्रवत् सुदृढ, न टूटने वाला, विश्वास रूपी] हीरा पा लिया है। हे प्रभु, यह पतित सूर तभी उठेगा जब आप हंसकर उसे वीडा देगे अर्थात् प्रसन्न होकर उसे अपनी सेवा मे ले लेगे ॥२१॥ प्रभु, हौँ सब पतितनि कौ टीकौ । और पतित सब दिवस चारि के, हौँ तौ जनमत ही कौ । वधिक अजामिल, गनिका, तारी और पूतना ही कौ । मोहिं छांड़ि तुम और उधारे, मिटै सूल क्यों जी कौ । कोउ न समरथ अघ करिबे कौँ, खैँचि कहत हौँ लीकौ। मरियत लाज सूर पतितनि मे, मौहूँ तैँ को नीकौ ॥२२॥ अर्थ-हे प्रभु मैं सब पापियो से बढकर हूँ । और सभी चार दिन (थोडे दिनो) के ही पापी है [किन्तु] मै तो जन्म भर का पापी हूँ । आपने बधिक अजामिल, गणिका को और पूतना को भी तारा। मुझे छोड कर आपने जो अन्य पापियो का उद्धार किया मेरे हृदय की यह कसक कैसे मिटे ? मैं लकीर खीच कर कह रहा हूँ कि [मेरे बराबर] पाप करने की सामर्थ्य किसी मे नही है। सूरदास कहते है कि मैं इस लज्जा के मारे मरा जा रहा हूँ कि क्या पापियो मे कोई मुझसे भी बढकर है (जो पातित्य के आधार पर मुझसे पहले तारे जाने का अधिकारी हो गया) ? ॥२२॥ अब मैँ नाच्यौ बहुत गुपाल । काम-क्रोध कौ पहिरि चोलना, कठ विषय की माल । महामोह के नूपुर बाजत, निंदा-सब्द-रसाल । भ्रम-भोयौ मन भयौ पखावज, चलत असंगत चाल । तृष्ना नाद करति घट भीतर, नाना विधि दै ताल । माया को कटि फेटा बाँध्यौ, लोभ-तिलक दियौ भाल । कोटिक कला काछि दिखराई, जल-थल सुधि नहिं काल । सूरदास की सबै अविद्या, दूरि करौ नंदलाल ॥२३॥ अर्थ-हे गोपाल [माया के वश मे होकर] मैं बहुत नाच चुका । [नृत्य के साज के रूप मे] मैंने काम तथा क्रोध का जामा तथा कठ मे विषय वासनाओ की माला पहन रखी है। [मेरी इस गति से] महामोह के नूपूर बजते है, [जिनसे] निन्दा का रसीला शब्द निकलता है (जो माया से भ्रमित होने के कारण आनन्दप्रद जान पडते है) । भ्रम रूपी भोयन (आटा जो पखावज पर ध्वनि मे ठनक उत्पन्न करने के लिए लगाया जाता है) से युक्त मन रूपी पखावज (मृदंग) से शरीर के अन्दर तृष्णा रूपी नाद उत्पन्न होता है, जिसके विविध प्रकार के तालो पर बेमेल (विसंगत) गति से नाचता रहा हूँ। मैंने कमर मे माया रूपी फेंट बाँध लिया है तथा मरतक पर लोभ का तिलक दे रखा है। [इस प्रकार माया के वशीभूत होकर] मैंने जल तथा स्थल मे स्मरणातीत काल से करोडो