भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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२६० सूरसागर सार सटीक तरह समझेंगी। (हम) तुम्हारे चरण लगती हैं, इस प्रकार की बातों से उन्हें ही रिझाओ। यदि कृष्ण के पवित्र मित्र हो तथा मन मे सत्य भाव है तो बेचारे इन आतुर नेत्रों को कृष्ण का मुख लाकर दिखाओ । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) बल, विधि, विधा तथा व्यवसाय से कोई हजार प्रयत्न करे तब भी मछली के लिए जल के अलावा कोई अन्य उपाय नही है॥७३॥ ऊधौ बानी कौन ढरैगौ, तोसौँ उत्तर कौन करैगौ । या पाती के देखत हीं अब, जल सावन कौ नैन ढरैगौ । बिरह-अगिनि तन जरत निसा-दिन, करहिँ छुवत तुव जोग जरैगौ । नैन हमारे सजल हैं तारे, निरखत ही तेरौ ज्ञान गरैगौ । हमहिँ वियोगऽरु सोग स्याम कौ, जोग रोग सीँ कौन अरैगौ । दिन दस रहौ जु गोकुल महियाँ, तब तेरौ सब ज्ञान मरैगौ । सिंगी सेल्ही भसमऽरु कंथा, कहि अलि काके गरैं परैगौ । जे ये लट हरि सुमननि गूँधी, सीस जटा अब कौन धरैगौ । जोग सगुन लै जाहु मधुपुरी, ऐसे निरगुन कौन तरैगौ । हमहिं ध्यान पल छिन मोहन कौं, बिन दरसन कछुवै न सरैगौ । निसि दिन सुमिरन रहत स्याम कौ, जोग अगिनि मैं कौन जरैगौ । कैसहूँ प्रेम नेम मोहन कौं, हित चित तैं हमरैं न टरैगौ । नित उठि आवत जोग सिखावन, ऐसी बातनि कौन भरैगौ । कथा तुम्हारी सुनत न कोऊ, ठाढे ही अब आप ररैगौ । बादिहिं रटत उठत अपने जिय, को तोसौँ बेकाज लरैगौ । हम अंग अंग स्याम रंग भीनी, को इन बातनि सूर डरैगौ ॥७४॥ अर्थ-उद्धव ! (तुम्हारी) बात से कौन ढलेगा तथा तुमसे उत्तर (प्रत्युत्तर) कौन करेगा । इस पत्री को देखते ही नेत्र सावन के जल (की तरह पर्याप्त आंसू) बहायेंगे । रात-दिन विरह की अग्नि से शरीर जल रहा है, हाथ से छूते ही तुम्हारा योग जल जायेगा । हमारे नेत्र के तारे जल से भरे हैं, देखते ही तुम्हारा ज्ञान गल जायेगा । हमें वियोग तथा कृष्ण के विछोह का दुख है, योग रोग मे कौन अडेगा । यदि दस दिन (कुछ दिन) गोकुल मे रहो तो तुम्हारा सारा ज्ञान मृत हो जायेगा। श्रृङ्गी, योगी की माला, भस्म, कथरी (गुदड़ी) ये सब किसके गले लगेगा । जिनके इन बालो को कृष्ण ने फूलों से गूंथा था, वे अब सिर पर जटा कैसे घरेगी। अपने सुन्दर (गुण से भरे) योग को मथुरा ले जाओ, ऐसे निर्गुण से कौन तरेगा । हमे हमेशा कृष्ण का ध्यान रहता है, बिना दर्शन के कुछ भी सिद्ध नही होगा । रात दिन कृष्ण का स्मरण रहता है, योग अग्नि में कौन जलेगा । किसी भी प्रकार से कृष्ण का प्रेम, नियम तथा स्नेह मेरे चित्त से नही टलेगा । नित्य उठकर योग सिखाने आते हो, ऐसी बातो से कौन प्रसन्न होगा । तुम्हारी कथा को कोई सुनता नहीं, खड़े (खडे) आप व्यर्थ बकेंगे। अपने मन से तुम