सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउद्धव संदेश २८१ व्यर्थ ही रटते हो, बिना कार्य तुमसे कौन लड़ेगा । हम अंग-अंग से कृष्ण रङ्ग मे डूबी हैं, सूरदास (कहते हैं) तुम्हारी इन बातो से कौन डरेगा ॥७४॥ ऊधौ तुम ब्रज की दसा बिचारौ । ता पाछैं यह सिद्ध आपनी, जोग कथा बिस्तारौ । जा कारण तुम पठाए माधौ, सो सोचौ जिय माहीं । केतिक बीच विरह परमारथ, जानत हौ किधौं नाहीं । तुम परवीन चतुर कहियत हौ, सतत निकट रहत हौ । जल बूडत अवलंब फेन कौ, फिरि फिर कहा गहत हौ । वह मुसकान मनोहर चितवनि, कैसैं उर तैं टारौं । जोग जुक्ति अरु मुक्ति परम निधि, वा मुरली पर वारौं । जिहिं उर कमल-नयन जु बसत हैं, तिहिं निरगुन क्यौं आवै । सूरदास सो भजन बहाऊँ, जाहि दूसरौ भावै ॥७५॥ अर्थ—उद्धव, तुम ब्रज की दशा का विचार करो । उसके बाद अपनी इस सिद्ध योग कथा का विस्तार करो जिसलिए कृष्ण ने तुमको, भेजा है उसे मन में सोचो । विरह और परमार्थ मे कितना अन्तर है शायद उसे तुम नही जानते । तुम प्रवीण तथा चतुर कहलाते हो, संतो के निकट रहते हो । जल मे डूबते हुए फेन का सहारा कैसे लिया जा सकता है। वह मुस्कान तथा मनोहर चितवन हृदय से कैसे टालूं। योग की युक्ति तथा मुक्ति की परम निधि को उस मुरली पर न्योछावर करती हूँ । जिसके हृदय मे कमल के समान नेत्र वाले (कृष्ण) बसते हैं उसे निर्गुण क्यो आये । सूरदास कहते है (गोपियाँ कहती हैं) उस भजन को बहा दूँ (नष्ट कर दूँ), जिसे दूसरा अच्छा लगता (जिस भजन मे दूसरे का गुण-गान हो) है ॥७५॥ ऊधौ हरि काहे के अंतरजामी । अजहुँ न आइ मिलत इहिं अवसर, अवधि बतावत लामी । अपनी चोप आइ उड़ि बैठत, अलि ज्यौं रस के कामी । तिनकौ कौन परेखौ कीजै, जे हैं गरुड़ के गामी । आई उघरि प्रीति कलई सी, जैसी खाटी आमी । सूर इते पर अनखनि मरियत, ऊधौ पीवत मामी ॥७६॥ अर्थ—उद्धव ! कृष्ण किसलिए अन्तर्यामी है । आज भी इस अवसर पर आकर नही मिलते और लम्बी अवधि बताते है । अपनी इच्छा से रस का लोभी भ्रमर उड़कर आ बैठता है, वैसे ही कृष्ण का क्या भरोसा किया जाय जो गरुड पर चलने वाले हैं । जैसे खट्टी अमिया के संसर्ग से कलई उघर आती है, उसी प्रकार (तुम्हारे संदेश भिजवाने से) कृष्ण की प्रीति का रङ्ग उद्घाटित हो गया है । सूरदास कहते है कि इतने पर भी हम दुख से मरती हैं और उद्धव तुम इसे स्वीकार नही करते हो ! ॥७६॥