भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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२८२ सूरसागर सार सटीक निरगुन कौन देस कौ बासी ? मधुकर कहि समुझाइ सौंह दै, बूझतिं साँचि न हाँसी । को है जनक, कौन है जननी, कौन नारि, को दासी ? कैसौ बरन भेष है कैसौ, किहिं रस मैं अभिलाषी ? पावैगौ पुनि कियौ आपनौ, जो रे करैगौ गाँसी । सुनत मौन ह्वै रह्यौ बावरौ, सूर सब्रै मति नासी ॥७७॥ अर्थ—निर्गुण किस देश का निवासी है ? मधुकर (उद्धव) सौगंध देकर कहकर समझाओ, मैं सच्चाई से पूछती हूँ, हंसी नही है । (उसका) कौन पिता है; कौन माता है; कौन स्त्री है तथा कौन दासी है । कैसा रङ्ग है, कैसा वेष है, किस रस की अभि- लाषा करता है । यदि छल-छंद करते हो तो अपने किये का फल पाओगे । सूरदास कहते हैं, बावले से उद्धव सुनते ही चुप रह गये, उनकी सभी बुद्धि नष्ट हो गयी ॥७७॥ कहियौ ठकुराइति हम जानी । अब दिन चारि चलहु गोकुल मैं, सेवहु आइ बहुरि रजधानी । हमकौँ हौंस बहुत देखन की, संग लियें कुबिजा पटरानी । पहुनाई ब्रज कौ दधि माखन, बड़ौ पलँग अरु तातौ पानी । तुम जनि डरौ उखल तौ तोरचौ, दाँवरिहू अब भई पुरानी । वह बल कहाँ जसोमति कैं कर, देह रावरैं सोच बुढ़ानी । सुरभी बाँटि दई ग्व़ालनि कौं, मोर-चन्द्रिका सब्रै उड़ानी । सूर नद जू के पालागौँ, देखहु आइ राधिका स्यानी ॥७८॥ अर्थ—(उद्धव उनसे) कहना कि हमने (तुम्हारा) प्रभुत्व जान लिया । अब (दो) चार दिन के लिए गोकुल चलो फिर आकर राजधानी का सेवन करना । हमको साथ मे कुब्जा रानी को लिए हुए (कृष्ण को) देखने की बड़ी इच्छो है । ब्रज के दही- मक्खन का आतिथ्य, बड़ा पलंग और गर्म पानी (तुम्हें प्राप्त होगा) । तुम डरना मत ऊखल तो तोड़ दिया और उसकी रस्सी भी पुरानी हो गयी है । यशोदा के शरीर में वह बल कहाँ है और साथ ही, (क्योकि) तुम्हारे सोच मे बुड्ढी भी हो गयी हैं । गायो को ग्वालो को बाट दिया तथा सभी मोर चन्द्रिकाएँ उड़ गयी । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) (कृष्ण आकर) नद के चरण लगे तथा आकर सयानी राधा को देखे ॥७८॥ सुनि सुनि ऊधौ आवति हाँसी । कहँ वै ब्रह्मादिक के ठाकुर, कहँा कस की दासी । इंद्रादिक की कौन चलावै, संकर करत खवासी । निगम आदि बंदीजन जाके, सेष सीस के बासी । जाकैँ रमा रहति चरननि तर, कौन गनै 'कुबिजा सी । सूरदास-प्रभु दृढ़ करि बाँधे, प्रेम-पुज की पासी ॥७६॥ अर्थ—उद्धव ! सुन सुनकर हंसी आती है । कहां वे (कृष्ण) ब्रह्मादि के स्वामी