भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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२८६ सूरसागर सार सटीक अर्थ—हम तो कृष्ण के (साथ) क्रीडा (करने) की भूखी हैं। (हम) विरहिणियां विरह से दुखी होकर तुम्हारे निर्गुण को लेकर क्या करे ? क्या कहे हम यही नहीं जानती; बताइए योग किस योग्य है। तुम्हारे पैर पकडकर कहती हूँ, कि तुम्हारे ही समान उस पुरी में बावरे लोग बसते है। यदि आप तनिक चन्दन, आभूषण, श्रेष्ठ सुन्दर चीर अपने शरीर पर धारण करे तो, तब युवतियो को दंड-कमंडल, भस्म तथा अधारी (काठ के डंडे मे लगे हाथ टेकने की हत्थी) आदि दीजिये । सूरदास कहते है गोंपियों की दृढ़ता देखकर उद्धव ने दृढ़ व्रत प्राप्त किया। कृष्ण ने कृपा की जो कि मधुप (उद्धव) को प्रेम (का पाठ) पढ़ने को भेजा ॥८६॥ चौथा संवाद गोपी सुनहु हरि संदेस । कह्यौ पूरन ब्रह्म ध्यावहु, त्रिगुन मिथ्या भेष । मैं कहौं सो सत्य मानहु, सगुन डारहु नाखि । पंच त्रय-गुन सकल देही, जगत ऐसौ भाषि । ज्ञान बिनु नर-मुक्ति नाहीं, यह विषय संसार । रूप-रेख, न नाम जल-थल, वरन अवरन सार । मातु-पितु कोउ नाहिं नारी, जगत मिथ्या लाइ । सूर सुख-दुख नहीं जाकैं, भजौ ताकौं जाइ ॥८७॥ अर्थ—गोपी कृष्ण का संदेश सुनो ! (उन्होने) कहा है, पूर्ण ब्रह्म का ध्यान करो, त्रिगुणात्मक सृष्टि का रूप मिथ्या है। मैं जो कहता हूँ उसे सत्य मानो, सगुण को नष्ट कर डालो । समस्त जीव पांच तत्व तथा तीन गुण (से बने है), संसार को ऐसा कहो । ज्ञान के बिना मनुष्य की इस विषय युक्त संसार से मुक्ति नहीं है । जिसकी रूप-रेखा नहीं है तथा जल-थल मे न तो नाम है, वर्ण-अवर्ण ही सार तत्व है (उसके) माता, पिता तथा कोई स्त्री नहीं (वह) संसार को मिथ्या बनाया है । सूरदास कहते है (ऊधो कहते है) जिसके सुख-दुःख दोनो नहीं है उसे जाकर भजो ॥८७॥ ऐसी बात कहौ जनि ऊधौ । कमलनैन की कानि करति हैं, आवत बचन न सूधौ । बातनि ही उड़ि जाहिं और ज्यों, त्यौ' नाहीं हम काँची । मन, बच, कर्म सोधि एकै मत, नंद-नंदन रंग राँची । सो कछु जतन करौ पालागौँ, मिटै हियै की सूल । मुरलीधरहिं आनि दिखरावहु, ओढ़े पीत दुकूल । इनहीं बातनि भए स्याम तनु, मिलवत हौ गढ़ी छोलि । सूर बचन सुनि रह्यौ ठगौसौ, बहुरि न आयौ बोलि ॥८८॥ अर्थ—ऊद्धव, ऐसी बात मत कहो । कमल नेत्र कृष्ण की मर्यादा रखती हूँ, नही तो मुँह से सीधी बात न निकलती (गाली आती) । बातों से जो उड़ जाते है, वैसे हम