भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 257, कुल 359 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 257

उद्धव संदेश / २६७ कच्चो नहीं हैं । मन-वचन, कर्म से शोधकर (जांचकर) एक मत से कृष्ण के रंग मे रंगी हैं । पैर पडती हैं, तुम कुछ ऐसा यत्न करो जिससे हृदय का दुःख मिट जाय । पीताम्बर ओढ़े हुए कृष्ण को लाकर दिखा दो । इन्ही बातो से (उद्धव तुम) साँवले शरीर वाले हो गये जो बना संवारकर झूठी बात मिलाते हो । सूरदास कहते हैं उद्धव, इन वचनो को सुनकर ठगे से रह गये फिर बात नही फूटी ॥८८॥ फिरि फिरि कहा बनावत वात । प्रातकाल उठि खेलत ऊधौ, घर-घर माखन खात । जिनकी बात कहत तुम हमसौँ, सो है हमसौँ दूरि । ह्याँ हैं निकट जसोदा-नंदन, प्रान सजीवन मूरि । बालक संग लिएँ दधि चोरत, खात खवावत डोलत । सूर सीस नीचौ कत नावत, अब काहैँ नहिं बोलत ॥८६॥ अर्थ—बार-बार क्यो बात बनाते हो । हे उद्धव ! (कृष्ण) (हमारी समझ से वोही है) जो प्रातःकाल उठकर खेलते है तथा घर-घर माखन खाते है। जिन (निर्गुण) की बात हमसे कहते हो, वे हमसे बहुत दूर है। यहां तो प्राणो की संजीवनी मूल यशोदा-नंदन निकट हैं। वे बालको को साथ लिए दही चुराते है, खाते-खिलाते घूमते हैं। सूरदास कहते है (गोपियां कहती है) उद्धव, सिर नीचे क्यों नमित करते हो, अब क्यो बोलते नही ? ॥८६॥ फिरि-फिरि कहां सिखावत मौन । बचन दुसह लागत अलि तेरे, ज्यों पजरे पर लौन । सृंगी, मुद्रा, भस्म, त्वचा-मृग, अरु अवराधन पौन । हम अबला अहीरि सठ मधुकर, धरि जानहिं कहि कौन । यह मतं जाइ तिनहिं तुम सिखवहु, जिनहिं आजु सब सोहत । सूरदास कहूँ सुनी न देखी, पोत सूतरी पोहत ॥६०॥ अर्थ—वार-वार क्यो मौन (साधने की) शिक्षा देते हो । भ्रमर (उद्धव) तुम्हारे वचन दुसह लगते हैं जैसे जले पर नमक । श्रृंगी, मुद्रा, भस्म, मृग-छाला और प्राणायाम की आराधना हम अहीर की निर्बुद्ध अबलाये इसे धारण करना क्या जाने, तुम्ही बताओ । यह मत तुम उन्हें सिखाओ, जिन्हें आज सब अच्छा लगता है। सूरदास कहते है (गोपियां कहती है) सुतली से मोती पिरोते हुए, न तो हमने कही सुना है, न देखा है ॥६०॥ ऊधौ हमहिं न जोग सिखैयै । जिहिं उपदेस मिलैं हरि हमकोँ, सो ब्रत नेम बतैयै । मुक्ति रहौ घर बैठि आपने, निर्गुन सुनि दुख पैयै । जिहिं सिर केस कुसुम भरि गूँदे, कैसेँ भस्म चढ़ैयै ।