सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६८ सूरसागर सार सटीक जानि जानि सब मगन भई हैं, आपुन आपु लखैयै । सूरदास-प्रभु सुनहु नधौ निधि, बहुरि कि इहिं ब्रज अइयै ॥६१॥ अर्थ—उद्धव ! हमें योग न सिखाइये । जिस उपदेश से कृष्ण हमको मिलें,वही व्रत तथा नियम बताइए । मुक्ति अपने घर बैठी रहे तथा निर्गुण को सुनकर दुःख पाती हूँ । जिस सिर पर के बालो को फूलो से गूंथा उसमें भस्म कैसे चढ़ाया जाय । जान- जानकर सब मग्न हुई है, (कृष्ण) अपने आप को दिखाइए । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती है) हे नवों निधि (कृष्ण) सुनो, लौटकर फिर क्या इस ब्रज में आइयेगा ॥६१॥ मधुकर स्याम हमारे ईस । तिनकौ ध्यान धरैं निसि बासर, औरहिं नवै न सीस । जोगिनि जाइ जोग उपदेसहु, जिनके मन दस-बीस । एकै चित एकै वह मूरति, तिन चितवतिं दिन तीस । काहैं निरगुन ग्यान आपनौ, जित कित डारत खीस । सूरदास प्रभु नंद-नँदन बिनु, हमरे को जगदीस ॥६२॥ अर्थ—भ्रमर (उद्धव) ! कृष्ण हमारे ईश्वर हैं । उनका रात-दिन ध्यान करती हूँ अन्य के आगे सिर नही झुकाती । जाकर योगिनियो को उपदेश दीजिए, जिनके दस- बीस मन हैं । हमारे एक ही चित्त है वह कृष्ण की (अद्वितीय) एक मूर्ति है, उसे ही तीसो दिन (सदा) (मन) देखता रहता है । तुम अपने निर्गुण ज्ञान को इधर-उधर क्यो नष्ट किये देते हो । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कृष्ण के बिना हमारे कौन जगदीश हैं ॥६२॥ सतगुरु चरन भजे बिनु विद्या, कह कैसैँ कोउ पावै । उपदेसक हरि दूरि रहे तैं, क्यों हमरे मन आवै । जो हित कियौ तौ अधिक करहिं किन, आपुन आनि सिखावैं । जोग बोझ तैं चलि न सकैं तौ, हमहीं क्यौं न बुलावैं । जोग ज्ञान मुनि नगर तजे बरु, सघन गहन बन धावैं । आसन मौन नेम मन सजम, बिपिन मध्य बनि आवैं । आपुन कहैं करैं कछु औरै, हम सबहिनि डहकावैं । सूरदास ऊधौ सौं स्यामा, अति संकेत जनावैं ॥६३॥ अर्थ—सतगुरु के चरण की सेवा के बिना कहो, कोई कैसे विद्या प्राप्त करता है । उपदेशक कृष्ण के दूर रहने से उपदेश क्यों कर (उपदेश) मेरे मन मे आवे । जैसा हित (उन्होने) किया वैसा कौन करेगा, (किन्तु यदि वास्तव मे सीख देना ही हो तो) स्वयं आकर सिखा दे । योग के बोझ से यदि चल नही सकते तो हमें ही क्यो नही बुला लेते । योग के ज्ञान के लिए मुनियो द्वारा नगर छोड़कर वनो मे ध्यान किया जाता है । आसन, मौन, नियम, मन का संयम वन के बीच ही सिद्ध होते है । आप (कृष्ण) की कथनी-करनी