सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउद्धव संदेश २९९ में भिन्नता है, वे हम सबको बहका रहे हैं। सूरदास कहते हैं कि राधा उद्धव को (यह तथ्य) अत्यधिक संकेत से समझाती है ॥६३॥ ऊधौ मन नहिं हाथ हमारे । रथ चढ़ाइ हरि संग गए लै, मधुरा जबहिं सिधारे । नातरु कहा जोग हम छाँड़हिं, अति रुचि कै तुम ल्याए । हम तौ झँखति स्याम की करनी, मन लै जोग पठाए । अजहूँ मन अपनौ हम पावैं, तुम तैं होइ तो होइ । सूर सपथ हमैं कोटि तिहारी, कही करैंगी सोइ ॥६४॥ अर्थ—उद्धव ! मन हमारे (हाथ) वश में नहीं है । कृष्ण ने जब मथुरा के लिए प्रस्थान किया तो रथ पर चढ़ाकर उसे भी (मन को भी) साथ लेते गये, नही तो हम योग को कैसे छोड़ती, जिसे तुम अत्यधिक चाव से लाये हो । हम तो कृष्ण की करनी पर झुंझलाती हैं जो कि मन को लेकर बदले में योग भेज दिया । अब भी यदि हम अपना मन पा जायें, यदि आपसे कुछ सम्भव हो सके तो सूरदास कहते है (गोपियाँ कहती हैं) हमें तुम्हारी हजारों सोगन्ध है, (उसके बाद) जो कहोगे वही करूँगी ॥६४॥ ऊधौ मन न भए दस बीस । एक हुतौ सो गयौ स्याम संग, को अवराधै ईस । इंद्री सिथिल भई केसव बिनु, ज्यौं देही बिनु सीस । आसा लागि रहति तन स्वासा, जीवहिं कोटि बरीस । तुम तौ सखा स्याम सुंदर के, सकल जोग के ईस । सूर हमारैं नंद-नँदन बिनु, और नहीं जगदीस ॥६५॥ अर्थ—उद्धव ! हमारे दस बीस (अनेक) मन नहीं हुए । एक था वह कृष्ण के साथ चला गया, अब (निर्गुण) ईश्वर की आराधना कौन करे । कृष्ण के बिना इन्द्रियां शिथिल हो गयी, जैसे बिना सिर के देह । आशा से ही शरीर मे श्वास आती जाती है (सांस लगी है), (आशा में ही) सैकड़ों वर्ष जीवित रहूँगी । तुम तो कृष्ण के मित्र हो तथा समस्त योग के स्वामी हो । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कि कृष्ण के सिवाय हमारे कोई जगदीश (आराध्य) नहीं हैं ॥६५॥ इहिं उर माखन चोर गड़े । अब कैसैं निकसत सुनि ऊधो, तिरछे ह्वै जु अडे । जदपि अहीर जसोदा-नंदन, कैसैं जात छँड़े । ह्वाँ जादौपति प्रभु कहियत हैं, हमैं न लगत बड़े । को बसुदेव देवकी नंदन, को जानै को बूझै । सूर नंद-नंदन के देखत, और न कोऊ सूझै ॥६६॥ अर्थ—यहां हृदय में माखन चोर कृष्ण गढ़े हैं । ऊधो, अब वे कैसे निकल सकते है क्योंकि (वे) तिरछे होकर अड़ गये है । यद्यपि कृष्ण अहीर हैं (फिर भी) कैसे छोड़े