सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
पृष्ठ 260, कुल 359 में से
संदर्भ में पढ़ें३०० सूरसागर सार सटीक जा सकते है। वहाँ वे यादव पति स्वामी कहलाते हैं लेकिन हमे वटे नही लगते । कौन देवकी वसुदेव ( की बात करे ), फोन जाने तथा कौन समझे । सूरदास कहते हैं (गोपियाँ कहती है) कृष्ण को देखते और मुझे अन्य कोई नही सूझता ॥६६॥ मन मैं रह्यौ नाहिंन ठौर । नंद-नंदन अछत कैसैं, आनियै उर और । चलत चितवत दिवस जागत, स्वप्न सोवत राति । हृदय तैं वह मदन मूरति, छिन न इत उत जाति । कहत कथा अनेक ऊधौ, लोग लोभ दिखाइ । कह करौं मन प्रेम पूरन, घट न सिंधु समाइ । स्याम गात सरोज आनन, ललित मृदु मुख हास । सूर इनकेँ दरस कारन, मरत लोचन प्यास ॥६७॥ अर्थ—मन मे स्थान अवशिष्ट (बचा) नही है । कृष्ण के रहते हुए हृदय मे किसी और को कैसे लाया जाय ? चलते, देखते, दिन मे जागते, स्वप्न तथा रात मे सोते हृदय से वह कामदेव तुल्य (कृष्ण की) मूर्ति क्षण भर भी इधर-उधर नही जाती । उद्धव ! लोग लालच दिखाकर अनेक कथाये कहते है लेकिन क्या करूँ, मन प्रेम से पूर्ण है और घडे मे सागर समा (भी) नही सकता । श्याम शरीर, कमलमुख, ललित तथा मधुर हंसी के दर्शन के लिए नेत्र प्यासे मरते हैं ॥६७॥ मधुकर स्याम हमारे चोर । मन हरि लियौ तनक चितवनि मैं, चपल नैन की कोर । पकरे हुते हृदय उर अंतर, प्रेम प्रीत कैं जोर । गए छँड़ाइ तोरि सब बंधन, दै गए हँसनि अंकोर । चौंकि परीं जागत निसि बीती, दूत मिल्यौ इक भौंर । सूरदास प्रभु सरबस लुट्यौ, नागर नवल-किसोर ॥६८॥ अर्थ—मधुकर (उद्धव) ! कृष्ण हमारे (मन) को चुराने वाले हैं । चंचल नयनो के कोर से, क्षणिक निगाह से मेरे मन को चुरा लिया । हृदय के अन्दर प्रेम के बल से उन्हे पकड रखा था । हँसी का घूस ( अस्थायी सुख ) देकर, सारे वधनों को छुड़ाकर तथा (बधनो को) तोड़कर मुक्त हो गए । इसके बाद चौक कर जग पडी तथा रात जागते ही बीत गयी, बाद मे दूर पर एक भ्रमर (उद्धव) मिला । सूरदास कहते हैं (गोपियाँ कहती हैं) चतुर नवल किशोर कृष्ण सर्वस्व लूट ले गये ॥६८॥ सब दिन एकहिं से नहिं होतैं । तब अलि ससि सीरी अब ताती, भयो बिरह जरि मोतैं । तब षट मास रास-रस-अंतर, एकहु निमिष न जाने । अब औरै गति भई कान्ह बिनु, पल पूरन जुग माने ।