सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउद्धव संदेश ३०१ कह मति जोग ज्ञान साखा श्रुति, ते किन कहे घनेरे । अब कछु और सुहाइ सूर नहिं, सुमिरि स्याम गुनि केरे ॥६६॥ अर्थ- 'सभी दिन एक से नहीं होते । उद्धव ! तब चन्द्रमा शीतल लगता था, अब विरह-ज्वर में तप्त हो गया है। छह महीना रास रस के बीच (साथ) एक क्षण के समान भी नहीं लगता था, अब कृष्ण के बिना और ही दशा हो गयी। एक पल पूर्ण युग के समान मानती हूँ। (इस समय) योग, ज्ञान, वेद की शाखाओं में बुद्धि लगाने से क्या होता है तथा उनका घना उपदेश भी व्यर्थ है । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कृष्ण के गुणों का स्मरण करने के सिवाय कुछ सुहाता नहीं है ॥६६॥ सखी री स्याम सबै इक सार । मीठे बचन सुहाए बोलत, अंतर जारनहार । भँवर कुरंग काक अरु कोकिल, कपटिन की चटसार । कमलनैन मधुपूरी सिधारे, मिटि गयौ मङ्गलचार । सुनहु सखी री दोष न काहू, जो बिधि लिख्यौ लिलार । यह करतूति उनहिँ की नाहीं, पूरब बिबिध बिचार । कारी घटा देखि बादर की, सोभा देति अपार । सूरदास सरिता सर पोषत, चातक करत पुकार ॥१००॥ अर्थ-सखी सभी सांवले (लोग) एक समान हैं। (ऊपर से) सुहाने वाला मीठा बचन बोलते हैं, किन्तु अंतर में जलाने वाले होते हैं। भँवर, कुरंग (मृग), कौवा और कोयल, सब कपटियों की पाठशाला (के सदस्य) हैं । कमल के समान आंख वाले कृष्ण मथुरा चले गये, सारे मंगलाचार मिट गये । सखी सुनो ! किसी का दोष नहीं है जो भाग्य में लिखा होता है (वही होता है) । यह कार्य उन्हीं का ही नहीं है, विविध प्रकार से पूर्व निर्धारित विचार है। बादल की काली घटा देखो तो वह अपार शोभा देती है। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कि वह घटा नदी तथा तालाब को तो (जल से) पोषित (पूर्ण) करती है। लेकिन पपीहा पुकार ही करता रह जाता है ॥१००॥ बिलग जनि मानौ ऊधौ कारे । वह मथुरा काजर की ओबरि, जे आवैं ते कारे । तुम कारे सुफलक सुत कारे, कारे कुटिल सँवारे । कमलनैन को कौन चलावैं, सबहिनि मैँ मनियारे । मानौ नील माट तैँ काढे, जमुना आइ पखारे । तातैँ स्याम भई कालिंदी, सूर स्याम गुन न्यारे ॥१०१॥ अर्थ - उद्धव ! काले लोगों को अलग मत मानो। वह मथुरा काजल की कोठरी है, (वहाँ) से जो आता है वही काला होता है। तुम काले हो, सुफलक के पुत्र अक्रूर काले थे तथा कुटिल सांवले (कृष्ण काले हैं)। कमल नेत्र (कृष्ण) के लिए क्या कहा जाय, सभी में चमकीले हैं (बढकर हैं)। मानों वे (कृष्ण) नील के घडे से काढ़े