भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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३०२ सूरसागर सार सटीक

गये हैं तथा यमुना में आकर (शरीर) को धो लिया, इसी से यमुना काली हो गयी । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कृष्ण के गुण अनोखे हैं ॥१०१॥ ऊधौ भली भई ब्रज आए । विधि कुलाल कीन्हे काँचे घट, ते तुम आनि पकाए । रँग दीन्हौ हो कान्ह साँवरैँ, अँग-अँग चित्र बनाए । यातैँ गरे न नैन नेहु तैँ, अवधि अटा पर छाए । ब्रज करि आँवा जोग ईंधन करि, सुरति आनि सुलगाए । फूंक उसास विरह प्रजरनि संग, ध्यान दरस सियराए । भरे संपूरन सकल प्रेम-जल, छुवन न काहू पाए । राज काज तैँ गए सूर प्रभु, नंद-नंदन कर लाए ॥१०२॥ अर्थ—अच्छा हुआ उद्धव ! ब्रज चले आये । तुमने ब्रह्मा रूपी कुम्हार से बनाये गये कच्चे (शरीर रूपी) घडे को आकर पका दिया तथा कृष्ण के साँवले रंग मे रंग दिया तथा अंग-अंग से चित्र (कृष्ण के रूप चित्र) का निर्माण कर दिया । अवधि-रूपी अटारी के छाये हुए होने के कारण नेत्राश्रुओं के प्रवाह से गलने नही पाते । ब्रज को आंवा बनाकर, योग का ईंधन लगाकर स्मृति की आग सुलगा दी । विरह की ज्वालाओं के साथ उच्छ्वास (रूपी) हवा से फूंक दिया तथा दर्शन के ध्यान से शीतल कर दिया । सब (सम्पूर्ण घट) प्रेम के जल से भर गया है उसे कोई छूने नही पाता । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कृष्ण राज्य कार्य से चले गये । उद्धव ने कृष्ण के समान हाथ लगाकर (सँवार) दिया ॥१०२॥ जौ पै हिरदै माँझ हरी । तौ कहि इती अवज्ञा उनपै, कैसैं सही परी । तब दावानल दहन न पायौ, अब इहिँ विरह जरी । तब तैँ निकसि नंद-नंदन हम, सीतल क्यौं न करी । दिन प्रति नैन इंद्र जल बरषत, घटत न एक घरी । अति ही सीत भीत तन भींजत, गिरि अंचल न धरी । कर-कंकन दरपन लै देखी, इहिँ अति अनख मरी । क्यौं अब जियहिँ जोग सुनि सूरज,बिरहिनि विरह भरी ॥१०३॥ अर्थ – जो (यदि) कृष्ण हृदय के अन्दर हैं, तो कहो उन पर इतनी अवज्ञा कैसे सही जाती । तब दावानल से नही जलने पाए, अब विरह से जली (जा रही हूँ), हृदय से निकल कर कृष्ण ने हमे शीतल क्यो नही किया । दिन प्रति दिन नेत्र रूपी इन्द्र जल बरसाते हैं, एक भी घडी घटते नही; अत्यधिक शीतलता से भय युक्त शरीर भीगता है लेकिन (कृष्ण) अचल रूपी पर्वत को धारण नही करते । हाथ के कंकण को दर्पण लेकर देखा, यह शरीर झुंझलाहट से मृत हो गया है । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) विरह से भरी विरहिणियां योग को सुनकर कैसे जीवित रहे ॥१०३॥