भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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उद्धव संदेश ३०३ ऐसौ जोग न हम पै होइ । आँखि मूंदि कह पावैं ढूंढे, अँधरे ज्यौं टकटोइ । भसम लगावन कहत जु हमको, अंग कुकमा धोइ । सुनि कै बचन तुम्हारे ऊधौ, नैना आवत रोइ । कुंतल कुटिल मुकुट कुंडल छबि, रही जु चित मैं पोइ । सूर प्रभू बिनु प्रान रहें नहिं, कोटि करौ किन कोइ ॥१०४॥ अर्थ-हमसे ऐसा योग नहीं हो सकता। आँख मूंदकर अन्धे की तरह टटोल कर किसे ढूंढकर प्राप्त करूं। अंग के कुंकुम को धोकर जो हमको भस्म लगाने को कहते हो तो उद्धव तुम्हारे बचन को सुनकर हमारे नेत्र रो-रोकर रक्तिम हो गए है । कृष्ण के घुंघराले बालो की लट तथा मुकुट और कुंडल की शोभा चित्त में पिरोयी है । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कृष्ण के बिना प्राण नहीं रह सकते चाहे कोई सैकड़ो उपाय करे ॥१०४॥ हमसौँ उनसौँ कौन सगाई । हम अहीर अबला ब्रजवासी, वें जदुपति जदुराई । कहा भयौ जु भए जदुनंदन, अब यह पदवी पाई । सकुच न आवत घोष बसत की, तजि ब्रज गए पराई । ऐसे भए उहाँ जादौपति, गए गोप बिसराई । सूरदास यह ब्रज कौ नातौ, भूलि गए बलभाई ॥१०५॥ अर्थ-हमसे और उन (कृष्ण) से क्या सम्बन्ध है ? हम अहीर की लडकी ब्रज- वासी अबला है वे यदुराय तथा यदुपति है । यदुनंदन होने से क्या होता है, (उन्हें) यह पदवी (अभी हाल में) मिली है । उन्हे ब्रज छोडकर पराये गांव में बसते संकोच नहीं आता । ऐसे ही वहाँ यादव पति हो गये और गोपों को भुलाकर चले गये । सूरदास कहते हैं कि (गोपियां कहती हैं) इस ब्रज के नाते को कृष्ण भूल गये ॥१०५॥ तौ हम मानैँ बात तुम्हारी । अपनौ ब्रह्म दिखावहु ऊधौ, मुकुट पितांबर धारी । मनिहैं तब ताकौ सब गोपी, सहि रहिहैं बरु गारी । भूत समान बतावत हमकौँ, डारहु स्याम बिसारी । जे मुख सदा सुधा अँचवत हैं, ते विष क्यौं अधिकारी । सूरदास-प्रभु एक अंग पर, रीझि रहीँ ब्रजनारी ॥१०६॥ अर्थ-उद्धव ! हम तुम्हारी बात तभी मान सकती है, जब मुकुट तथा पीताम्बर को धारण किये हुये अपने ब्रह्म को दिखा दो । तब सभी गोपियां उसी के सम्बन्ध मे कहेगी बल्कि यहाँ तक कि गाली भी सह लेगी। भूत की तरह हमे ब्रह्म की बात बताते हो और कहते हो कि कृष्ण को भूल जाओ । जो मुंह सदा अमृत का पान करता है वह