सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०४ सूरसागर सार सटीक विष का अधिकारी कैसे हो सकता है। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कृष्ण के एक ही अंग पर ब्रज की स्त्रियां रीझ गयी हैं ॥१०६॥ ऊधौ जोग बिसरि जनि जाहु । बाँधौ गाँठि छूटि परिहै कहूँ, फिरि पाछैं पछिताहु । ऐसौ बहुत अनूपम मधुकर, मरम न जानै और । ब्रज बनितनि के नहीं काम कौ, है तुम्हारेई ठौर । जौ हित करि पठयौ मनमोहन, सो हम तुमकौं दीनौं । सूरदास ज्यौं विप्र नारियर, करहीं वंदन कीनौ ॥१०७॥ अर्थ- उद्धव ! योग को भूल न जाओ । (योग की) बँधी हुई गांठ कही छूट न पड़े, जिससे फिर पीछे पछताना पडे । मधुकर (यह योग) ऐसा अनुपम है, जिसका मर्म कोई और नही जानता । यह ब्रज की स्त्रियों के लायक नही है इसके लिए तुम्हारे ही पास स्थान है। जिसे स्नेह-पूर्वक कृष्ण ने भेजा है उसे हमने तुमको दे दिया । सूरदास कहते है ( गोपियां कहती हैं) ब्राह्मण के द्वारा दिये गये नारियल की तरह उसकी वन्दना मैंने हाथ से ही कर ली ॥१०७॥ ऊधौ काहे कौं भक्त कहावत । जु पै जोग लिखि पठयौ हमकौ, तुम्हहुँ न भस्म चढ़ावत । शृङ्गी मुद्रा भस्म अधारी, हमहीं कहा सिखावत । कुबिजा अधिक स्याम की प्यारी, ताहिँ नहीं पहिरावत । यह तौ हमकौँ तबहिँ न सिखयौ जब तैं गाइ चरावत । सूरदास प्रभु कौं कहियौ अब, लिखि-लिखि कहा पठावत ॥१०८॥ अर्थ--ऊधो ! तुम किसलिए (कृष्ण के) भक्त कहलाते हो, जो (कृष्ण ने) हमको योग लिखकर भेजा है तथा तुम भी भस्म चढाते हो (भस्म चढाने की बात करते हो) । शृंगी, मुद्रा, भस्म तथा अधारी हम ही को क्यो सिखाते हो । कुबरी कृष्ण को अधिक प्यारी है उसे क्यो नही पहनाते हो (सिखाते हो) । यह बात कृष्ण ने हमे उस समय नही सिखायो जब गाय चराते थे । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कृष्ण से कहना (अब) लिख-लिखकर (योग) क्यो भेजते है ॥१०८॥ (ऊधो) ना हम बिरहिनि ना तुम दास । कहत सुनत घट प्रान रहत हैं, हरि तजि भजहु अकास । बिरही मीन मरै जल बिछुरैं, छांड़ि जियन की आस । दास भाव नहिँ तजत पपीहा, बरषत मरत पियास । पंकज परम कमल मैं विहरत, बिधि कियौ नीर निरास । राजिव रवि कौ दोष न मानत, ससि सौं सहज उदास । प्रगट प्रीति दसरथ प्रतिपाली, प्रीतम कैं बनवास । सूर स्याम सौं दृढ़ ब्रत राख्यौ, मेटि जगत उपहास ॥१०६॥