सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउद्धव संदेश ३०५ अर्थ-उद्धव ! न तो हम विरहिणी हैं न तो तुम (कृष्ण) के दास हो । कहते सुनते शरीर मे प्राण रहता है, कृष्ण को छोड़कर शून्य को भजो । विरही मछली जल से बिछुड़ने पर जीने की आशा छोड़कर मर जाती है । पपीहा दास भाव को नही छोड़ता, पानी बरसते हुए भी प्यास से मरता है । (यद्यपि) कमल (पंकज) अत्यधिक (परम) जल (कमल) मे विहार करता है (प्रस्फुटित होता है) और विधाता ने उसे जल (नीर) से निराश कर दिया अर्थात् किरणों से जल को सीख लेता है, (तथापि) कमल सूर्य का दोष नही मानता, किन्तु चन्द्रमा से सहज ही उदास हो जाता है । दशरथ ने प्रियतम राम को वनवास देकर (प्राण देकर) प्रत्यक्ष प्रेम का पालन किया (गोपियाँ कहती हैं) हमने जगत का उपहास मिटाकर कृष्ण से दृढ़ व्रत रखा ॥१०८॥ ऊधौ लै चल लै चल । जहाँ वै सुन्दर स्याम बिहारी, हमकौँ तहँ लै चल । आवन-आवन कहि गए ऊधौ, करि गए हमसौँ छल । हृदय की प्रीति स्याम जू जानत, कितिक दूरि गोकुल । आपुन जाइ मधुपुरी छाए, उहाँ रहे हिलि मिल । सूरदास स्वामी के बिछुरैँ, नैननि नीर प्रबल ॥११०॥ अर्थ-जहां कृष्ण बिहारी है उधो वही हमको ले चलो । कृष्ण आने के लिये कह गये, किन्तु हम से छल ही कर गये । हृदय की प्रीति (यदि) कृष्ण जानते होते तो गोकुल कितनी दूर है (ही) (आ सकते थे) । स्वयं जाकर मथुरा मे छा गये वहाँ हिल- मिल कर रहने लगे । सूरदास कहते हैं (गोपियाँ कहती है) कृष्ण के बिछुड़ने से नेत्रो से प्रबल आंसू वह रहे हैं ॥११०॥ गुप्त मते की बात कहौं, जो कहौ न काहू आगैँ । कै हम जानैँ कै हरि तुम्हहूँ, इतनी पावहिँ माँगैँ । एक बेर खेलत वृन्दावन, कंटक चुभि गयौ पाइ । कंटक सौँ कंटक लै काढ़यौ, अपनैँ हाथ सुभाइ । एक दिवस बिहरत बन भीतर, मैं जु सुनाई भूख । पाके फल वै देखि मनोहर, चढ़े कृपा करि रूख । ऐसी प्रीति हमारी उनकी, बसतैँ गोकुल वास । सूरदास प्रभु सब बिसराई, मधुबन कियौ निवास ॥१११॥ अर्थ-रहस्य की बात कहती हूँ, जिसे किसी के आगे मत कहना । या तो हम जाने या तुम यही (एक) हमारी माँग (हमे) मिले । एक बार वृन्दावन मे खेलते हुए पांव मे कंटक चुभ गया । (कृष्ण ने) अपने सुन्दर हाथ से कंटक लेकर कंटक को काढा । एक दिन वन मे घूमते हुए मैंने जो भूख सुनाया तो (कृष्ण) पके हुए मनोहर फल को देखकर पेड़ पर चढ़ गये । गोकुल मे रहते हुए हमारी उनकी ऐसी प्रीति थी । २०