भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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३०६ सूरसागर सार सटीक सूरदास कहते है (गोपियां कहती हैं) कृष्ण ने मधुवन में निवास करते ही सब कुछ भुला दिया ।।१११।। ऊधौ जो हरि हितू तुम्हारे । तौ तुम कहियौ जाइ कृपा करि, ए दुख सबै हमारे । तन तरिवर उर स्वास पवन मैँ, बिरह दवा अति जारे । नहिं सिरात नहिं जात छार ह्वै, सुलंगि-सुलगि भए कारे । जद्यपि प्रेम उमंगि जल सींचे, वरषि-बरषि घन हारे । जौ सींचे इहिँ भाँति जतन करि, तौ एतैँ प्रतिपारे । कीर कपोत कोकिला चातक, बधिक वियोग विडारे । क्यौँ जीवैँ इहिँ भाँति सूर प्रभु, ब्रज के लोग विचारे ।।११२।। अर्थ—उद्धव ! यदि कृष्ण तुम्हारे हितैषी हैं तो उनसे जाकर कृपा करके कहना हमारे दुख इस प्रकार हैं । शरीर रूपी वृक्ष मे सांस रूपी पवन ने विरह की दावाग्नि को अत्यधिक प्रज्वलित कर दिया । न तो (शरीर) शीतल होता है न जलकर राख हो जाता है बल्कि सुलग-सुलग कर काला हो गया है । यद्यपि प्रेम ने उमगकर जल बरसाया तथा (आंखें रूपी वादल) वरस-वरस कर हार गये । जो इतने यत्न पूर्वक इसे सींचा तो (किसी तरह ये) बचा पायी । वियोग रूपी वधिक ने तोता, कबूतर, कोयल, चातक आदि को भगा दिया । सूरदास कहते है (गोपियां कहती हैं) इस प्रकार बेचारे ब्रज के लोग कैसे जीवित रहे ।।११२।। बिलग हम मानैँ ऊधौ काकौ । तरसत रहे बसुदेव देवकी, नहिं हित मातु पिता कौ । काके मातु पिता को काको, दूध पियौ हरि जाकौ । नंद जसोदा लाड़ लड़ायौ, नाहिं भयौ हरि ताकौ । कहियौ जाइ बनाइ बात यह, को हित है अबला कौ । सूरदास प्रभु प्रीति है कासौँ, कुटिल मीत कुविजा कौ ।।११३।। अर्थ—उद्धव, हम किस-किस बात का बुरा माने । (कृष्ण) वसुदेव तथा देवकी के लिये तरसते रहे (यशोदा नन्द) माता-पिता के हित को नही माना । कौन उनका माता-पिता है (माता-पिता वही है) जिनका कृष्ण ने दूध पिया है । नन्द तथा यशोदा ने कृष्ण को लाड़-प्यार किया लेकिन कृष्ण उनके नही हुए । जाकर कृष्ण से बात बनाकर कहना (हम) अबलाओं का (उनके) क्या हित है । सूरदास कहते है (गोपियां कहती है) कुब्जा के कुटिल मित्र कृष्ण को किससे प्रेम है ।।११३।। जीवन मुख देखे कौ नीकौ । दरस, परस दिन राति पाइयत, स्याम पियारे पी कौ । सुनौ जोग कहा लै कीजै, जहाँ ज्यान है जी कौ । नैननि गूँदि मूँदि कह देखौँ, बैवौ ज्ञान पोथी कौ ।