भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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उद्धव संदेश ३०७

आछे सुन्दर स्याम हमारे, और जगत सब फीकौ । खाटे मही कहा रुचि मानै, सूर खवैया घी कौ ॥११४॥ अर्थ—जीवन (तुल्य कृष्ण का) सुन्दर मुख देखने के लिए है । प्यारे कृष्ण का दर्शन तथा स्पर्श दिन रात पाती हूँ । सुनो योग लेकर क्या करूं जहां प्राण की भी हानि है । नैन मूंद-मूंदकर क्या देखूं तथा ज्ञान की पोथी से कैसे बंधूं । हमारे कृष्ण अच्छे तथा सुन्दर हैं और संसार में सभी फीके हैं । (गोपियां कहती हैं) घी के खाने वाले को खट्टा मट्ठा कैसे रुचिकर होगा ॥११४॥ अपने सगुन गोपालहिं माई, इहिं विधि काहूँ देति । ऊधौ की इन मीठी बातनि, निर्गु न कैसैं लेति । धर्म, अर्थ, कामना सुनावत, सब सुख मुक्ति समेति । काकी भूख गई मन लाडू, सो देखहु चित चेति । जाकौ मोक्ष विचारत बरनत, निगम कहत हैं नेति । सूर स्याम तजि को भूस फटकै, मधुप तुम्हारे हेति ॥११५॥ अर्थ—सखी अपने सगुण गोपाल को इस प्रकार कैसे दूं । ऊधो की इन मीठी बातों से निर्गुण को कैसे लूं ! धर्म, अर्थ तथा सब सुखो सहित मुक्ति की इच्छा (की बात) सुनाते हैं । मन मे विचार करके देखो मन के लड्डू से किसकी भूख जाती है । जिस मोक्ष को विचारते तथा वर्णन करते निगम उसे नेति-नेति कहते हैं। सूरदास कहते हैं (गोपियाँ कहती हैं) कृष्ण को छोड़कर (उद्धव) तुम्हारे लिये कौन भूसा फटके ॥११५॥ पांचवां सवाद वे हरि सकल ठौर के बासी । पूरन ब्रह्म अखंडित मंडित, पंडित मुनिन बिलासी । सप्त पताल ऊरध अध पृथ्वी, तल नभ बरुन बयारी । अभ्यंतर दृष्टी देखन कौं, कारन रूप मुरारी । मन, बुधि, चित, अहँकार दसेद्रिय, प्रेरक थंभनकारी । ताकैं काज वियोग बिचारत, ये अबला-ब्रजनारी । जाकौं जैसौ रूप मन रुचै, सो अपबस करि लीजै । आसन बैसन ध्यान धारणा, मन आरोहन कीजै । षट दल अठ द्वादस दल निरमल, अजपा जाप जपाली । त्रिकुटी संगम ब्रह्म द्वार भिदि, यौं मिलिहैं बनमाली । एकादस गीता श्रुति साखी, जिहिं विधि मुनि समुझाए । ते संदेस श्रीमुख गोपिनि कौ, सूर सु मधुप सुनाए ॥११६॥ अर्थ—वे कृष्ण सब जगह के निवासी (सर्वव्यापी) है । पूर्ण ब्रह्म अखड रूप से शोभित तथा पंडित तथा मुनि लोगों को विलसित करने वाला है । सात पाताल, पृथ्वी