सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१२ सूरसागर सार सटीक है। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कहां तक कहूँ (मैं अष्ट महासिद्ध (कृष्ण की) दासी हूँ ॥१२६॥ यह गोकुल गोपाल उपासी । जे गाहक निर्गुन के ऊधौ, ते सब बसत ईस-पुर कासी । जद्यपि हरि हम तजि अनाथ करि, तदपि रहतिं चरननि रस रासी । अपंनी सीतलता नहिं छोड़त, जद्यपि बिधु भयौ राहु-गरासी । किहिं अपराध जोग लिखि पठवत, प्रेम भगत तैं करत उदासी । सूरदास ऐसी को बिरहिनि, माँगि मुक्ति छोड़ै गुन रासी ॥१२७॥ अर्थ-उद्धव, यह गोकुल गोपाल का भक्त है। जो निर्गुण के ग्राहक है वे शंकर की पुरी काशी मे बसते हैं। यद्यपि कृष्ण ने हमें अनाथ करके छोड दिया तो भी चरणो के रस मे अनुरक्त रहती हूँ। चन्द्रमा राहु से ग्रसित होने पर भी अपनी शीतलता को नही छोडता । किस अपराध के कारण योग लिखकर भेजते है और प्रेम-भक्ति से उदा- सीन करते हैं । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कि ऐसी कौन विरहिणी है जो मुक्ति मांग कर गुण-राशि (श्री कृष्ण चन्द्र) को त्याग दे ॥१२७॥ ऐसौँ सुनियत द्वै बैसाख । देखति नहीँ व्यौँत जीवे कौ, जतन करौ कोउ लाख । मृगमद मलय कपूर कुमकुमा, केसर मलियै साख । जरत अगिनि मैं ज्यौँ घृत नायौ, तन जरि ह्वैहै राख । ता ऊपर लिखि जोग पठावत, खाहु नीम, तजि दाख । सूरदास ऊधौ की बतियाँ, सब उड़ि बैठी ताख ॥१२८॥ अर्थ-ऐसा सुना जाता है कि इस बार दो वैशाख (अतिरिक्त मास) पड़ गया है। जीने का कोई उपाय नही देखती हूं चाहे कोई लाख प्रयत्न करे। मृगमद (कस्तूरी), मलय, कपूर तथा कुकुम और केशर जो मले गये वे सब इसके साक्षी है, लेकिन यह सब जलती हुई अग्नि मे जैसे घी डाल दिया गया हो, शरीर जलकर भस्म हो गया। उसके ऊपर योग लिख कर भेजते हैं और अंगूर को छोड़कर नीम खाने को (कहते हो) । सूरदास कहते है उद्धव की सभी बाते उड़कर ताख पर बैठ गयी ? ॥१२८॥ इहिं विधि पावस सदा हमारैं । पूरब पवन स्वास उर ऊरध, आनि मिले इकठारैँ । बादर स्याम सेत नैननि मैं, बरसि आँसु जल धारै । अरुन प्रकास पलक द्युति दामिनि,गरजनि नाम पियारैँ । चातक दादुर मोर प्रकट ब्रज, बसत निरंतर धारैँ । ऊधव ये तब तैँ अटके ब्रज, स्याम रहे हित टारैँ । कहिए काहि सुनै कत कोऊ, या ब्रज के व्यौहारैँ । तुमही सौं कहि-कहि पछितानी, सूर बिरह के धारैँ ॥१२९॥