सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउद्धव संदेश ३१३ अर्थ—इस प्रकार सदा हमारे (साथ) वर्षा ऋतु है। हृदय के ऊपर सांस रूपी पुरवा हवा आकर एक स्थान पर मिलती है। आंखों की काली तथा सफेद पुतलियो रूपी बादल आंसू जल बरसाते हैं । (आंखो की) ललाई का प्रकाश तथा पलक रूपी बिजली की चमक है तथा कृष्ण के नाम की गर्जना है। चातक, मेढक, मोर, ब्रज मे आकर निरन्तर बसते हैं। ऊधो, ये सब तभी से ब्रज मे अड़ गए है, किससे कहा जाय तथा ब्रज के इस व्यवहार को सुनता ही कौन है। सूरदास कहते है (गोपियां कहती हैं) कि तुम्ही से कहकर पछतायी (रूप) विरह को कौन धारण करे ॥१२६॥ ऊधौ कोकिल कूजत कानन। तुम हमकौँ उपदेश करत हौ, भस्म लगावन आनन । औरौ सिखी सखा सँग लै लै, टेरत चढ़े पखानन । बहुरौ आइ पपीहा कैँ मिस, मदन हनत निज बानन । हमतौ निपट अहीरि बावरी, जोग दीजिएै जानन । कहा कथत मौसी के आगेँ, जानत नानी नानन । तुम तौ हमैँ सिखावन आए, जोग होइ निरवानन । सूर मुक्ति कैसैँ पूजति है, वा मुरली के तानन ॥१३०॥ अर्थ—उद्धव, जंगल में कोयल कूकती है। तुम हमको मुख पर भस्म लगाने का उपदेश करते हो। मोर अपने मित्रों को लेकर पहाड़ों पर चढ़कर टेरते हैं। फिर पपीहा के बहाने आकर कामदेव अपने बाणों से हनता है। हम तो विल्कुल बावली अहीर की लड़कियां हैं अतः योग की शिक्षा ज्ञानियों को दीजिये। मौसी के आगे नानी-नाना की क्या बात करते हो (वह तो उन्हें जानती ही है)। तुम तो हमे सिखाने आये हो कि योग से निर्वाण होगा किन्तु मुक्ति मुरली की तानो से कैसे बराबरी कर सकती है ॥१३०॥ हमतैँ हरि कबहूँ न उदास । रास खिलाइ पिलाइ अधर रस, क्योंँ बिसरत ब्रज बास । तुमसौँ प्रेम कथा कौँ कहिबौ, मनौ काटिबौ घास । बहिरौ तान-स्वाद कह जानै, गूँगौ बात मिठास । सुनि री सखी बहुरि हरि ऐहैँ, वह सुख वहै बिलास । सूरदास ऊधौ अब हमकौँ, भए तेरहौँ मास ॥१३१॥ अर्थ—कृष्ण हमसे कभी भी उदास नही थे। रास खेला कर तथा ओठों का रस पिलाकर ब्रज का निवास क्यों भूलते हैं। तुमसे प्रेम कथा कहना मानो घास काटना है। बहरा तान के आस्वाद को क्या जाने तथा गूंगा बात की मिठास क्या जाने । सखी सुनो, कृष्ण फिर आयेगे; फिर वही सुख तथा विलास होगा। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) अब हमको (कृष्ण को देखते-देखते) तेरह महीने हो गये। (कृष्ण के आने की अवधि बीत गई) ॥१३१॥