भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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३१४ सूरसागर सार सटीक आयौ घोष बड़ी ब्यौपारी । खेप लादि गुरु ज्ञान जोग की, ब्रज मैं आनि उतारी । फाटक दै कै हाटक माँगत, भोरी निपट सुधारी । धुरही तैं खोटो खायौ है, लिये फिरत सिर भारी । इनके कहे कौन डहकावै, ऐसी कौन अनारी । अपनी दूध छोड़ि को पीवै, खारे कूप को बारी । ऊधौ जाहु सबारैं ह्याँ तैं, वेगि गहरु जनि लावहु । मुख माँगी पैहौ सूर प्रभु, साहुहिं आनि दिखावहु ॥१३२॥ अर्थ—गाँव मे एक बढा व्यापारी आया है। भारो ज्ञान रूपी खेप (सामान) लादकर ब्रज मे लाकर उतारा है। फटकन देकर सोना मांगता है, वह सीधा और भोला है। शुरू से ही व्यापार मे घाटा हुआ है। अतः वह सिर पर भारी बोझ लेकर घूम रहा है। इसके कहने से कौन बहकेगा ऐसा कौन मूर्ख है। अपने दूध को छोडकर खारे कुये का पानी कौन पियेगा। ऊधो यहाँ से शीघ्र ही चले जाओ, विलम्ब मत करो। कृष्ण रूपी साहू को ले आकर दिखा दो, मुंह मांगा मिलेगा ॥१३२॥ ऊधौ जोग कहा है कीजतु । ओढ़ियत है, कि बिछैयत है, किधौँ खैयत है किधौँ पीजत । कीधौँ कछू खिलौना सुंदर, की कछु भूषन नीकौ । हमरे नंद-नंदन जो चहियतु, मोहन जीवन जी कौ । तुम जु कहत हरि निगुन निरंतर, निगम नेति है रीति । प्रकट रूप की रासि मनोहर, क्यों छोड़ै परतीति । गाइ चरावन गए घोष तैं, अबहीं हैं फिरि आवत । सोई सूर सहाइ हमारे, बेनु रसाल बजावत ॥१३३॥ अर्थ—उद्धव, योग का क्या किया जाय। ओढ़ा जाय, या बिछाया जाय; खाया जाय कि पिया जाय। क्या यह कोई सुन्दर खिलौना है कि कोई सुन्दर आभूषण है ? हम कृष्ण को चाहती हैं तथा मोहन प्राणो को जीवित रखने वाले हैं। तुम जो कहते हो कि ब्रह्म (कृष्ण) निर्गुण है तथा निगम उसके विषय मे नेति की रीति का (प्रतिपादन करते हैं) । (हमने) प्रत्यक्ष कृष्ण के रूप राशि को देखा है, इससे हमारा मन विश्वास क्यो छोडे। गांव (वह) गाय चराने गए है तथा अभी आते होगे। सूरदास कहते है (गोपियां कहती है) वही हमारे सहायक है, (वह) रसयुक्त बंशी बजाने वाले है ॥१३३॥ अपने स्वारथ के सब कोऊ । चुप करि रही मधुप रस-लंपट, तुम देखे अरु ओऊ । जो कछु कह्यौ कह्यौ चाहत हौ, कहि निरवारौ सोऊ । अब मेरैँ मन ऐसियै षटपद, होनी होउ सु होऊ ।