भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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उद्धव संदेश ३१५ तब कत रास रच्यौ वृन्दावन, जौ पै ज्ञान हुतोऊ । लीन्हे जोग फिरत जुवतिनि मैं°, बड़े सुपत तुम दोऊ । छुटि गयौ मान परेखौ रे अलि, हृदै हुतौ वह जोऊ । सूरदास प्रभु गोकुल विसरयौ, चित चिंतामनि खोऊ ॥१३४॥ अर्थ - सब कोई अपने स्वार्थ के (साथी) हैं। रस के लंपट मधुप (भ्रमर) चुप रहो । तुम्हें और उन्हे (दोनो को) देख लिया। जो कुछ कहा तथा कहना चाहते हो उसे भी कहकर छुट्टी लो । भ्रमर (उधो) मेरे मन मे ऐसा है, जो होना हो, हो जाय । जब ज्ञान (की बात करना था) तो वृन्दावन मे रास क्यों रचाया ? युवतियो में योग लिये फिरते हो तुम दोनों बडे बुद्धिमान (प्रतिष्ठा सम्पन्न) हो । हृदय में जो भरोसा था, वह भी छूट गया। चित्त की कामना पूर्ति करने वाली मणि को खोकर कृष्ण ने गोकुल को भुला दिया ॥१३४॥ मधुकर प्रीति किये पछितानी । हम जानी ऐसेहिं निबहैगी, उन कछु औरै ठानी । वा मोहन कौं कौन पतीजै, बोलत मधुरी वानी । हमकौं लिखि लिखि जोग पठावत, आपु करत रजधानी । सूनी सेज सुहाइ न हरि बिनु, जागति रैनि बिहानी । जब तैं गवन कियौ मधुबन कौं°, नैननि बरषत पानी । कहियौ जाइ स्याम सुंदर कौं, अन्तरगत की जानी । सूरदास प्रभु मिलि कै बिछुरे, तातैं भईं दिवानी ॥१३५॥ अर्थ-मधुकर, प्रेम करके हमने पश्चात्ताप किया। हमने समझा कि ऐसे निर्वाह होगा लेकिन कृष्ण ने मन मे कुछ और ही ठान रखा था । उस कृष्ण का कौन विश्वास करे जो मधुर वाणी बोलने वाले है, हमको लिख लिखकर योग भेजते है तथा स्वयं राजधानी (का भोग) करते हैं। कृष्ण के बिना सूनी सेज अच्छी नहीं लगती तथा जागते हुए रात बीतती है। जब से कृष्ण मधुवन को गये, नेत्रो से जल बरसता रहता है। अन्तरगत की बात जाकर कृष्ण से कहना । सूरदास कहते है (गोपियाँ कहती हैं) कृष्ण से मिलकर बिछुड़ गयी, उसी से दीवानी हो गयी ॥१३५॥ हमारैं हरि हारिल की लकरी । मनक्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी । जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जकरी । सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी । सु तौ ब्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी । यह तौ सूर तिनहिं लै सौपों, जिनके मन चकरी ॥१३६॥ अर्थ- कृष्ण हमारे लिए हारिल की लकड़ी से समान हैं। मन, कर्म, वचन तथा हृदय से मैंने कृष्ण को दृढ़तापूर्वक पकड़ा है। जागते, सोते, स्वप्न मे तथा दिन