सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१६ सूरसागर सार सटीक रात कृष्ण-कृष्ण की रट (धुन) लगी रहती है। योग सुनते हुए ऐसा लगता है जैसे कड़वी ककड़ी है। तुम ऐसी व्याधि ले आये जिसे हमने न तो देखा है, न सुना है, न किया है। सूरदास कहते है (गोपियां कहती हैं) यह तो उन्हें सौंपो जिनके मन चंचल हैं ॥१३६॥ कहा होत जो हरि हित चित धरि, एक बार ब्रज आवते । तरसत ब्रज के लोग दरस कौं, निरखि निरखि सुख पावते । मुरली सब्द सुनावत सबहिनि, हरते तन की पीर । मधुरे बचन बोलि अमृत मुख, विरहिनि देते धीर । सब मिलि जग जस गावत उनकौ, हरष मानि उर आनत । नासत चिन्ता ब्रज वनितनि की, जनम सुफल करि जानत । दुरी दुरा कौ खेल न कोऊ, खेलत हैं ब्रज महियाँ । बाल दसा लपटाइ गहत हे, हंसि-हँसि हमरी बहियाँ । हम दासी बिनु मोल की उनकी, हमहिं जु चित्त बिसारी । इत तैं उन हरि रमि रहे अव तौ, कुविजा भई पियारी । हिय मैं बातैं समुझि-समुझि कै, लोचन भरि-भरि आए । सूर सनेही स्याम प्रीति के, ते अब भए पराए ॥१३७॥ अर्थ—यदि कृष्ण स्नेह को चित्त मे धरकर ब्रज मे एक बार आ जाते तो क्या होता । ब्रज के लोग दर्शन के लिए तरसते हैं, (वे) उनके मुख को देख-देखकर सुख पाते । (कृष्ण) सब को मुरली का शब्द सुनाते तथा सभी की पीड़ा हरते । (कृष्ण आकर) मुख से अमृत तुल्य मधुर वचन बोलकर विरहिनियों को धीरज देते । सब संसार मिल कर उनका यश गाता तथा हर्षित होकर हृदय से लगाते । (कृष्ण आकर) ब्रज की स्त्रियो की चिन्ता का नाश करते (तो) वे अपने जन्म को सफल करके जानती। ब्रज के वीच कोई छिपा-छिपी का खेल नही खेलता । बालकपन मे हँस-हँस कर हमारी बांह पकड़ते थे । हम उनकी बिना मूल्य की दासी हैं हमें क्यों भुला दिया । यहाँ से कृष्ण वहां रम रहे (अब) तो कुबरी प्यारी हो गयी । हृदय मे बाते समझ- समझकर आंख मे पानी भर-भर आता है। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कृष्ण प्रेम के स्नेही थे, वे अब पराये हो गये ॥१३७॥ मधुकर आपुन होहिं बिराने । बाहर हेतु हितू कहवावत, भीतर काज सयाने । ज्यौं सुक पिंजर माहिं उचारत, ज्यौं ज्यौं कहत वखाने । छूटत ही उड़ि मिलै अपुन कुल, प्रीति न पल ठहराने । जद्यपि मन नहिं तजत मनोहर, तद्यपि कपटी जाने । सूरदास प्रभु कौन काज कौं, माखी मधु लपटाने ॥१३८॥