सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउद्धव संदेश ३१७ अर्थ—मधुकर, (वे) अपने विराने हैं। बाहर से तो हितैषी कहलाते हैं किन्तु भीतर से (अपने कार्य) के लिए (काफी चतुर) श्रेष्ठ हैं। जैसे तोता जब पिंजड़े मे रहता है तो वही उच्चारण करता है, जो-जो कहने वाला (जिलाने वाला) कहता है, किन्तु वह छूटते ही उड़कर अपने परिवार मे मिल जाता है, उसमे (पुरानी) प्रीति पल भर भी नही ठहरती । यद्यपि मन उन मनोहर (कृष्ण को) नही त्यागता फिर भी जान गयी वे कपटी हैं। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) मक्खी मधु से किसलिए लिपटी रहती हैं ।।१३८।। हरि तैं भली सुपति सीता कौ । जाकैं बिरह जतन ए कीन्हे, सिंधु कियौ बीता कौ । लंका जारि सकल रिपु मारे, देख्यौ मुख पुनि ताकौ । दूत हाथ उन लिखि जु पठायौ, ज्ञान कह्यौ गीता कौ । तिनकौ कहा परेखौ कीजै, कुबिजा के मीता कौ । चढे सेज सातौं सुधि बिसरी, ज्यौं पीता चीता कौ । करि अति कृपा जोग लिखि पठयौ, देखि डराईं ताकौ । सूरजदास प्रीति कह जानैं, लोभी नवनीता कौ ।।१३६।। अर्थ—कृष्ण से अच्छे तो सीता के सुन्दर पति (राम) थे । जिन्होने (सीता के विरह मे) ऐसा यत्न किया कि सिन्धु को एक बीता के अन्दर (शीघ्र ही नाप) कर डाला । उन्होने लंका को जलाकर समस्त शत्रुओ को मार डाला तथा फिर (सीता) उनके मुख को देखा । दूत के हाथ में जो (कृष्ण ने) गीता का ज्ञान लिखकर भेजा है, कुब्जा के मित्र कृष्ण का कैसे विश्वास किया जाय । सेज पर चढते ही शराबी (पीता) के चित्त (चीता) के समान सभी स्मृतियां भूल गयीं । अत्यधिक कृपा करके योग लिख कर भेजा है कि उसे देखकर मैं डर गयी ! सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) मक्खन के लोभी (श्री कृष्ण) प्रेम को क्या जानें ।।१३६।। ऊधौ क्यौँ बिसरत वह नेह । हमरैं हृदय आनि नंद-नंदन, रचि रचि कीन्हे गेह । एक दिवस गई गाइ दुहावन, वहाँ जु बरष्यौ मेह । लिए उढ़ाइ कामरी मोहन, निज करि मानी देह । जब हमकौँ लिखि-लिखि पठवत हैं, जोग जुगुति तुम लेहु । सूरदास बिरहिनि क्यौँ जीवैं, कौन सयानप एहु ।।१४०।। अर्थ—उद्धव, वह स्नेह कैसे भूले । कृष्ण ने हमारे हृदय मे आकर रच-रचकर (उसे अपना) घर बनाया । एक दिन गाय दुहाने गयी वहाँ जब बादल बरसा तो कृष्ण ने कमरी ओढ़ा दी तथा (हमारे) शरीरे को अपना करके जाना । अब हमें लिख लिख कर भेजते है कि तुम योग की युक्ति लो । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) इससे विरहिणी कैसे जिये तथा यह कौन सा सयानापन है ।।१४०।।