भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 278

३१८ सूरसागर सार सटीक ऊधौ मन माने की बात। दाख छुहारा छांड़ि अमृत-फल, विषकीरा विष खात। ज्यौं चकोर कौं देइ कपूर कोउ, तजि अंगार अघात। मधुप करत घर कोरि काठ मैं, बँधत कमल के पात। ज्यौँ पतंग हित जानि आपनी, दीपक सौँ लपटात। सूरदास जाकौ मन जासौँ, सोई ताहि सुहात ॥१४१॥ अर्थ-ऊधो मन की रुचि की बात है। विष खाने वाला (सांप) अंगूर तथा छोहारा छोड़कर विष खाता है। (जैसे) चकोर को यदि कोई कपूर दे तो उसे त्याग कर वह अंगार से ही तृप्त होता है। भ्रमर काठ में छेद करता है तथा कमल के पंखु- डियों में बँधता है। जैसे पतंग अपना हित जानकर ही दीपक से लिपटता है। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कि जिसका मन जिससे (लग गया है) वही उसको अच्छा लगता है ॥१४१॥ इहिँ डर बहुरि न गोकुल आए। सुनि री सखी हमारो करनी, समुझि मधुपुरी छाए। अधरातक तैं उठि सब बालक, मोहिं टेरेंगे आइ। मातु पिता मोकौं पठवैंगे, बनहिँ चरावन गाइ। सूने भवन आइ रोकैंगी, दधि चोरत नवनीत। पकरि जसोदा पै लै जैहैं, नाचहु गावहु गीत। ग्वारिनि मोहिं बहुरि बांधैंगी, कै तव वचन सुनाइ। वै दुख सूर सुमिरि मन ही मन, बहुरि सहै को जाइ ॥१४२॥ अर्थ-इस डर से फिर गोकुल नही आये। सखी सुनो हमारी करनी समझकर (कृष्ण) मधुपुरी मे छा गये। आधी रात के लगभग उठकर सभी बालक आकर मुझे पुकारेंगे। माता-पिता मुझे गाय चराने भेजेंगे। खाली घर मे मक्खन चुराते हुए मुझे स्त्रियां रोकेगी। वे पकड़कर यशोदा के पास ले जायंगी तथा (कहेगी) कि नाचो तथा गीत गाओ। छल के वचन सुनाकर ग्वालिनियां मुझे फिर बांधेगी। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) उन दुखो को मन-ही-मन स्मरण कर (कृष्ण सोचते हैं) फिर उन्हे सहने कौन जाय ॥१४२॥ जौ कोउ विरहिनि कौ दुख जानै। तौ तजि सगुन साँवरी मूरति, कत उपदेसै ज्ञानै। कुमुद चकोर मुदित विधु निरखत, कहा करै लै भानै। चातक सदा स्वांति कौं सेवक, दुखित होत बिनु पानै। भौंर, कुरंग, काग, कोइल कौं, कविजन कपट वखानैँ। सूरदास जौ सरबस दीजै, कारे कृतहि न मानैं ॥१४३॥