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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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उद्धव संदेश ३१६ अर्थ—यदि कोई विरहिणी के दुख को समझे तो वह सगुण साँवली मूर्ति को छोड़कर ज्ञान का उपदेश कैसे देगा। कमलिनी और चकोर चन्द्रमा को देखकर प्रसन्न होते हैं, वे सूर्य को लेकर क्या करे। चातक सदैव स्वाति के बूंद का सेवक है, वह (उसके) पान के बिना दुखी होता है। भौर, मृग, कौआ, कोयल आदि को कवि लोग कपटी कहते है। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) यदि काले लोगों को सर्वस्व दे दिया जाय तो भी वे उपकार को नही मानते ॥१४३॥ ऊधौ सुधि नाहीँ या तन की। जाइ कहौ तुम कित हौ भूले, हमज्ब भईँ बन-बन की। इक बन ढूँढ़ि सकल बन ढूंढ़े, बन बेली मधुबन की। हारि परीँ बृन्दावन ढूँढ़त, सुधि न मिली मोहन की। किए विचार उपचार न लागत, कठिन बिथा भई मन की। सूरदास कोउ कहै स्याम सौँ, सुरति करैँ गोपिनि की ॥१४४॥ अर्थ—उद्धव, (हमें) इस शरीर का स्मरण नही है। तुम क्यों भूले हो, जाकर कृष्ण से कहो कि हम वन-वन की (ढूंढ़ने वाली) हो गयी है। इन समस्त वनों को ढूंढ़ा तथा मधुवन की (समस्त) वन लताओं को ढूंढ़ा। वृन्दावन में ढूंढ़ते (ढूंढ़ते) हार गयी किन्तु कृष्ण की कोई खबर नही मिली। विचार करने पर (भी) कुछ उपचार नही सूझता, जिससे मन मे कठिन पीड़ा हो गयी है। सूरदास कहते है (गोपियां कहती है) कोई कृष्ण से कहे कि (वह) गोपियों का ख्याल करे ॥१४४॥ लरिकाईँ कौ प्रेम कहौ अलि कैसैँ छूटत। कहा कहौँ ब्रजनाथ चरित, अंतरगति लूटत। वह चितवनि वह चाल मनोहर, वह मुसकानि मंद-धुनि गावनि। नटवर-भेष नंद-नंदन कौ, वह विनोद, वह बन तैँ आवनि। चरन कमल की सौहँ करति हौँ, यह संदेस मोहिं विषसौँ लागत। सूरदास पल मोहिं न बिसरति, मोहन मूरति सोवत जागत ॥१४५॥ अर्थ—अलि (उद्धव) कहो बचपन की प्रीति कैसे छूटे। ब्रजनाथ (कृष्ण) के चरित्र को कैसे कहूँ वह (चरित्र) अन्तर को लूटने वाला है। वह दृष्टि, वह मनोहर चाल, वह मुस्कान, वह मंद ध्वनि से गाया जाने वाला गान, नटवर वेष, वह कृष्ण का विनोद तथा वन से वह आगमन (ये सब हृदयहारी हैं)। कृष्ण के चरण कमलों की कसम लेकर कहती हूँ यह संदेश मुझे विष जैसा लगता है। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) (वह) मोहनी मूर्ति हमे सोते-जागते कभी नही भूलती ॥१४५॥ उद्धव हृदय परिवर्तन तथा गोपी संदेश मैं ब्रजबासिन की बलिहारी। जिनके सग सदा क्रीड़त हैं, श्री गोवरधन-धारी।