सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
उद्धव संदेश ३१६ अर्थ—यदि कोई विरहिणी के दुख को समझे तो वह सगुण साँवली मूर्ति को छोड़कर ज्ञान का उपदेश कैसे देगा। कमलिनी और चकोर चन्द्रमा को देखकर प्रसन्न होते हैं, वे सूर्य को लेकर क्या करे। चातक सदैव स्वाति के बूंद का सेवक है, वह (उसके) पान के बिना दुखी होता है। भौर, मृग, कौआ, कोयल आदि को कवि लोग कपटी कहते है। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) यदि काले लोगों को सर्वस्व दे दिया जाय तो भी वे उपकार को नही मानते ॥१४३॥ ऊधौ सुधि नाहीँ या तन की। जाइ कहौ तुम कित हौ भूले, हमज्ब भईँ बन-बन की। इक बन ढूँढ़ि सकल बन ढूंढ़े, बन बेली मधुबन की। हारि परीँ बृन्दावन ढूँढ़त, सुधि न मिली मोहन की। किए विचार उपचार न लागत, कठिन बिथा भई मन की। सूरदास कोउ कहै स्याम सौँ, सुरति करैँ गोपिनि की ॥१४४॥ अर्थ—उद्धव, (हमें) इस शरीर का स्मरण नही है। तुम क्यों भूले हो, जाकर कृष्ण से कहो कि हम वन-वन की (ढूंढ़ने वाली) हो गयी है। इन समस्त वनों को ढूंढ़ा तथा मधुवन की (समस्त) वन लताओं को ढूंढ़ा। वृन्दावन में ढूंढ़ते (ढूंढ़ते) हार गयी किन्तु कृष्ण की कोई खबर नही मिली। विचार करने पर (भी) कुछ उपचार नही सूझता, जिससे मन मे कठिन पीड़ा हो गयी है। सूरदास कहते है (गोपियां कहती है) कोई कृष्ण से कहे कि (वह) गोपियों का ख्याल करे ॥१४४॥ लरिकाईँ कौ प्रेम कहौ अलि कैसैँ छूटत। कहा कहौँ ब्रजनाथ चरित, अंतरगति लूटत। वह चितवनि वह चाल मनोहर, वह मुसकानि मंद-धुनि गावनि। नटवर-भेष नंद-नंदन कौ, वह विनोद, वह बन तैँ आवनि। चरन कमल की सौहँ करति हौँ, यह संदेस मोहिं विषसौँ लागत। सूरदास पल मोहिं न बिसरति, मोहन मूरति सोवत जागत ॥१४५॥ अर्थ—अलि (उद्धव) कहो बचपन की प्रीति कैसे छूटे। ब्रजनाथ (कृष्ण) के चरित्र को कैसे कहूँ वह (चरित्र) अन्तर को लूटने वाला है। वह दृष्टि, वह मनोहर चाल, वह मुस्कान, वह मंद ध्वनि से गाया जाने वाला गान, नटवर वेष, वह कृष्ण का विनोद तथा वन से वह आगमन (ये सब हृदयहारी हैं)। कृष्ण के चरण कमलों की कसम लेकर कहती हूँ यह संदेश मुझे विष जैसा लगता है। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) (वह) मोहनी मूर्ति हमे सोते-जागते कभी नही भूलती ॥१४५॥ उद्धव हृदय परिवर्तन तथा गोपी संदेश मैं ब्रजबासिन की बलिहारी। जिनके सग सदा क्रीड़त हैं, श्री गोवरधन-धारी।
किनहूँ कैँ घर माखन चोरत, किनहूँ कैँ संग दानी। किनहूँ कैँ सँग धेनु चरावत, हरि की अकथ कहानी। किनहूँ कैँ सँग जमुना कैँ तट, वंसी टेरि सुनावत। सूरदास बलि-वलि चरननि की, यह सुख मोहिं नित भावत ॥१४६॥ अर्थ—मैं ब्रजवासियो की बलि जाता हूँ जिनके साथ गोवर्धनधारी कृष्ण सदा खेलते है। (वह) किन्ही के साथ माखन चुराते है, किन्हीं के साथ दान (लीला) करते हैं। किन्ही के साथ (वह कृष्ण) गाय चराते हैं। इस प्रकार कृष्ण की कहानो अकथ- नीय है। किन्ही के साथ (कृष्ण) यमुना तट पर गाय चराते हैं तथा वंशी की टेर सुनाते है। सूरदास कहते है (ऊधो कहते है) कृष्ण के चरणों पर बलिहारी हूँ तथा यह सुख हमे सदैव भाता है ॥१४६॥ हौं इन मोरनि की बलिहारी। जिनकी सुभग चंद्रिका माथै, धरति गोवरधनधारी। वलिहारी वा बाँस-वंस की, बंसी सी सुकुमारी। सदा रहति है कर जु स्याम कैँ, नैकहुँ होति न न्यारी। वलिहारी वा गुंज-जाति की, उपजी जगत उज्यारी। सुन्दर हृदय रहत मोहन कैँ, कवहूँ टरत न टारी। वलिहारी कुल सैल सरित जिहिं, कहत कलिंद-दुलारी। निसि-दिन कान्ह अंग आलिंगन, आपुनहूँ भई कारी। वलिहारी वृन्दावन भूमिहिं, सुतौ भाग की सारी। सूरदास प्रभु नाँगे पाइनि, दिन प्रति गैया चारी ॥१४७॥ अर्थ—मैं इन मोरो की बलिहारी (होता) हूँ जिनकी सुन्दर चन्द्रिका कृष्ण मस्तक पर धारण करते है। बाँस के कुल की बलिहारी है, जिसकी सुकुमारी वंशी सदा कृष्ण के हाथो मे रहती है तथा क्षण भर के लिए भी अलग नही होती। उस गुंज जाति को बलिहारी है जो कि उज्जवल संसार में उत्पन्न हुई है। (वह) कृष्ण के सुन्दर हृदय पर रहती तथा कभी टाले नही टलती। पर्वत समूह तथा 'सरिता' जिसे यमुना कहते है, उसकी बलिहारी है। रात-दिन कृष्ण के अंग आलिंगन से स्वयं भी काली हो गयी। वृन्दावन की भूमि को बलिहारी है क्योकि वह भाग्य की भरी पूरी है, जहां कृष्ण ने नगे पांव प्रतिदिन गाय चराया ॥१४७॥ हम पर हेत किये रहिवौ। या ब्रज कीं व्यौहार सखा तुम, हरि सौँ सब कहिवौ। देखे जात आपनी अँखियनि, या तन को दहिवौ। तन की बिथा कहा कहौं तुमसौँ, यह हमकौँ सहिवौ। तब न कियौ प्रहार प्राननि कौ, फिरि फिरि क्यौं चहिवौ। अब न देह जरि जाइ सूर इनि, नैननि कौ बहिवौ ॥१४८॥
उद्धव संदेश ३२१ अर्थ—हम पर स्नेह किए रहना । सखा तुम इस ब्रज के सब व्यवहार को कृष्ण से कहना । (तुम) अपनी आंख से इस शरीर का जलना देखे जा रहे हो । तुमसे शरीर व्यथा क्या कहूँ यह हमको सहना होगा । तब तो प्राणों का प्रहार (त्याग) नही किया, अब बार-बार चाहने से क्या होता है । " सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती है) अब तो इन नेत्रों के बहते रहने से शरीर भी नही जल जाता ॥१४८॥ स्वामी पहिलौ प्रेम सँभारौ । ऊधो जाइ चरन गहि कहियैं, जी तैं हित न उतारौ । जो तुम मधुबन राज काज भए, गोकुल हम न अधारौ । कमल नयन सो चैन न देखौ, नित उठि गोधन चारौ । ये ब्रज लोग मया के सेवक, तिनसौँ क्यौं न बिहारौ । सूरदास प्रभु एक बार मिलि, सकल बिरह दुख टारौ ॥१४६॥ अर्थ—स्वामी (कृष्ण) पूर्व प्रेम (की प्रतिष्ठा) सम्हालो । उद्धव, जाकर चरण पकड़कर कहना कि हृदय से स्नेह दूर न करें । जो तुम मधुबन के राजकार्य को (धारण कर लिए) (अब) गोकुल में हमारे लिए (कोई) आश्रय नही है । कमल नयन को देखे बिना चैन नही है, (निवेदन है) नित उठकर गाय चराओ । ये ब्रज के लोग प्रेम के सेवक हैं उनके साथ विहार क्यों नही करते । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) एक बार मिलकर विरह के दुख को टाल दो ॥१४६॥ इतनी बात अलि कहियौ हरि सौं, कब लगि यह मन दुख मैं गारैं । पथ जोहत तन कोकिल बरन भइँ, निसि नीँद पिय पियहिँ पुकारैं । जा दिन तैं बिछुरे नंद-नंदन, अति दुख दारुन क्यौं निरबारैं । सूरदास प्रभु बिनु यह बिपदा, काकौ दरसन देखि बिसारैं ॥१५०॥ अर्थ—अलि (उद्धव) कृष्ण से इतना कहना कि कब तक इस शरीर को विरह मे गलाऊँ (नष्ट करूँ) । पथ देखते (देखते) शरीर कोयल के रंग का हो गया । पिय- पिय पुकारते हुए हमें रात मे नीद नही आती । जिस दिन से कृष्ण बिछुड़े तभी से अत्यन्त दारुण दुख का निवारण नही होता । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती है) प्रभु के बिना यह विपत्ति किसके दर्शन से दूर करूँ ॥१५०॥ ऊधौ जू, कहियौ तुम हरि सौं, जाइ हमारे हिय कौ दरद । दिन नहिं चैन, रैनि नहिं सोवति, पावक भई जुन्हाई सरद । जबलैं लै अक्रूर गए हैं, भई बिरह तन बाइ छरद । काम प्रबल जाके अति ऊधौ, सोचत भइ जस पीत-हरद । सखा प्रबीन निरतर हरि के, तातैं कहति हैं खोलि परद । ध्यावतिँ रूप दरस तजि हरि कौ, सूर मूरि बिनु होतिँ मुरद ॥१५१॥ अर्थ—उद्धव, तुम जाकर कृष्ण से हमारे हृदय के दर्द को कहना । दिन मे चैन नही है तथा रात मे नीद नही आती । शरद की ज्योत्स्ना अग्नि की तरह हो गयी । २१
३२२ सूरसागर सार सटीक
जब से अक्रूर गये हैं, विरह की तप्त वायु से शरीर क्षरित हो गया है। उद्धव जिसके (शरीर मे) प्रबल काम (व्याप्त) है, सोचते हुए शरीर पीली हल्दी के समान हो गया है। आप कृष्ण के सदा के प्रवीण मित्र है इसलिए परदा खोलकर (बिना किसी रोक टोक के) कहती हूँ। कृष्ण के रूप के दर्शन को त्यागकर (पुनः उसी का) ध्यान करती हूँ अब, (कृष्ण रूपी) संजीवनी (जड़ी) के बिना हम मुर्दा हो गयी है ॥१५१॥ ऊधौ इक पतिया हमरौ लीजै। चरन लागि गोविंद सौं कहियौ, लिखो हमारी दीजै। हम तौ कौन रूप गुन आगरि, जिहिं गुपाल जू रीझैं। निरखत नैन-नीर भरि आए, अरु कंचुकि पट भीजै। तलफत रहतिं मीन चातक ज्यौं, जल बिनु तृषा न छीजै। अति व्याकुल अकुलातिं विरहिनी, सुरति हमारी कीजै। अँखियाँ खरी निहारतिं मधुबन, हरि-बिनु ब्रज विष पीजै। सूरदास-प्रभु कबहिं मिलैंगे, देखि देखि मुख जीजै ॥१५२॥ अर्थ—उद्धव हमारा एक पत्र लीजिए। (कृष्ण के) चरण लगाकर कहना और हमारा लिखा हुआ देना। हम कौन रूप गुण मे अग्रणी है जो कि कृष्ण रीझे। देखते ही गोपियों के नेत्र मे आंसू भर आये और कंचुक का वस्त्र भीगता है। हम (गोपियाँ) मछली तथा चातक की तरह तलफती रहती हैं, जल के बिना (कृष्ण के रूप रस के बिना) प्यास नही बुझती। (हम) विरहिणियां व्याकुल होकर अकुलाती है (कृष्ण) हमारी स्मृति कीजिए। आंखे खड़ी (एकटक) मधुवन को निहारती हैं। कृष्ण के बिना (हम) ब्रज मे विष पी लूंगी। सूरदास कहते है (गोपियां कहती हैं) कृष्ण कब मिलेंगे जिनके मुख को देख-देख कर जिऊंगी ॥१५२॥ हम मति हीन कहा कछु जानैं, ब्रजवासिनी अहीर। वै जु किसोर नवल नागर तन, बहुत भूप की भीर। बचन की लाज सुरति करि राखो, तुम अलि इतनी कहियौ। भली भई जौ दूत पठायौ, इतनी बोल निवहायौ। एक बार तौ मिलौ कृपा करि, जौ अपनौ ब्रज जानौ। यहै रीति ससार सबनि की, कहा रंक कह रानी। हम अनाथ तुम नाथ गुसाईं, राखौ, क्यौं नहिं सोई। षट रितु ब्रज पै आनि पुकारैं, सूरदास अब कोई ॥१५३॥ अर्थ—हम अहीर (जाति की) ब्रजवासिनियां हीन बुद्धि की होने के कारण कैसे कुछ समझे। वे तो किशोर तथा नवल सभ्य नागर (नागरिक हैं) तथा राजा के रूप मे बड़ी जिम्मेदारी को वहन करने वाले हैं, इसलिए हे भ्रमर (उद्धव) उनसे कहना कि वचन की लाज को स्मरण रखेगे। अच्छा हुआ जो कि आपने दूत भेजा (कम से कम) इतनी प्रतिज्ञा तो निभायी। यदि ब्रज को अपना समझो तो कम से कम एक बार तो
उद्धव संदेश ६२९ कृपा करके मिल जाओ । चाहे गरीब हो चाहे धनी सारी दुनियां की यही रीति है । हम अनाथ हैं तथा कृष्ण तुम नाथ हो इसलिए आप उस यश की रक्षा क्यों नही करते । छहो ऋतुये ब्रज में आकर पुकारती है कि अब कोई (विरहिणियो को सहारा देने वाला) है ॥१५३॥ नंद-नंदन सौं इतनी कहियौ । जद्यपि ब्रज अनाथ करि डार्यौ, तद्यपि सुरति किये चित रहियौ । तिनका तोर करहु जनि हम सौं, एक बास की लाज निबहियौ । गुन औगुननि दोष नहिं कीजतु, हम दासिनि की इतनी सहियौ । तुम बिनु प्रान कहा हम करिहैं, यह अवलंब न सुपनेहु लहियौ । सूरदास पाती लिखि पठई, जहाँ प्रीति तहँ ओर निबहियौ ॥१५४॥ अर्थ—कृष्ण से इतना कहना यद्यपि ब्रज को अनाथ कर डाले तब भी चित्त मे स्मरण रखिएगा । हमसे सम्बन्ध विच्छेद मत कीजिए । एक (साथ) निवास की लाज का निर्वाह करिए । गुण तथा अवगुण का दोष (ग्रहण न) करना, हम दासियों (के इतने अपराध को) सहना । तुम्हारे बिना हम प्राण को क्या करेगी यदि स्वप्न मे भी यह (प्राण) आपका अवलम्ब नही प्राप्त करेगा । सूरदास कहते हैं कि (गोपियो ने) पत्र लिखकर भेजा (तथा निवेदन किया) जहाँ प्रीति है (वहाँ) उसका अन्त तक निर्वाह भी होना चाहिए ॥१५४॥ बिनु गुपाल बैरिन भईं कुँजैं । तब वै लता लगति तन सीतल, अब भईं विषम ज्वाल की पुंजैं । वृथा बहति जमुना, खग बोलत, वृथा कमल-फूलनि अलि गुंजैं । पवन, पान, घनसार, सजीवन, दधि-सुत किरनि भानु भईं भुंजैं । यह ऊधौ कहियौ माधौ सौं, मदन मारि कीन्ही हम लुंजैं । सूरदास प्रभु तुम्हारे दरस कौं, मग-जोवत अँखियाँ भईं घुंजैं ॥१५५॥ अर्थ—कृष्ण के बिना सभी कुंज (वन) शत्रु हो गये । तब ये लताये अत्यधिक शीतल लगती थी अब विषम ज्वाला पुंज (के समान्) हो गयी है। यमुना व्यर्थ बहती हैं, पक्षी (व्यर्थ) बोलते है तथा भ्रमर का गूंजना और कमल का खिलना सब व्यर्थ है । पवन, पानी, कपूर, सजीवन (सब दुखकर हो गये) तथा चन्द्रमा की किरणे सूर्य की किरणों के समान (तप्त होकर) भूनती हैं । हे उद्धव कृष्ण से कहना कि काम ने मार कर हमें लुंज कर दिया है । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कि कृष्ण तुम्हारे दर्शन के लिए रास्ता देखते-देखते आंखे घुंघची की भांति रक्त हो गयी हैं ॥१५५॥ ऊधौ इतनी कहियौ बात । मदन गुपाल बिना या ब्रज मैं, होन लगे उतपात । तृनावर्त, बक, बकी, अघासुर, धैनुक फिरि-फिर जात । व्योम, प्रलंब, कंस केसी इत, करत जिअनि की घात ।
काली काल-रूप दिखियत है, जमुना जलहिँ अन्हात । बरुन फाँस फाँस्यौ चाहत है, सुनियत अति मुरझात । इंद्र आपने परिहँस कारन, बार-बार अनखात । गोपी, गाइ, गोप, गोसुत सब; थर-थर काँपत गात । अंचल फारति जननि जसोदा, पाग लिये कर तात । लागौ बेगि गुहारि सूर प्रभु, गोकुल बैरिनि घात ॥१५६॥ अर्थ—उद्धव, इतनी बात कहना कि मदन गोपाल (कृष्ण) के बिना ब्रज मे उत्पात होने लगा। तृणावर्त, बक बकी, अघासुर तथा धेनुक (आदि राक्षस) घूम-घूम कर लौट जाते हैं। व्योमासुर, प्रलम्बन तथा कंस, केसी यहाँ जीने की घात लगाये है। यमुना के जल मे स्नान करते समय काली मृत्यु के समान दिखाई देता है। वरुण अपने पाश मे फँसाना चाहता है, सुनकर हम अत्यन्त मुरझाती हैं। इन्द्र अपने परिहास के कारण बार-बार क्रुद्ध होता है। गोपी, गाय, गोप, सभी बछडे शरीर से थर-थर कांपते हैं। माता यशोदा अंचल फाड़ती है तथा पिता हाथ मे पाग लेकर (तुम्हारी आशा देखते हैं) गोकुल मे शत्रुओ का आघात हो रहा है इसलिए हे कृष्ण शीघ्र ही पुकार सुनो ॥१५६॥ ऊधौ इतनी कहियौ जाइ । अति कृसगात भईँ ये तुम बिनु, परम दुखारी गाइ । जल समूह बरषतिँ दोउ अँखियाँ, हूँकति लीन्हें नाउँ । जहाँ जहाँ गो दोहन कीन्हो, सूँघतिँ सोई ठाउँ । परतिँ पछार खाइ छिन ही छिन, अति आतुर ह्वै दीन । मानहु सूर काढ़ि डारी हैं, बारि मध्य तैँ मीन ॥१५७॥ अर्थ—उद्धव, जाकर इतना कहना कि परम दुखी गाये तुम्हारे बिना अत्यधिक दुर्बल शरीर वाली हो गयी हैं। इनकी आंखो से बहुत जल बरसता रहता है तथा तुम्हारा नाम लेते हुंकारती हैं। (आपने) जहां-जहां गोदोहन किया था उन-उन स्थानो को सूंघती है। अत्यधिक आतुर तथा दीन होकर क्षण-क्षण वे (मूर्छा से) पछाड़ खा जाती हैं। (उनकी दशा ऐसी है) मानो जल के बीच से मछली निकाल ली गयी हो ॥१५७॥ अति मलीन बृषभानु-कुमारी । हरि स्रम-जल भीँज्यौ उर-अंचल, तिहिँ लालच न धुवावति सारी । अध मुख रहति अनत नहिँ चितवति, ज्यौँ गथ हारे थकित जुवारी । छूटे चिकुर बदन कुम्हिलाने, ज्यौँ नलिनी हिमकर की मारी । हरि संदेस सुनि सहज मृतक भइ, इक बिरहिनि, दूजे अलि जारी । सूरदास कैसेँ करि जीवैँ, ब्रज बनिता बिन स्याम दुखारी ॥१५८॥ अर्थ—राधा अत्यधिक मलिन हो गयी है। कृष्ण के सात्विक प्रेम जनित श्रम जल (पसीना) से हृदय स्थल का अंचल भीग गया था (उसे सुरक्षित रखने की) लालच से साडी को धुलाती नही हैं। वह सदैव मुख नीचे किये रहती हैं तथा दांव मे हारे हुये
उद्धव संदेश ३२५ जुवारी की तरह अन्यत्र नही देखती हैं। उनके बाल छूट कर (बिखर) गये है शरीर हिम से आहत कमलिनी की तरह कुम्हला गया है। कृष्ण के संदेश को सुनकर वह सहज ही मृतक (तुल्य) हो गयी क्योंकि एक तो वह विरहिणी थी तथा दूसरे भ्रमर (उद्धव के) द्वारा जला दी गयी। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कि दुखी ब्रज बनितायें कृष्ण के बिना कैसे जीवित रहें ॥१५८॥ ऊधौ तिहारे पा लागति हौँ, बहुरिहुँ इहिँ ब्रज करबी भाँवरी । निसि न नीँद भोजन नहिं भावै, चितवत मग भइ दृष्टि झाँवरी । वहै वृन्दावन, वहै कुंज-घन, वहै जमुना, वहै सुभग साँवरी । एक स्याम बिनु कछू न भावै, रटति फिरतिँ ज्यौँ बकति बावरी । चलि न सकति मग डुलत धरत-पग, आवति बैठत उठत ताँवरी । सूरदास-प्रभु आनि मिलावहु, जग मैँ कीरति होइ रावरी ॥१५६॥ अर्थ—उद्धव, तुम्हारे पैर लगती हूँ, पुनः (कृष्ण का समाचार लेकर) इस ब्रज मे चक्कर लगाइएगा क्योकि उनके बिना रात मे नीद नही आती, खाना अच्छा नही लगता; रास्ता निहारते दृष्टि झुलस गयी। वही वृन्दावन है, वही घना कुंज, वही यमुना तथा वही सुन्दर राधा है किन्तु कृष्ण के बिना कुछ भी अच्छा नही लगता। बावली की तरह (कृष्ण का नाम) रटती फिरती हूँ। रास्ता नही चल पाती, कदम रखते पैर हिलता है। उठते बैठते चक्कर आता है। सूरदास कहते है (गोपियाँ कहती है) उद्धव कृष्ण को लाकर मिला दो, संसार मे तुम्हारा यश होगा ॥१५६॥ पूर्ण परिवर्तन तथा यशोदा संदेश अब अति चकितवंत मन मेरौ । आयौ हौँ निरगुन उपदेसन, भयौ सगुन कौ चेरौ । जो मैँ ज्ञान कह्यौ गीता कौ, तुमहिँ न परस्यौ नेरौ । अति अज्ञान कछु कहत न आवै, दूत भयौ हरि केरौ । निज जन जानि मानि जतननि तुम, कीन्हौ नेह घनेरौ । सूर मधुप उठि चले मधुपुरी, बोरि जोग कौ बेरौ ॥१६०॥ अर्थ—अब मेरा मन अत्यधिक चकितवान् हो गया। निर्गुण का उपदेश देने आये थे किन्तु सगुण के सेवक हो गये। मैंने गीता का जो ज्ञान कहा उसने तुम्हे निकट से स्पर्श नही किया। कृष्ण के दूत होते हुए अत्यधिक अज्ञान के कारण मुझसे कुछ कहते नही बनता ! अपना आदमी (स्वजन) जानकर तथा सयत्न आदर देकर तुम लोगो ने घना स्नेह किया। सूरदास कहते हैं कि योग का वेड़ा डुबाकर उद्धव मधुपुरी के लिए रवाना हुए ॥१६०॥ ऊधौ पा लागति हौँ कहियौ, स्यामहिँ इतनी बात । इतनी दूर बसत क्यौँ बिसरे, अपने जननी-तात ।
३२६ सूरसागर सार सटीक जा दिन तैँ मधुपुरी सिधारे, स्याम मनोहर गात । ता दिन तैँ मेरे नैन पपीहा, दरस प्यास अकुलात । जहं खेलन के ठौर तुम्हारे, नन्द देखि मुरझात । जौ कबहुँ उठि जात खरिक लौं, गाइ दुहावन प्रात । दुहत देखि औरनि के लरिका, प्रान निकसि नहिं जात । सूरदास बहुरो कब देखौँ, कोमल कर दधि-खात ॥१६१॥ अर्थ—उद्धव, तुम्हारे पैरों पर पडती हूँ कृष्ण से इतनी बात कहना । इतनी (ही) दूर पर रहते हुए अपने माता-पिता को क्यो भुला दिया । जिस दिन से साँवले मनोहर शरीर वाले कृष्ण ने मथुरा के लिए प्रस्थान किया उसी दिन से मेरे नेत्र रूपी पपीहा दर्शन की प्यास से अकुलाते है । तुम्हारे खेलने के जो स्थान हैं उन्हे देखकर नंद मुरझाते हैं । जब कभी उठकर प्रातः बाडे मे गाय दुहाने जाती हूँ तब दूसरो के लडको को गाय दुहाते हुए देखकर (सोचती हैं कि) मेरे प्राण निकल क्यो नही जाते । सूरदास कहते है (यशोदा कहती है) कोमल हाथो से दही खाते हुए फिर कब देखूंगी ॥१६१॥ तब तुम मेरैं काहे कौं आए । मथुरा क्यों न रहे जदुनंदन, जौ पै कान्ह देवकी जाए । दूध, दही काहे कौं चोरयौ, काहे कौं बन बच्छ चराए । अघ अरिष्ट, काली फनि काढ़यौ, बिष जलतैं सब सखा जिवाए । पय पीवत हरे प्रान पूतना, सदा किए जसुमति के भाए । सूरदास लोगनि के भुरएं, काहैं कान्ह, अब होत पराए ॥१६२॥ अर्थ—तब तुम मेरे यहाँ क्यो आये । यदि तुम देवकी से उत्पन्न हुए (पुत्र) थे तो मथुरा ही मे क्यों नही रहे । (तुमने) दूध दही क्यों चुराया तथा वन मे बछड़ों को क्यो चराया । तुमने क्यो अघासुर, अरिष्ट और काली सर्प को निकालकर विषाक्त जल से सखाओ को जिलाया । दूध पीते हुए पूतना के प्राणो को हर लिया तथा सदैव यशोदा को भाने वाले (अभीष्ट) कार्यों को किया । सूरदास कहते हैं कि (यशोदा कहती है) लोगो के बहकाने से कृष्ण अब क्यों पराये हो रहे हो ॥१६२॥ (मोहन) अपनी गैयाँ घेरि लै । बिडरी जातिं काहु नहिं मानतिं, नँकु मुरलि की टेर दै । धौरी, धूमरि, पीरी, काजरि, बन-बन फिरती पीय । अपनी जानि कै आनि संभारहु, धरौ चेत अब जीय । तुम हौ जग जीवनि प्रतिपालक, निठुराई नहिं कीजै । ग्वालऽरु बाल बच्छ गो बिलखत, सूर सु दरसन दीजै ॥१६३॥ अर्थ—मोहन अपनी गायो को घेर (एकत्रित कर) लो । सब बिखरी जा रही हैं कोई मानती नही, जरा मुरली की आवाज (टेर) तो करो । प्रिय कृष्ण धवली,
उद्धव संदेश ३२७ घुमली, पीली, काली गाये वन-वन घूमती हैं । अब अपनी समझ कर आकर सम्हालो तथा मन में चेतनता (जिम्मेदारी) धारण करो । तुम जग के जीवों के प्रतिपालक हो निष्ठुरता मत कीजिये । ग्वाल-बाल, बछड़े तथा गाये बिलखती हैं । सूरदास कहते हैं (यशोदा कहती है) कृष्ण उन्हे दर्शन दीजिए ।।१६३।। तब तैं छीन सरीर सुबाहु । आधी भोजन सुबल करत हैं, सब ग्वालनि उर दाहु । नंद गोप पिछवारे डोलत, नैननि नीर प्रवाहु । आनंद मिट्यौ मिटी सब लीला, काहू मन न उछाहू । एक बेर बहुरौ ब्रज आवहु, दूध पतूखी खाहु । सूर सपथ गोकुल जौ पैठहु, उलटि मधुपुरी जाहु ॥१६४॥ अर्थ-तब से सुबाहु (नाम के तुम्हारे मित्र) का शरीर क्षीण हो रहा है । सुवल (नामक मित्र भी) आधा (पेट) भोजन करता है (इस तरह) सभी ग्वालों के हृदय मे पीड़ा (जलन) है। नंद तथा गोप नैनो से आंसू का प्रवाह लिये पिछवाड़े घूमते रहते हैं (तुम्हारे चले जाने से) सारा आनन्द तथा समस्त लीला मिट गयी, किसी के भी मन मे उत्साह नही है । एक बार फिर ब्रज आओ तथा पत्ते के दोने मे दूध पियो । सूरदास कहते हैं (यशोदा कहती हैं) कि सौगन्ध है जब कि तुम्हे गोकुल मे अधिक देर तक पैठना (रुकना) पड़े (शीघ्र ही) लौटकर मधुपुरी चले जाना ॥१६४॥ कहियौ जसुमति की आसीस । जहाँ रहौ तहँ नंद लाड़िलौ, जीवौ कोटि बरीस । मुरली दई दोहनी घृत भरि, ऊधौ धरि लइ सीस । यह तौ घृत उनही सुरभिनि कौ, जे प्यारी जगदीस । ऊधौ चलत सखा मिलि आए, ग्वाल बाल दस-दीस । अबकैं यह ब्रज फेरि बसावहु, सूरदास के ईस ।।१६५।। अर्थ-यशोदा का आशीर्वाद कहियेगा । नंद के प्यारे (कृष्ण) जहां (भी) रहे वही हजारो वर्ष तक जीवित रहें। मुरली तथा दोहनी भर कर घृत दिया और ऊधो ने सिर पर रख लिया । यह घृत उन्ही गायो का है जो कृष्ण को प्रिय थी । ऊधो के चलते हुए दशों दिशाओ से ग्वाल तथा सखा मिलने आये । (यशोदा कहती है) कृष्ण एक बार इस ब्रज को फिर से बसाओ ।।१६५।। उद्धव मथुरा प्रत्यागमन तथा कृष्ण उद्धव संवाद ऊधौ जब ब्रज पहुँचे जाइ । तबकी कथा कृपा करि कहियै, हम सुनिहैं मन लाइ । बावा नंद, जसोदा मैया, मिले कौन हित आइ ? कबहुँ सुरति करत माखन की, किधौं रहे बिसराइ ।
३२८ सूरसागर सार सटीक गोप सखा दधि-भात खात वन, अरु चाखते चखाइ । गऊ बच्छ मुरली सुनि उमड़त, अब जु रहत किहिँ भाड़ । गोपिन गृह व्यवहार बिसारे, मुख सन्मुख मुख पाइ । पलट ओट निमि पर अनखातीँ, यह दुख कहाँ समाइ । एक सखी उनमैं जो राधा, लेति मनहिँ जु चुराइ । सूर स्याम यह बार बार कहि, मनहीँ मन पछिताइ ॥१५६६॥ अर्थ—उद्धव जब ब्रज जा पहुँचे (तब कृष्ण ने कहा) तब की (गोकुल पहुँचने की) कथा कृपा करके कहिये हम मन लगाकर सुनेंगे । बाबा नंद तथा यशोदा माता किस तरह (कितने स्नेह से) आकर मिले । कभी माखन का स्मरण करते है कि भुला दिये । गोप मित्र वन में दही-चावल खाते थे तथा चखाकर चखते थे । गाय तथा बछड़े मुरली (की ध्वनि) सुनकर उमड़ते थे अब किस तरह रहते हैं । मुख के सामने (दर्शन) सम्मुख सुख पाकर गोपियाँ घर के व्यवहार को भुला देती थी । क्षण भर के लिए पलक की ओट होने पर दुःखी होती थी अब यह दुख उनसे कैसे सहा जाता है । उनमें राधा नाम की जो एक सखी है जो मन को चुरा लेती थी (उसकी क्या दशा है) । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण बार-बार यह कहकर मन-ही-मन पछताते हैं ॥१५६६॥ जब मैं इहाँ तैं जु गयौ । तब ब्रजराज सकल गोपी जन, आगैं होइ लयौ । उतरे जाइ नंद बाबा कैँ, सबहीँ सोध लह्यौ । मेरी सौं मोसौँ साँची कहि, मैया कहा कह्यौ ? वारंबार कुसल पूछी मोहिं, लै लै तुम्हरी नाम । ज्यौं जल तृषा बढ़ी चातक चित, कृष्ण-कृष्ण बलराम । सुन्दर परम विचित्र मनोहर, यह मुरली दै घाली । लई उठाइ सुख मानि सूर प्रभु, प्रीति आनि उर साली ॥१५६७॥ अर्थ —(उद्धव उत्तर देते हैं) जब मैं यहाँ से गया तब ब्रजराज (नंद) तथा समस्त गोपीजन आगे हो लिये । (हम) नंद बाबा (के घर जाकर) उतरे तथा सभी बातों को समझा (कृष्ण कहते हैं कि) मेरी सौगंध मुझसे सच कहो, माता ने क्या कहा । (उद्धव कहते हैं) (माता ने) तुम्हारा नाम ले लेकर बार-बार मुझसे कुशल पूछा । जैसे पपीहे के मन में जल की तृष्णा होती है वैसे कृष्ण-कृष्ण तथा बलराम (रटती रहती हैं) उन्होंने परम सुन्दर तथा विचित्र मनोहर मुरली दी है । सूरदास कहते हैं (कि कृष्ण ने) सुख मानकर मुरली उठा ली उनके मन में प्रेम की भावना (चुभ) गयी ॥१५६७॥ सुनियै ब्रज की दसा गुसांईँ । रथ की धुजा पीत-पट भूषन, देखत ही उठि धाईँ । जो तुम कही जोग की बातैं, सो हम सबै बताईँ । श्रवन मूंदि गुन-कर्म तुम्हारे, प्रेम मगन मन गाईँ ।
उद्धव संदेश ३२८ औरौ कछू सँदेस सखी इक, कहत दूरि लौं आई। हुतौ कछू हमहूँ सौं नातौ, निपट कहा बिसराई। सूरदास प्रभु बन विनोद करि, जे तुम गाइ चराई। तें गाई अब ग्वाल न घेरत्त, मानौ भईँ पराई ॥१६८॥ अर्थ—गोस्वामी ब्रज की दशा सुनिये। (गोपियां) रथ की ध्वजा तथा पीला वस्त्र और भूषण देखकर उठकर दौड़ पड़ी। जो तुमने योग की बाते कही थी उन सबको हमने बताया। (उन्होने) कान मूंदकर मन को मग्न करके तुम्हारे गुण और कर्म का गान किया। एक सखी कुछ दूसरा ही संदेश कहते हुए दूर तक चली आई और कहा हमसे भी कुछ नाता था लेकिन हमें बिलकुल ही कैसे भुला दिया। सूरदास कहते हैं (ऊधो कहते हैं) वन मे विनोद करके तुमने जिन गायो को चराया था उन गायो को ग्वाल नही घेरते मानो वे पराई हो गई है ॥१६८॥ ब्रज के बिरही लोग दुखारे। बिन गोपाल ठगे से ठाढ़े, अति दुर्बल तन कारे। नंद जसोदा मारग जोवति, निसि-दिन साँझ सकारे। चहुँ-दिसि कान्ह-कान्ह कहि टेरत, अँसुवन बहत पनारे। गोपी, ग्वाल, गाइ, गो सुत सब, अतिहीँ दीन बिचारे। सूरदास-प्रभु बिनु यौँ देखियत, चंद बिना ज्यौँ तारे ॥१६६॥ अर्थ—ब्रज के विरही लोग दुखित हैं। बिना गोपाल के सब ठगे से खड़े रहे तथा वे शरीर से अत्यन्त दुर्बल तथा काले हो गये हैं। रात-दिन संध्या सबेरे नन्द और यशोदा मार्ग देखते है। चारों दिशाओं मे कान्ह-कान्ह कहकर पुकारती है तथा आंसुओ से परनाले बहते है। गोपी, ग्वाल, गाय तथा बछड़े (आदि) बेचारे अत्यन्त दीन हैं। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण के बिना वे वैसे ही हैं जैसे तारो के बिना चन्द्रमा ॥१६६॥ सुनहु स्याम वै सब ब्रज-बनिता, बिरह तुम्हारैं भईं बावरी। नाहीं बात और कहि आवति, छाँड़ि जहाँ लगि कथा रावरी। कबहूँ कहतिँ हरि माखन खायौ, कौन बसै या कठिन गाँव री। कबहूँ कहतिँ हरि ऊखल बाँधे, घर-घर ते लै चलौ दाँवरी। कबहूँ कहतिँ ब्रजनाथ बन गए, जोवत-मग भई दृष्टि झाँवरी। कबहूँ कहतिँ वा मुरली महियाँ, लै-लै बोलत हमरौ नाँवरी। कबहूँ कहतिँ ब्रजनाथ साथ तैं, चंद उयौ है इहै ठाँवरी। सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस बिनु, अब वह मूरति भई साँवरी ॥१७०॥ अर्थ—कृष्ण सुनो ब्रज की वे सब स्त्रियां तुम्हारे विरह से बावली हो गयी है। आपकी कथा छोडकर उन्हें कोई और बात नही सूझती। कभी कहती है कृष्ण मक्खन खा गये, इस कठिन गाँव मे कौन बसे। कभी कहती हैं कृष्ण ऊखल में बाँधे गये थे घर-घर से दाँवरी ले चलो। कभी कहती हैं कि कृष्ण वन गये, रास्ता जोहते दृष्टि
३३० सूरसागर सार सटीक झुलस गयी । कभी कहती हैं उस मुरली में हमारा नाम ले लेकर पुकारते है । कभी कहती हैं ब्रजनाथ के साथ चन्द्रमा इस स्थान पर उदित होता है । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कृष्ण तुम्हारे दर्शन के बिना, अब वह (राधा) साँवली मूर्ति जैसी हो गयी है ॥१७०॥ फिरि ब्रज बसौ नंदकुमार । हरि तिहारे बिरह राधा, भई तन जरि छार । बिनु अभूषन मैं जु देखी, परी है विकरार । एकई रट रटत भामिनि, पीव पीव पुकार । सजल लोचन चुअत उनकैँ, बहति जमुना धार । विरह अगिनि प्रचंड उनकैँ, जरे हाथ लुंहार । दूसरी गति और नाहीँ, रटति बारंबार । सूर प्रभु कौ नाम उनकैँ, लकुट अंध अधार ॥१७१॥ अर्थ- नन्द कुमार ब्रज मे फिर से बसो । कृष्ण, तुम्हारे विरह मे राधा जलकर राख हो गयी । मैंने उन्हे बिना आभूषण के देखा है वह व्याकुल पडी है (उस) स्त्री को एक ही रट लगी रहती है तथा पीव-पीव पुकारती है । उनके सजल नेत्रो से आंसू चूता है जो कि यमुना की (धारा के समान बहती है) विरह की प्रचंड अग्नि लोहार के हाथ पड़ी (लौह सामग्री की तरह) जलती है । उसकी ओर कोई दूसरी गति नही है । वह बार-बार (कृष्ण का नाम) रटती है । सूरदास कहते है (गोपियों ने कहा है) कि कृष्ण स्वामी हैं तथा उनकी लकुटी अन्धों का आधार है ॥१७१॥ ब्रज तैँ द्वै रितु पै न गई । ग्रीषम अरु पावस प्रवीन हरि, तुम बिनु अधिक भई । ऊर्ध उसास समीर नैन घन, सब जल जोग जुरे । बरषि प्रगट-कीन्हे दुख दादुर, हुते जो दूरि दुरे । बिषम बियोग जु बृष दिनकर सम, हित अति उदौ करै । हरि-पद बिमुख भए सुनि सूरज, को तन ताप हरै ॥१७२॥ अर्थ—ब्रज से दो ऋतुये नही गयी । हे चतुर कृष्ण तुम्हारे विना ग्रीष्म ओर वर्षा (की ऋतुये) संवर्धित (अधिक टिकाऊ) हो गयी हैं । ऊर्ध्व उच्छवास ही पवन है तथा नेत्र बादल है । जल की वर्षा के लिए सभी योग एकत्रित हो गये हैं । बरसकर (इसने) दुख रूपी मेढक को पैदा कर दिया जो कि दूर छिपे हुये थे । विषम वियोग जो ग्रीष्म ऋतु के वृष नक्षत्र के सूर्य के समान है । हृदय मे उदित कर दिया । सूरदास कहते है (ऊधो कहते है कि गोपियो ने कहा है) कृष्ण चरण विमुख हो गये हैं शरीर के ताप को कौन हरे ॥१७२॥ दिन दस घोष चलहु गोपाल । गाइनिकी अवसेरि मिटावहु, मिलहु आपने ग्वाल ।
नाचत नहीं मोर ता-दिन तैं, रटत न बरखा-काल । मृग दुबरे तुम्हरे दरसन बिनु, सुनत न बेनु रसाल । वृन्दावन हरयौ होत न भावत, देख्यौ स्याम तमाल । सूरदास मैया अनाथ है, घर चलियै नँदलाल ॥१७३॥ अर्थ—कृष्ण दस दिन के लिए गाँव चलो। गायों की बेचैनी मिटाओ तथा (साथी) ग्वालों से मिलो। (जिस दिन से आप आये) उसकी दिन से मोर नही नाचते हैं। तथा वर्षा की ऋतु के लिए रट नही लगाते। तुम्हारे दर्शन के बिना हिरन दुर्बल हो गये हैं तथा रसयुक्त बंशी नही सुनते। वृन्दावन को हरा होना नही भाता मैने श्यामल तमाल वृक्षो को देखा। सूरदास कहते हैं (ऊधो कहते हैं) माता यशोदा अनाथ हैं इसलिए हे नन्द लाल घर चलिए ॥१७३॥ ऊधौ भलौ ज्ञान समुझायौ । तुम मोसौँ अब कहा कहत हौ, मैं कहि कहा पठायौ । कहवावत हौ बड़े चतुर पै, उहाँ न कछु कहि आयौ । सूरदास ब्रजबासिन कौ हित, हरि हिय माहँ दुरायौ ॥१७४॥ अर्थ—उद्धव, तुमने अच्छा ज्ञान सिखाया। तुम मुझसे क्या कहते हो और मैंने तुम्हे क्या कहकर भेजा था। तुम बहुत चतुर कहलाते हो लेकिन वहाँ कुछ कहते नही बना। सूरदास कहते हैं (कृष्ण कहते हैं) ब्रजवासियो के लिए (तुमने) कृष्ण को हृदय में छिपा लिया ॥१७४॥ मैं समुझाई अति अपनौ सौ । तदपि उन्हैँ परतीति न उपजी, सबै लख्यौ सपनौ सौ । कही तुम्हारी सबै कही मैं, और कही कछु अपनी । स्रवननि बचन सुनत भइ उनकैँ, ज्यौँ घृत नाएँ अगनी । कोऊ कही बनाइ पचासक, उनकी बात जु एक । धन्य-धन्य ब्रजनारि बापुरी, जिनकी और न टेक । देखत उमग्यौ प्रेम इहाँ कौ, धरै रहे सब ऊली । सूर स्याम हौं रह्यौ थक्यौ सौ, ज्यौँ मृग चौका भूली ॥१७५॥ अर्थ—मैंने अपना जैसा उन्हे खूब समझाया तिस पर भी उनमे विश्वास नही उत्पन्न हुआ। (उन्होंने) सब कुछ स्वप्न के समान देखा। तुम्हारे समस्त कथन को कहा तथा कुछ अपना भी कहा। कानों से वचन सुनते ही उनकी (क्रोधाग्नि या विरहाग्नि) वैसी ही हो गयी जैसे अग्नि में घी डाला जाय । कोई पचास बात बना कर कहो लेकिन उनकी टेक केवल एक बात पर है। बेचारी ब्रज की स्त्रियां धन्य- धन्य हैं जिनकी (कृष्ण के सिवाय) कोई और टेक नही है। देखते ही यहां का प्रेम उमग गया किन्तु उमंग को धारण किये रही। सूरदास कहते हैं (ऊधो कहते हैं) मैं तो चकित सा खड़ा रहा जैसे मृग चौकड़ी भूल गया हो ॥१७५॥
३३२ सूरसागर सार सटीक बातैं सुनहु तौ स्याम सुनाऊँ । जुवतिनि सौं कहि कथा जोग की, क्यों न इती दुख पाऊँ । हौं पचि एक कहौं निरगुन की, ताहू मैं अटकाऊँ । वै उमडैं बारिधि के जल ज्यौं, क्यों हूँ थाह न पाऊँ । कौन कौन कौ उत्तर दीजै, तातैं भज्यौ अगाऊँ । वै मेरे सिर पटिया पारैं, कंथा काहि उढ़ाऊँ । एक अँधरौ, हिय की फूटी, दौरत पहिरि खराऊँ । सूर सकल षट दरसन वै, हौं बारहखरी पढ़ाऊँ ॥१७६॥ अर्थ-कृष्ण (यदि) बाते सुनो तो सुनाऊँ । युवतियों से योग की कथा कहकर क्यो न इतना दुख पाऊँ । मै फिर निर्गुण की एक कथा कहता तो उसी मे उलझ जाता । वे (गोपियाँ) समुद्र के जल की तरह उमडती हैं, उसका थाह कैसे पा सकता हूँ। किसके-किसके (प्रश्न का) उत्तर देता इसीलिए आगे ही भाग आया । वे (गोपियाँ) मेरे सिर मे पाटी (मांग) काढती है कंथा किसको उढाया जाय (मेरी तो वहां वैसी स्थिति थी) जैसे कोई एक तो अन्धा हो दूसरे हृदय की आंखे फूट गई हो तीसरे वह खड़ाऊँ पहन कर दौडे । सूरदास कहते है (ऊधो कहते है) वे गोपियां छहों दर्शन मे पारंगत हैं मैं उन्हे बारह खडी (कैसे) पढाऊँ ॥१७६॥ कहिबे मैं न कछू सक राखी । बुद्धि बिबेक अनुमान अपनैं, मुख आई सो भाषौ । हौं मरि एक कहौं पहरक मैं, वै पल माहिं अनेक । हारि मानि उठि चल्यौ दीन ह्वै, छाँड़ि अपनी टेक । हौं पठयौ कतहूँ बे काजैं, सठ मूरख जु अयानौं । तुमहिं बूझ बहुतै बातनि की, उहाँ जाहु तौ जानौं । श्री मुख के सिखए ग्रंथादिक, ते सब भए कहानी । एक होइ तौ उत्तर दीजै, सूर सु मठी उफानी ॥१७७॥ अर्थ--कहने मे मैंने कुछ भी बाकी नहीं रखा । अपने बुद्धि, विवेक तथा अनु- मान से जो कुछ आया मैंने कहा । मै (जर) मर कर एक प्रहर मे एक कहता लेकिन वे एक पल में अनेक कहती थी । (अन्ततः) हार मानकर अपनी टेक छोड़कर दीन होकर चल पड़े । शठ, मूर्ख, अज्ञानी हमको बिना कार्य के वहां भेज दिया । तुम्हे बहुत बातों का ज्ञान (बूझ) है, किन्तु वहां जाओ तो समझे (कि तुम बुद्धिमान हो) श्री मुख आपके द्वारा ग्रंथादि की बताई बाते सब कहानी मात्र रह गयी। एक होती तो उत्तर भी देता वे एक समूह (मूठी) के रूप मे उमड़ पढी ॥१७७॥ कोऊ सुनत न बात हमारी । मानैं कहा जोग जादवपति, प्रगट प्रेम ब्रजनारी ।
उद्धव संदेश ३३३ कोऊ कहतिँ हरि गए कुंज बन, सैन धाम वै देत । कोऊ कहतिँ इन्द्र वरषा तकि, गिरि गोबर्धन लेत । कोऊ कहतिँ नाग काली सुनि, हरि गए जमुना तीर । कोऊ कहतिँ अघासुर मारन, गए संग बलबीर । कोऊ कहतिँ ग्वाल बालनि सँग, खेलत बनहिँ लुकाने । सूर सुमिरि गुन नाथ तुम्हारे, कोऊ कह्यौ न माने ॥१७८॥ अर्थ-कोई हमारी बात नही सुनती । हे यादव पति वे योग को क्यो मान्यता दे क्योकि (कृष्ण) से ब्रजनारिगो का प्रत्यक्ष (स्पष्ट) प्रेम है। कोई कहती हैं कि कृष्ण जंगल गये हैं, और घर से इशारा करते हैं। कोई कहती है कि इन्द्र की वर्षा को देख कर गोवर्धन पर्वत को लेते हैं। कोई कहती है काली नाग (की पुकार) सुनकर कृष्ण यमुना के तट पर गये हैं। कोई कहती हैं अघासुर को मारने के लिए बलराम के साथ गये हैं। कोई कहती हैं कि ग्वाल बालो के साथ वन मे छिपकर खेलते है। सूरदास कहते है (ऊधो कहते हैं) तुम्हारे गुणों का स्मरण करके कोई कहना नही मानती ॥१७८॥ माधौ जू कहा कहौँ उनकी गति । देखत बनै कहत नहिँ आवै, अति प्रतीति तुम तैँ रति । जद्यपि हौँ षट मास रह्यो ढिग, लही नहीं उनकी मति । तासौँ कहौँ सबै एकै बुधि, परमोदी नहिँ मानति । तुम कृपालु करुनामय कहियत, तातैँ मिलत कहा छति । सूरदास प्रभु सोई कीजै, जातैँ तुम पावहु पति ॥१७९॥ अर्थ-कृष्ण उनकी गति कैसे कहूँ। देखते बनता है किन्तु कहते नही बनता उनका तुममें अत्यधिक विश्वास और प्रेम है। यद्यपि मैं छह महीना आपके पास रहा लेकिन उन जैसी बुद्धि प्राप्त नही की। इसी से कहता हूँ कि वे सभी एक जैसी बुद्धि वाली हैं समझाने पर मानती नही। तुम कृपाल तथा करुणामय कहलाते हो इसलिए उनसे मिलने मे कोई हानि नही। सूरदास कहते हैं (ऊधो कहते हैं) कृष्ण आप वही कीजिए जिससे आपको प्रतिष्ठा मिले ॥१७९॥ ब्रज मैँ एकै धरम रह्यौ । श्रुति सुसृति औ बेद पुराननि, सबै गोविंद कह्यौ । बालक वृद्ध तरुन अबलनि की, एक प्रेम निबह्यौ । सूरदास प्रभु छाँड़ि जमुन जल, हरि की सरन गह्यौ ।१८०॥ अर्थ-ब्रज मे एक ही धर्म व्याप्त था। श्रुति, स्मृति, वेद, पुराण सभी (उनके लिए) गोविंद की ही बात कहते । बालक, वृद्ध, तरुण तथा अबलाओ के एक प्रेम का एक समान निर्वाह हो रहा है। सूरदास कहते है (उद्धव कहते हैं) वे लोग यमुना जल छोडकर कृष्ण की शरण को ग्रहण किए है ॥१८०॥
३३४ सूरसागर सार सटीक तब तैं इन सबहिनि सचु पायौ। जब तैं हरि संदेस तुम्हारौ, सुनत ताँवरौ आयौ। फूले ब्याल दुरे ते प्रगटे, पवन पेट भरि खायौ। खोले मृगनि चौक चरननि के, हुतौ जु जिय बिसरायौ। ऊँचे बैठि बिहंग सभा मैं, सुक बनराइ कहायौ। किलकि-किलकि कुल सहित आपनैं, कोकिल मंगल गायौ। निकसि कंदराहु तैं केहरि, पूँछ मूँड़ पर ल्यायौ। गहवर तैं गजराज आइकै, अंगहिँ गर्व बढ़ायौ। अब जनि गहरु करहु हो मोहन, जौ चाहत हौ ज्यायौ। सूर बहुरि ह्वैहै राधा कौं, सब बैरिनि कौ भायौ ॥१८१॥ अर्थ—जब से कृष्ण (उन्होने) तुम्हारा संदेश (सुना) सुनते ही मूर्छा आ गई तब से इन सबों ने सन्तोष पाया। (राधा के अंग के सभी उपमानो को सुख प्राप्त हुआ) सर्प प्रफुल्लित होकर छिपाव से प्रकट हो गये तथा पेट भर कर पवन का भक्षण किया। मृगों ने चरणों की चौकड़ी जिसे भूल बैठे थे, शुरू कर दी। पक्षियो की सभा मे ऊँचे बैठा तोता वनराज कहलाया। अपने परिवार के साथ किलक-किलक कर कोयल ने मंगल गाया। कन्दरा से सिंह भी निकलकर पूँछ को सिर पर लगाने लगा। गह्वर से हाथी ने भी आकर अपने शरीर मे गर्व को बढ़ा लिया। अब यदि जिलाना चाहते हो तो कृष्ण देर मत करो नही तो फिर राधा की (वही दशा) होगी जैसा सभी वैरियो को इच्छित है ॥१८१॥ माधौ जू मैं अतिही सचु पायौ। अपनौ जानि संदेस ब्याज करि, ब्रज जन मिलन पठायौ। छमा करौ तौ करौं बीनती, उनहिँ देखि जौ आयौ। श्रीमुख ग्यान पंथ जौ उचरचौ, सो पै कछु न सुहायौ। सकल निगम सिद्धांत जन्म क्रम, स्यामा सहज सुनायौ। नहिं श्रुति, सेष, महेस प्रजापति, जो रस गोपिनि गायौ। कटुक-कथा लागी मोहिँ मेरी, वह रस सिंधु उम्हायौ। उत तुम देखे और भाँति मैं, सकल तृषा जु बुझायौ। तुम्हरी अकथ कथा तुम जानी, हम जन नाहिं बसायौ। सूर स्याम सुन्दर यह सुनि कै, नैननि नीर बहायौ ॥१८२॥ अर्थ—माधव (कृष्ण) मैंने जो अत्यधिक सुख पाया (उसका कारण) आपने अपने माध्यम से सदेश के बहाने ब्रज के लोगों से मिलने भेजा था। क्षमा करो तो (वह सब) निवेदन करूँ जिसे ब्रज मे देख आया हूँ। श्री मुख (आपने जो ज्ञान सिखाया था) उस ज्ञान पथ का उच्चारण किया लेकिन वह उन्हे अच्छा नही लगा। जन्मान्तरों के कर्म द्वारा प्राप्त होने वाले समस्त वेदो के सिद्धांत (प्रेम और भक्ति) को राधा ने
उद्धव संदेश ३३५ सहज भाव से सुना दिया । किन्तु जिस रस का गान गोपियो ने किया उसे श्रुति, शेष, महेश, ब्रह्मा आदि किसी ने नही गाया । मुझे ही मेरी कथा कटु लगी । वहाँ रस की सिंधु में नहा लिया । वहाँ मैने तुम्हें और ही तरह देखा तथा अपनी समस्त प्यास बुझा ली । तुम्हारी अकथ कथा तुम्हारे द्वारा ही जानी जा सकती है हम लोगो के बस की नही है । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण ने यह सब सुनकर आंखों से आंसू बहा दिये ॥१८२॥ ब्रज मैंँ संभ्रम मोहिँ भयौ । तुम्हरो ज्ञान सँदेसौ प्रभु जू, सबै जू भूलि गयौ । तुमहीँ सौँ बालक किसोर बपु, मैंँ घर-घर प्रति देख्यौ । मुरलीधर घनस्याम मनोहर, अद्भुत नटवर पेख्यौ । कौतुक रूप ग्वाल वृंदनि सँग, गाइ चरावन जात । सांझ प्रभातहिं गो दोहन मिस, चोरी माखन खात । नँद-नंदन अनेक लीला करि, गोपिनि चित्त चुरावत । वह सुख देखि जु नैन हमारे, ब्रह्म न देख्यौ भावत । करि करुना उन दरसन दीन्हौँ, मैंँ पचि जोग बह्यौ । छन मानहु षट्मास सूर प्रभु, देखत भूलि रह्यौ ॥१८३॥ अर्थ—मुझे ब्रज मे भ्रम हो गया था (इसलिए) तुम्हारे समस्त ज्ञान सन्देश को भूल गया । तुम्हारे समान ही किशोर शरीर वाला बालक मैने हर घर मे देखा । (वहाँ) मुरलीधर मनोहर घनश्याम तथा अद्भुत नटवर को देखा । ग्वालों के साथ क्रीड़ा करते तथा गाये चराते हुए (कृष्ण रूप) को देखा । सन्ध्या तथा प्रातः गाय दुहने के बहाने चोरी से मक्खन खाते (कृष्ण को) देखा । अनेक क्रीडा करके गोपियों के मन को चुराते हैं । उस सुख को देखने के बाद मेरे नेत्रो को ब्रह्म की ओर देखना अच्छा नही लगता । कृपा करके उन लोगों ने दर्शन दिया मैं तो योग मे ही बह गया । हे कृष्ण, उन्हे देखते मैं ऐसा भूल गया कि (मेरे लिए) छः मास मानो एक क्षण के समान हो गया हो (बीत गया हो) ॥१८३॥ ब्रज मैंँ एक अचंभौ देख्यौ । मोर मुकुट पीताबर धारे, तुम गाइनि सँग पेख्यौ । गोप बाल सँग धवत तुम्हरेँ, तुम घर घर प्रति जात । दूध दहीउरु मही लै डारत, चोरी माखन खात । गोपी सब मिलि पकरतिँ तुमकौँ, तुम छुड़ाइ कर भागत । सूर स्याम नित प्रति यह लीला, देखि देखि मन लागत ॥१८४॥ अर्थ—मैने ब्रज मे एक आश्चर्य देखा । (मैने) मोर मुकुट और पीताम्बर धारण किये हुए तुम्हे गायो के साथ देखा । गोप बालक सामूहिक रूप मे तुम्हारी (तुम्हारे घर की ओर) ओर दौड़ते है (फिर) तुम (उनके साथ) प्रत्येक घर मे जाते हो । (तुम) दूध, ओर दही लेकर पृथ्वी पर ढरकाते हो, तथा चोरी का माखन खाते हो । सब गोपियाँ
३३६ सूरसागर सार सटीक
मिलकर तुमको पकड़ती हैं, तुम छुड़ाकर भागते हो। सूरदास (उद्धव के शब्दो) में कहते हैं कि (ब्रज मे) नित्य प्रति (तुम्हारी) सब लीला देख-देख करके मन रम जाता है ।।१८४।। श्रीकृष्ण वचन सुनि ऊधौ मोहिं नैकु न बिसरत, वै ब्रजबासी लोग । तुम उनकौँ कछु भली न कीन्ही, निसि दिन दियौ वियोग । जउ बसुदेव-देवकी मथुरा, सकल राज-सुख भोग । तद्यपि मनहिँ बसत वंसी बट, वन जमुना संजोग । वै उत रहत प्रेम अवलंबन, इत तें पठयौ जोग । सूर उसाँस छांड़ि भरि लोचन, बढ़यौ विरह ज्वर सोग ।।१८५।। अर्थ—उद्धव, सुनो मुझे वे ब्रजवासी जन तनिक भी नही भूलते । तुमने उनका कुछ भला नही किया ,रात-दिन वियोग (की शिक्षा) दिया। यद्यपि वसुदेव तथा देवकी के मथुरा मे समस्त राजभोग है फिर भी मन से वंशी वट वन और मथुरा से संयुक्त रहता हूँ। वे वहाँ प्रेम के आधार पर जीते हैं किन्तु (मैंने यहाँ) से योग भेजा। सूरदास कहते है कृष्ण ने उच्छ्वास छोड़कर आंखों को आंसू से भर लिया तथा (उनका) विरह ज्वर और बढ गया ।।१८५।। ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहींँ । वृन्दावन गोकुल बन उपवन, सघन कुंज की छांहीँ । प्रात समय माता जसुमति अरु, नद देखि सुख पावत । माखन रोटी दह्यौ सजायौ, अति हित साथ खवावत । गोपी ग्वाल बाल सँग खेलत, सब दिन हँसत सिरात । सूरदास धनि-धनि ब्रजवासी, जिनसौँ हित जदुनाथ ।।१८६।। अर्थ--उद्धव, मुझे ब्रज भूलता नही। वृन्दावन, गोकुल वन, उपवन तथा सघन कुजो की छाया (नही भूलती) प्रातः काल माता यशोदा तथा नंद को देखकर सुख पाता था। वे माखन रोटी तथा सजाव (थक्केदार) दही को अत्यधिक स्नेह से खिलाते थे। गोपी तथा ग्वाल-बाल के साथ खेलता था तथा सारा दिन हँसते हुए बीत जाता था। सूरदास कहते हैं कि ब्रज के निवासी धन्य-धन्य हैं जिनसे कृष्ण का प्रेम है ।।१८६।। ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहींँ । हंस सुता को सुदर कगरी, अरु कुंजनि की छाहीँ । वै सुरभी, वै बच्छ दोहनी, खरिक दुहावन जाहीं । ग्वाल-बाल मिलि करत कुलाहल, नाचत गहि गहि बाहींँ। यह मधुरा कंचन की नगरी, मनि मुक्ताहल जाहींँ। जबहिँ सुरति आवति वा सुख की, जिय उमगत तन नाहींँ । अनगन भाँति करी बहु लीला, जसुदा नंद निवाहीँ । सूरदास प्रभु रहै मौन ह्वै, यह कहि कहि पछिताहीँ ।।१८७।।
उद्धव संदेश ३३७ अर्थ—ऊधो मुझे ब्रज भूलता नही। यमुना की सुन्दर कगार और कुंजो की छाया तथा वे गाये तथा वे बछडे, जिन्हे बाड़े मे दुहाने जाते थे हमें नही भूलते । ग्वाल बाल सब के साथ मिलकर कोलाहल करते थे तथा गला पकड़कर नाचते थे। यह मथुरा सोने की नगरी है जहां मणि तथा मुक्ताफल है किन्तु जब उस सुख की याद आती है तो मन उमगता है तथा शरीर (की चेत) नही रहती। ब्रज मे अनेक लीला की नद तथा यशोदा ने सब कुछ निबाहा । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण चुप हो गये और यह कहकर पछताते है ॥१८७॥ जो जन ऊधौ मोहिं न बिसारत, तिहिँ न बिसारौं एक घरी। मेटौँ जनम जनम के संकट, राखौँ सुख आनंद भरी। जो मोहिं भजै भजौँ मैं ताकौं, यह परिमिति मेरे पाइँ परी। सदा सहाइ करौँ वा जन की, गुप्त हुती सो प्रगट करी। ज्यौँ भारत भरुही के अंडा, राखे गज के घंट तरी। सूरजदास ताहि डर काकौ, निसि बासर जो जपत हरी ॥१८८॥ अर्थ - उद्धव, जो लोग मुझे नही भुलाते उन्हे एक घडी भी नही भुलाता। (उनके) जन्म-जन्म के संकट को मिटा दूंगा तथा सुख और आनन्द से भरा रखूंगा। जो मुझे भजता है मैं उसे भजता हूँ यह मर्यादा मेरे पैर पड़ गयी है। उस आदमी की सदा सहायता करता हूँ जो बात गुप्त थी उसे प्रत्यक्ष कर देता हूँ। जैसे महाभारत में टिटहरी के अन्डे को हाथी के घण्टे के नीचे बांधा (वैसी ही) सूरदास कहते हैं कि उसे किसका डर है जो दिन-रात कृष्ण को जपता है ॥१८८॥
२२
द्वारिका चरित द्वारिका प्रयाण बार सत्तरह जरासंध, मथुरा चढ़ि आयौ । गयौ सो सब दिन हारि, जात घर बहुत लजायौ । तब खिस्याइ कै कालजवन, अपनैं सँग ल्यायो । हरि जु कियौ बिचार, सिंधु तट नगर बसायौ । उग्रसेन सब लै कुटुंब, ता ठौर सिधायौ । अमर पुरी तैं अधिक, तहाँ सुख लोगनि पायौ । कालजवन मुचुकुंदहिं सौं, हरि भसम करायौ । बहुरि आइ भरमाइ, अचल रिपु ताहि जरायौ । जरासिंधु हू ह्वाँ तैं पुनि, निज देस सिधायौ । गए द्वारिका स्याम राम, जस सूरुज गायौ ॥१॥ अर्थ—जरासंध सत्रह बार मथुरा पर चढ आया । लेकिन सब दिन (हर बार) हार गया और घर जाते हुए बहुत लजाया । तब खीझकर वह कालयवन को अपने साथ लाया । हरि ने विचार किया ( और ) उन्होंने समुद्र के किनारे (एक) नगर बसाया । उग्रसेन सारा परिवार लेकर उस स्थान को चले गये । वहाँ (पर) लोगो ने अमरपुरी से अधिक सुख पाया । मुचुकुंद के द्वारा हरि ने कालयवन को भस्म करा दिया । फिर आकर (और) भ्रमित करके उस अचल शत्रु को जलाया । जरासिंधु यहाँ से फिर अपने देश चला गया । श्याम और बलराम द्वारिका गये । सूरदास ने (उनके) यश का गान किया है ॥१॥ रुक्मिणी परिणय हरि हरि हरि सुमिरन करौ । हरि चरनाबिंद उर धरौ । हरि सुमिरन जब रुकमिनि कर्यौ । हरि करि कृपा ताहि तब बर्यौ । कहौं सो कथा सुनौ चित लाइ । कहै सुनै सो रहै सुख पाइ । कुंडिनपुर को भीषम राइ । बिस्नु भक्ति कौ तिहिँ चित चाइ । रुक्म आदि ताके सुत पाँच । रुकमिनि पुत्री हरि रंग राँच । नृपति रुक्म सौं कह्यौ बनाइ । कुँवरि जोग बर श्री जदुराइ ।