सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२२ सूरसागर सार सटीक
जब से अक्रूर गये हैं, विरह की तप्त वायु से शरीर क्षरित हो गया है। उद्धव जिसके (शरीर मे) प्रबल काम (व्याप्त) है, सोचते हुए शरीर पीली हल्दी के समान हो गया है। आप कृष्ण के सदा के प्रवीण मित्र है इसलिए परदा खोलकर (बिना किसी रोक टोक के) कहती हूँ। कृष्ण के रूप के दर्शन को त्यागकर (पुनः उसी का) ध्यान करती हूँ अब, (कृष्ण रूपी) संजीवनी (जड़ी) के बिना हम मुर्दा हो गयी है ॥१५१॥ ऊधौ इक पतिया हमरौ लीजै। चरन लागि गोविंद सौं कहियौ, लिखो हमारी दीजै। हम तौ कौन रूप गुन आगरि, जिहिं गुपाल जू रीझैं। निरखत नैन-नीर भरि आए, अरु कंचुकि पट भीजै। तलफत रहतिं मीन चातक ज्यौं, जल बिनु तृषा न छीजै। अति व्याकुल अकुलातिं विरहिनी, सुरति हमारी कीजै। अँखियाँ खरी निहारतिं मधुबन, हरि-बिनु ब्रज विष पीजै। सूरदास-प्रभु कबहिं मिलैंगे, देखि देखि मुख जीजै ॥१५२॥ अर्थ—उद्धव हमारा एक पत्र लीजिए। (कृष्ण के) चरण लगाकर कहना और हमारा लिखा हुआ देना। हम कौन रूप गुण मे अग्रणी है जो कि कृष्ण रीझे। देखते ही गोपियों के नेत्र मे आंसू भर आये और कंचुक का वस्त्र भीगता है। हम (गोपियाँ) मछली तथा चातक की तरह तलफती रहती हैं, जल के बिना (कृष्ण के रूप रस के बिना) प्यास नही बुझती। (हम) विरहिणियां व्याकुल होकर अकुलाती है (कृष्ण) हमारी स्मृति कीजिए। आंखे खड़ी (एकटक) मधुवन को निहारती हैं। कृष्ण के बिना (हम) ब्रज मे विष पी लूंगी। सूरदास कहते है (गोपियां कहती हैं) कृष्ण कब मिलेंगे जिनके मुख को देख-देख कर जिऊंगी ॥१५२॥ हम मति हीन कहा कछु जानैं, ब्रजवासिनी अहीर। वै जु किसोर नवल नागर तन, बहुत भूप की भीर। बचन की लाज सुरति करि राखो, तुम अलि इतनी कहियौ। भली भई जौ दूत पठायौ, इतनी बोल निवहायौ। एक बार तौ मिलौ कृपा करि, जौ अपनौ ब्रज जानौ। यहै रीति ससार सबनि की, कहा रंक कह रानी। हम अनाथ तुम नाथ गुसाईं, राखौ, क्यौं नहिं सोई। षट रितु ब्रज पै आनि पुकारैं, सूरदास अब कोई ॥१५३॥ अर्थ—हम अहीर (जाति की) ब्रजवासिनियां हीन बुद्धि की होने के कारण कैसे कुछ समझे। वे तो किशोर तथा नवल सभ्य नागर (नागरिक हैं) तथा राजा के रूप मे बड़ी जिम्मेदारी को वहन करने वाले हैं, इसलिए हे भ्रमर (उद्धव) उनसे कहना कि वचन की लाज को स्मरण रखेगे। अच्छा हुआ जो कि आपने दूत भेजा (कम से कम) इतनी प्रतिज्ञा तो निभायी। यदि ब्रज को अपना समझो तो कम से कम एक बार तो