भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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उद्धव संदेश ६२९ कृपा करके मिल जाओ । चाहे गरीब हो चाहे धनी सारी दुनियां की यही रीति है । हम अनाथ हैं तथा कृष्ण तुम नाथ हो इसलिए आप उस यश की रक्षा क्यों नही करते । छहो ऋतुये ब्रज में आकर पुकारती है कि अब कोई (विरहिणियो को सहारा देने वाला) है ॥१५३॥ नंद-नंदन सौं इतनी कहियौ । जद्यपि ब्रज अनाथ करि डार्यौ, तद्यपि सुरति किये चित रहियौ । तिनका तोर करहु जनि हम सौं, एक बास की लाज निबहियौ । गुन औगुननि दोष नहिं कीजतु, हम दासिनि की इतनी सहियौ । तुम बिनु प्रान कहा हम करिहैं, यह अवलंब न सुपनेहु लहियौ । सूरदास पाती लिखि पठई, जहाँ प्रीति तहँ ओर निबहियौ ॥१५४॥ अर्थ—कृष्ण से इतना कहना यद्यपि ब्रज को अनाथ कर डाले तब भी चित्त मे स्मरण रखिएगा । हमसे सम्बन्ध विच्छेद मत कीजिए । एक (साथ) निवास की लाज का निर्वाह करिए । गुण तथा अवगुण का दोष (ग्रहण न) करना, हम दासियों (के इतने अपराध को) सहना । तुम्हारे बिना हम प्राण को क्या करेगी यदि स्वप्न मे भी यह (प्राण) आपका अवलम्ब नही प्राप्त करेगा । सूरदास कहते हैं कि (गोपियो ने) पत्र लिखकर भेजा (तथा निवेदन किया) जहाँ प्रीति है (वहाँ) उसका अन्त तक निर्वाह भी होना चाहिए ॥१५४॥ बिनु गुपाल बैरिन भईं कुँजैं । तब वै लता लगति तन सीतल, अब भईं विषम ज्वाल की पुंजैं । वृथा बहति जमुना, खग बोलत, वृथा कमल-फूलनि अलि गुंजैं । पवन, पान, घनसार, सजीवन, दधि-सुत किरनि भानु भईं भुंजैं । यह ऊधौ कहियौ माधौ सौं, मदन मारि कीन्ही हम लुंजैं । सूरदास प्रभु तुम्हारे दरस कौं, मग-जोवत अँखियाँ भईं घुंजैं ॥१५५॥ अर्थ—कृष्ण के बिना सभी कुंज (वन) शत्रु हो गये । तब ये लताये अत्यधिक शीतल लगती थी अब विषम ज्वाला पुंज (के समान्) हो गयी है। यमुना व्यर्थ बहती हैं, पक्षी (व्यर्थ) बोलते है तथा भ्रमर का गूंजना और कमल का खिलना सब व्यर्थ है । पवन, पानी, कपूर, सजीवन (सब दुखकर हो गये) तथा चन्द्रमा की किरणे सूर्य की किरणों के समान (तप्त होकर) भूनती हैं । हे उद्धव कृष्ण से कहना कि काम ने मार कर हमें लुंज कर दिया है । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कि कृष्ण तुम्हारे दर्शन के लिए रास्ता देखते-देखते आंखे घुंघची की भांति रक्त हो गयी हैं ॥१५५॥ ऊधौ इतनी कहियौ बात । मदन गुपाल बिना या ब्रज मैं, होन लगे उतपात । तृनावर्त, बक, बकी, अघासुर, धैनुक फिरि-फिर जात । व्योम, प्रलंब, कंस केसी इत, करत जिअनि की घात ।