सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाली काल-रूप दिखियत है, जमुना जलहिँ अन्हात । बरुन फाँस फाँस्यौ चाहत है, सुनियत अति मुरझात । इंद्र आपने परिहँस कारन, बार-बार अनखात । गोपी, गाइ, गोप, गोसुत सब; थर-थर काँपत गात । अंचल फारति जननि जसोदा, पाग लिये कर तात । लागौ बेगि गुहारि सूर प्रभु, गोकुल बैरिनि घात ॥१५६॥ अर्थ—उद्धव, इतनी बात कहना कि मदन गोपाल (कृष्ण) के बिना ब्रज मे उत्पात होने लगा। तृणावर्त, बक बकी, अघासुर तथा धेनुक (आदि राक्षस) घूम-घूम कर लौट जाते हैं। व्योमासुर, प्रलम्बन तथा कंस, केसी यहाँ जीने की घात लगाये है। यमुना के जल मे स्नान करते समय काली मृत्यु के समान दिखाई देता है। वरुण अपने पाश मे फँसाना चाहता है, सुनकर हम अत्यन्त मुरझाती हैं। इन्द्र अपने परिहास के कारण बार-बार क्रुद्ध होता है। गोपी, गाय, गोप, सभी बछडे शरीर से थर-थर कांपते हैं। माता यशोदा अंचल फाड़ती है तथा पिता हाथ मे पाग लेकर (तुम्हारी आशा देखते हैं) गोकुल मे शत्रुओ का आघात हो रहा है इसलिए हे कृष्ण शीघ्र ही पुकार सुनो ॥१५६॥ ऊधौ इतनी कहियौ जाइ । अति कृसगात भईँ ये तुम बिनु, परम दुखारी गाइ । जल समूह बरषतिँ दोउ अँखियाँ, हूँकति लीन्हें नाउँ । जहाँ जहाँ गो दोहन कीन्हो, सूँघतिँ सोई ठाउँ । परतिँ पछार खाइ छिन ही छिन, अति आतुर ह्वै दीन । मानहु सूर काढ़ि डारी हैं, बारि मध्य तैँ मीन ॥१५७॥ अर्थ—उद्धव, जाकर इतना कहना कि परम दुखी गाये तुम्हारे बिना अत्यधिक दुर्बल शरीर वाली हो गयी हैं। इनकी आंखो से बहुत जल बरसता रहता है तथा तुम्हारा नाम लेते हुंकारती हैं। (आपने) जहां-जहां गोदोहन किया था उन-उन स्थानो को सूंघती है। अत्यधिक आतुर तथा दीन होकर क्षण-क्षण वे (मूर्छा से) पछाड़ खा जाती हैं। (उनकी दशा ऐसी है) मानो जल के बीच से मछली निकाल ली गयी हो ॥१५७॥ अति मलीन बृषभानु-कुमारी । हरि स्रम-जल भीँज्यौ उर-अंचल, तिहिँ लालच न धुवावति सारी । अध मुख रहति अनत नहिँ चितवति, ज्यौँ गथ हारे थकित जुवारी । छूटे चिकुर बदन कुम्हिलाने, ज्यौँ नलिनी हिमकर की मारी । हरि संदेस सुनि सहज मृतक भइ, इक बिरहिनि, दूजे अलि जारी । सूरदास कैसेँ करि जीवैँ, ब्रज बनिता बिन स्याम दुखारी ॥१५८॥ अर्थ—राधा अत्यधिक मलिन हो गयी है। कृष्ण के सात्विक प्रेम जनित श्रम जल (पसीना) से हृदय स्थल का अंचल भीग गया था (उसे सुरक्षित रखने की) लालच से साडी को धुलाती नही हैं। वह सदैव मुख नीचे किये रहती हैं तथा दांव मे हारे हुये