भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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उद्धव संदेश ३२५ जुवारी की तरह अन्यत्र नही देखती हैं। उनके बाल छूट कर (बिखर) गये है शरीर हिम से आहत कमलिनी की तरह कुम्हला गया है। कृष्ण के संदेश को सुनकर वह सहज ही मृतक (तुल्य) हो गयी क्योंकि एक तो वह विरहिणी थी तथा दूसरे भ्रमर (उद्धव के) द्वारा जला दी गयी। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कि दुखी ब्रज बनितायें कृष्ण के बिना कैसे जीवित रहें ॥१५८॥ ऊधौ तिहारे पा लागति हौँ, बहुरिहुँ इहिँ ब्रज करबी भाँवरी । निसि न नीँद भोजन नहिं भावै, चितवत मग भइ दृष्टि झाँवरी । वहै वृन्दावन, वहै कुंज-घन, वहै जमुना, वहै सुभग साँवरी । एक स्याम बिनु कछू न भावै, रटति फिरतिँ ज्यौँ बकति बावरी । चलि न सकति मग डुलत धरत-पग, आवति बैठत उठत ताँवरी । सूरदास-प्रभु आनि मिलावहु, जग मैँ कीरति होइ रावरी ॥१५६॥ अर्थ—उद्धव, तुम्हारे पैर लगती हूँ, पुनः (कृष्ण का समाचार लेकर) इस ब्रज मे चक्कर लगाइएगा क्योकि उनके बिना रात मे नीद नही आती, खाना अच्छा नही लगता; रास्ता निहारते दृष्टि झुलस गयी। वही वृन्दावन है, वही घना कुंज, वही यमुना तथा वही सुन्दर राधा है किन्तु कृष्ण के बिना कुछ भी अच्छा नही लगता। बावली की तरह (कृष्ण का नाम) रटती फिरती हूँ। रास्ता नही चल पाती, कदम रखते पैर हिलता है। उठते बैठते चक्कर आता है। सूरदास कहते है (गोपियाँ कहती है) उद्धव कृष्ण को लाकर मिला दो, संसार मे तुम्हारा यश होगा ॥१५६॥ पूर्ण परिवर्तन तथा यशोदा संदेश अब अति चकितवंत मन मेरौ । आयौ हौँ निरगुन उपदेसन, भयौ सगुन कौ चेरौ । जो मैँ ज्ञान कह्यौ गीता कौ, तुमहिँ न परस्यौ नेरौ । अति अज्ञान कछु कहत न आवै, दूत भयौ हरि केरौ । निज जन जानि मानि जतननि तुम, कीन्हौ नेह घनेरौ । सूर मधुप उठि चले मधुपुरी, बोरि जोग कौ बेरौ ॥१६०॥ अर्थ—अब मेरा मन अत्यधिक चकितवान् हो गया। निर्गुण का उपदेश देने आये थे किन्तु सगुण के सेवक हो गये। मैंने गीता का जो ज्ञान कहा उसने तुम्हे निकट से स्पर्श नही किया। कृष्ण के दूत होते हुए अत्यधिक अज्ञान के कारण मुझसे कुछ कहते नही बनता ! अपना आदमी (स्वजन) जानकर तथा सयत्न आदर देकर तुम लोगो ने घना स्नेह किया। सूरदास कहते हैं कि योग का वेड़ा डुबाकर उद्धव मधुपुरी के लिए रवाना हुए ॥१६०॥ ऊधौ पा लागति हौँ कहियौ, स्यामहिँ इतनी बात । इतनी दूर बसत क्यौँ बिसरे, अपने जननी-तात ।