सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३६ सूरसागर सार सटीक
मिलकर तुमको पकड़ती हैं, तुम छुड़ाकर भागते हो। सूरदास (उद्धव के शब्दो) में कहते हैं कि (ब्रज मे) नित्य प्रति (तुम्हारी) सब लीला देख-देख करके मन रम जाता है ।।१८४।। श्रीकृष्ण वचन सुनि ऊधौ मोहिं नैकु न बिसरत, वै ब्रजबासी लोग । तुम उनकौँ कछु भली न कीन्ही, निसि दिन दियौ वियोग । जउ बसुदेव-देवकी मथुरा, सकल राज-सुख भोग । तद्यपि मनहिँ बसत वंसी बट, वन जमुना संजोग । वै उत रहत प्रेम अवलंबन, इत तें पठयौ जोग । सूर उसाँस छांड़ि भरि लोचन, बढ़यौ विरह ज्वर सोग ।।१८५।। अर्थ—उद्धव, सुनो मुझे वे ब्रजवासी जन तनिक भी नही भूलते । तुमने उनका कुछ भला नही किया ,रात-दिन वियोग (की शिक्षा) दिया। यद्यपि वसुदेव तथा देवकी के मथुरा मे समस्त राजभोग है फिर भी मन से वंशी वट वन और मथुरा से संयुक्त रहता हूँ। वे वहाँ प्रेम के आधार पर जीते हैं किन्तु (मैंने यहाँ) से योग भेजा। सूरदास कहते है कृष्ण ने उच्छ्वास छोड़कर आंखों को आंसू से भर लिया तथा (उनका) विरह ज्वर और बढ गया ।।१८५।। ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहींँ । वृन्दावन गोकुल बन उपवन, सघन कुंज की छांहीँ । प्रात समय माता जसुमति अरु, नद देखि सुख पावत । माखन रोटी दह्यौ सजायौ, अति हित साथ खवावत । गोपी ग्वाल बाल सँग खेलत, सब दिन हँसत सिरात । सूरदास धनि-धनि ब्रजवासी, जिनसौँ हित जदुनाथ ।।१८६।। अर्थ--उद्धव, मुझे ब्रज भूलता नही। वृन्दावन, गोकुल वन, उपवन तथा सघन कुजो की छाया (नही भूलती) प्रातः काल माता यशोदा तथा नंद को देखकर सुख पाता था। वे माखन रोटी तथा सजाव (थक्केदार) दही को अत्यधिक स्नेह से खिलाते थे। गोपी तथा ग्वाल-बाल के साथ खेलता था तथा सारा दिन हँसते हुए बीत जाता था। सूरदास कहते हैं कि ब्रज के निवासी धन्य-धन्य हैं जिनसे कृष्ण का प्रेम है ।।१८६।। ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहींँ । हंस सुता को सुदर कगरी, अरु कुंजनि की छाहीँ । वै सुरभी, वै बच्छ दोहनी, खरिक दुहावन जाहीं । ग्वाल-बाल मिलि करत कुलाहल, नाचत गहि गहि बाहींँ। यह मधुरा कंचन की नगरी, मनि मुक्ताहल जाहींँ। जबहिँ सुरति आवति वा सुख की, जिय उमगत तन नाहींँ । अनगन भाँति करी बहु लीला, जसुदा नंद निवाहीँ । सूरदास प्रभु रहै मौन ह्वै, यह कहि कहि पछिताहीँ ।।१८७।।