भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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उद्धव संदेश ३३५ सहज भाव से सुना दिया । किन्तु जिस रस का गान गोपियो ने किया उसे श्रुति, शेष, महेश, ब्रह्मा आदि किसी ने नही गाया । मुझे ही मेरी कथा कटु लगी । वहाँ रस की सिंधु में नहा लिया । वहाँ मैने तुम्हें और ही तरह देखा तथा अपनी समस्त प्यास बुझा ली । तुम्हारी अकथ कथा तुम्हारे द्वारा ही जानी जा सकती है हम लोगो के बस की नही है । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण ने यह सब सुनकर आंखों से आंसू बहा दिये ॥१८२॥ ब्रज मैंँ संभ्रम मोहिँ भयौ । तुम्हरो ज्ञान सँदेसौ प्रभु जू, सबै जू भूलि गयौ । तुमहीँ सौँ बालक किसोर बपु, मैंँ घर-घर प्रति देख्यौ । मुरलीधर घनस्याम मनोहर, अद्भुत नटवर पेख्यौ । कौतुक रूप ग्वाल वृंदनि सँग, गाइ चरावन जात । सांझ प्रभातहिं गो दोहन मिस, चोरी माखन खात । नँद-नंदन अनेक लीला करि, गोपिनि चित्त चुरावत । वह सुख देखि जु नैन हमारे, ब्रह्म न देख्यौ भावत । करि करुना उन दरसन दीन्हौँ, मैंँ पचि जोग बह्यौ । छन मानहु षट्मास सूर प्रभु, देखत भूलि रह्यौ ॥१८३॥ अर्थ—मुझे ब्रज मे भ्रम हो गया था (इसलिए) तुम्हारे समस्त ज्ञान सन्देश को भूल गया । तुम्हारे समान ही किशोर शरीर वाला बालक मैने हर घर मे देखा । (वहाँ) मुरलीधर मनोहर घनश्याम तथा अद्भुत नटवर को देखा । ग्वालों के साथ क्रीड़ा करते तथा गाये चराते हुए (कृष्ण रूप) को देखा । सन्ध्या तथा प्रातः गाय दुहने के बहाने चोरी से मक्खन खाते (कृष्ण को) देखा । अनेक क्रीडा करके गोपियों के मन को चुराते हैं । उस सुख को देखने के बाद मेरे नेत्रो को ब्रह्म की ओर देखना अच्छा नही लगता । कृपा करके उन लोगों ने दर्शन दिया मैं तो योग मे ही बह गया । हे कृष्ण, उन्हे देखते मैं ऐसा भूल गया कि (मेरे लिए) छः मास मानो एक क्षण के समान हो गया हो (बीत गया हो) ॥१८३॥ ब्रज मैंँ एक अचंभौ देख्यौ । मोर मुकुट पीताबर धारे, तुम गाइनि सँग पेख्यौ । गोप बाल सँग धवत तुम्हरेँ, तुम घर घर प्रति जात । दूध दहीउरु मही लै डारत, चोरी माखन खात । गोपी सब मिलि पकरतिँ तुमकौँ, तुम छुड़ाइ कर भागत । सूर स्याम नित प्रति यह लीला, देखि देखि मन लागत ॥१८४॥ अर्थ—मैने ब्रज मे एक आश्चर्य देखा । (मैने) मोर मुकुट और पीताम्बर धारण किये हुए तुम्हे गायो के साथ देखा । गोप बालक सामूहिक रूप मे तुम्हारी (तुम्हारे घर की ओर) ओर दौड़ते है (फिर) तुम (उनके साथ) प्रत्येक घर मे जाते हो । (तुम) दूध, ओर दही लेकर पृथ्वी पर ढरकाते हो, तथा चोरी का माखन खाते हो । सब गोपियाँ

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