भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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३३० सूरसागर सार सटीक झुलस गयी । कभी कहती हैं उस मुरली में हमारा नाम ले लेकर पुकारते है । कभी कहती हैं ब्रजनाथ के साथ चन्द्रमा इस स्थान पर उदित होता है । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कृष्ण तुम्हारे दर्शन के बिना, अब वह (राधा) साँवली मूर्ति जैसी हो गयी है ॥१७०॥ फिरि ब्रज बसौ नंदकुमार । हरि तिहारे बिरह राधा, भई तन जरि छार । बिनु अभूषन मैं जु देखी, परी है विकरार । एकई रट रटत भामिनि, पीव पीव पुकार । सजल लोचन चुअत उनकैँ, बहति जमुना धार । विरह अगिनि प्रचंड उनकैँ, जरे हाथ लुंहार । दूसरी गति और नाहीँ, रटति बारंबार । सूर प्रभु कौ नाम उनकैँ, लकुट अंध अधार ॥१७१॥ अर्थ- नन्द कुमार ब्रज मे फिर से बसो । कृष्ण, तुम्हारे विरह मे राधा जलकर राख हो गयी । मैंने उन्हे बिना आभूषण के देखा है वह व्याकुल पडी है (उस) स्त्री को एक ही रट लगी रहती है तथा पीव-पीव पुकारती है । उनके सजल नेत्रो से आंसू चूता है जो कि यमुना की (धारा के समान बहती है) विरह की प्रचंड अग्नि लोहार के हाथ पड़ी (लौह सामग्री की तरह) जलती है । उसकी ओर कोई दूसरी गति नही है । वह बार-बार (कृष्ण का नाम) रटती है । सूरदास कहते है (गोपियों ने कहा है) कि कृष्ण स्वामी हैं तथा उनकी लकुटी अन्धों का आधार है ॥१७१॥ ब्रज तैँ द्वै रितु पै न गई । ग्रीषम अरु पावस प्रवीन हरि, तुम बिनु अधिक भई । ऊर्ध उसास समीर नैन घन, सब जल जोग जुरे । बरषि प्रगट-कीन्हे दुख दादुर, हुते जो दूरि दुरे । बिषम बियोग जु बृष दिनकर सम, हित अति उदौ करै । हरि-पद बिमुख भए सुनि सूरज, को तन ताप हरै ॥१७२॥ अर्थ—ब्रज से दो ऋतुये नही गयी । हे चतुर कृष्ण तुम्हारे विना ग्रीष्म ओर वर्षा (की ऋतुये) संवर्धित (अधिक टिकाऊ) हो गयी हैं । ऊर्ध्व उच्छवास ही पवन है तथा नेत्र बादल है । जल की वर्षा के लिए सभी योग एकत्रित हो गये हैं । बरसकर (इसने) दुख रूपी मेढक को पैदा कर दिया जो कि दूर छिपे हुये थे । विषम वियोग जो ग्रीष्म ऋतु के वृष नक्षत्र के सूर्य के समान है । हृदय मे उदित कर दिया । सूरदास कहते है (ऊधो कहते है कि गोपियो ने कहा है) कृष्ण चरण विमुख हो गये हैं शरीर के ताप को कौन हरे ॥१७२॥ दिन दस घोष चलहु गोपाल । गाइनिकी अवसेरि मिटावहु, मिलहु आपने ग्वाल ।