सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनाचत नहीं मोर ता-दिन तैं, रटत न बरखा-काल । मृग दुबरे तुम्हरे दरसन बिनु, सुनत न बेनु रसाल । वृन्दावन हरयौ होत न भावत, देख्यौ स्याम तमाल । सूरदास मैया अनाथ है, घर चलियै नँदलाल ॥१७३॥ अर्थ—कृष्ण दस दिन के लिए गाँव चलो। गायों की बेचैनी मिटाओ तथा (साथी) ग्वालों से मिलो। (जिस दिन से आप आये) उसकी दिन से मोर नही नाचते हैं। तथा वर्षा की ऋतु के लिए रट नही लगाते। तुम्हारे दर्शन के बिना हिरन दुर्बल हो गये हैं तथा रसयुक्त बंशी नही सुनते। वृन्दावन को हरा होना नही भाता मैने श्यामल तमाल वृक्षो को देखा। सूरदास कहते हैं (ऊधो कहते हैं) माता यशोदा अनाथ हैं इसलिए हे नन्द लाल घर चलिए ॥१७३॥ ऊधौ भलौ ज्ञान समुझायौ । तुम मोसौँ अब कहा कहत हौ, मैं कहि कहा पठायौ । कहवावत हौ बड़े चतुर पै, उहाँ न कछु कहि आयौ । सूरदास ब्रजबासिन कौ हित, हरि हिय माहँ दुरायौ ॥१७४॥ अर्थ—उद्धव, तुमने अच्छा ज्ञान सिखाया। तुम मुझसे क्या कहते हो और मैंने तुम्हे क्या कहकर भेजा था। तुम बहुत चतुर कहलाते हो लेकिन वहाँ कुछ कहते नही बना। सूरदास कहते हैं (कृष्ण कहते हैं) ब्रजवासियो के लिए (तुमने) कृष्ण को हृदय में छिपा लिया ॥१७४॥ मैं समुझाई अति अपनौ सौ । तदपि उन्हैँ परतीति न उपजी, सबै लख्यौ सपनौ सौ । कही तुम्हारी सबै कही मैं, और कही कछु अपनी । स्रवननि बचन सुनत भइ उनकैँ, ज्यौँ घृत नाएँ अगनी । कोऊ कही बनाइ पचासक, उनकी बात जु एक । धन्य-धन्य ब्रजनारि बापुरी, जिनकी और न टेक । देखत उमग्यौ प्रेम इहाँ कौ, धरै रहे सब ऊली । सूर स्याम हौं रह्यौ थक्यौ सौ, ज्यौँ मृग चौका भूली ॥१७५॥ अर्थ—मैंने अपना जैसा उन्हे खूब समझाया तिस पर भी उनमे विश्वास नही उत्पन्न हुआ। (उन्होंने) सब कुछ स्वप्न के समान देखा। तुम्हारे समस्त कथन को कहा तथा कुछ अपना भी कहा। कानों से वचन सुनते ही उनकी (क्रोधाग्नि या विरहाग्नि) वैसी ही हो गयी जैसे अग्नि में घी डाला जाय । कोई पचास बात बना कर कहो लेकिन उनकी टेक केवल एक बात पर है। बेचारी ब्रज की स्त्रियां धन्य- धन्य हैं जिनकी (कृष्ण के सिवाय) कोई और टेक नही है। देखते ही यहां का प्रेम उमग गया किन्तु उमंग को धारण किये रही। सूरदास कहते हैं (ऊधो कहते हैं) मैं तो चकित सा खड़ा रहा जैसे मृग चौकड़ी भूल गया हो ॥१७५॥