भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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३३२ सूरसागर सार सटीक बातैं सुनहु तौ स्याम सुनाऊँ । जुवतिनि सौं कहि कथा जोग की, क्यों न इती दुख पाऊँ । हौं पचि एक कहौं निरगुन की, ताहू मैं अटकाऊँ । वै उमडैं बारिधि के जल ज्यौं, क्यों हूँ थाह न पाऊँ । कौन कौन कौ उत्तर दीजै, तातैं भज्यौ अगाऊँ । वै मेरे सिर पटिया पारैं, कंथा काहि उढ़ाऊँ । एक अँधरौ, हिय की फूटी, दौरत पहिरि खराऊँ । सूर सकल षट दरसन वै, हौं बारहखरी पढ़ाऊँ ॥१७६॥ अर्थ-कृष्ण (यदि) बाते सुनो तो सुनाऊँ । युवतियों से योग की कथा कहकर क्यो न इतना दुख पाऊँ । मै फिर निर्गुण की एक कथा कहता तो उसी मे उलझ जाता । वे (गोपियाँ) समुद्र के जल की तरह उमडती हैं, उसका थाह कैसे पा सकता हूँ। किसके-किसके (प्रश्न का) उत्तर देता इसीलिए आगे ही भाग आया । वे (गोपियाँ) मेरे सिर मे पाटी (मांग) काढती है कंथा किसको उढाया जाय (मेरी तो वहां वैसी स्थिति थी) जैसे कोई एक तो अन्धा हो दूसरे हृदय की आंखे फूट गई हो तीसरे वह खड़ाऊँ पहन कर दौडे । सूरदास कहते है (ऊधो कहते है) वे गोपियां छहों दर्शन मे पारंगत हैं मैं उन्हे बारह खडी (कैसे) पढाऊँ ॥१७६॥ कहिबे मैं न कछू सक राखी । बुद्धि बिबेक अनुमान अपनैं, मुख आई सो भाषौ । हौं मरि एक कहौं पहरक मैं, वै पल माहिं अनेक । हारि मानि उठि चल्यौ दीन ह्वै, छाँड़ि अपनी टेक । हौं पठयौ कतहूँ बे काजैं, सठ मूरख जु अयानौं । तुमहिं बूझ बहुतै बातनि की, उहाँ जाहु तौ जानौं । श्री मुख के सिखए ग्रंथादिक, ते सब भए कहानी । एक होइ तौ उत्तर दीजै, सूर सु मठी उफानी ॥१७७॥ अर्थ--कहने मे मैंने कुछ भी बाकी नहीं रखा । अपने बुद्धि, विवेक तथा अनु- मान से जो कुछ आया मैंने कहा । मै (जर) मर कर एक प्रहर मे एक कहता लेकिन वे एक पल में अनेक कहती थी । (अन्ततः) हार मानकर अपनी टेक छोड़कर दीन होकर चल पड़े । शठ, मूर्ख, अज्ञानी हमको बिना कार्य के वहां भेज दिया । तुम्हे बहुत बातों का ज्ञान (बूझ) है, किन्तु वहां जाओ तो समझे (कि तुम बुद्धिमान हो) श्री मुख आपके द्वारा ग्रंथादि की बताई बाते सब कहानी मात्र रह गयी। एक होती तो उत्तर भी देता वे एक समूह (मूठी) के रूप मे उमड़ पढी ॥१७७॥ कोऊ सुनत न बात हमारी । मानैं कहा जोग जादवपति, प्रगट प्रेम ब्रजनारी ।