भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 293, कुल 359 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 293

उद्धव संदेश ३३३ कोऊ कहतिँ हरि गए कुंज बन, सैन धाम वै देत । कोऊ कहतिँ इन्द्र वरषा तकि, गिरि गोबर्धन लेत । कोऊ कहतिँ नाग काली सुनि, हरि गए जमुना तीर । कोऊ कहतिँ अघासुर मारन, गए संग बलबीर । कोऊ कहतिँ ग्वाल बालनि सँग, खेलत बनहिँ लुकाने । सूर सुमिरि गुन नाथ तुम्हारे, कोऊ कह्यौ न माने ॥१७८॥ अर्थ-कोई हमारी बात नही सुनती । हे यादव पति वे योग को क्यो मान्यता दे क्योकि (कृष्ण) से ब्रजनारिगो का प्रत्यक्ष (स्पष्ट) प्रेम है। कोई कहती हैं कि कृष्ण जंगल गये हैं, और घर से इशारा करते हैं। कोई कहती है कि इन्द्र की वर्षा को देख कर गोवर्धन पर्वत को लेते हैं। कोई कहती है काली नाग (की पुकार) सुनकर कृष्ण यमुना के तट पर गये हैं। कोई कहती हैं अघासुर को मारने के लिए बलराम के साथ गये हैं। कोई कहती हैं कि ग्वाल बालो के साथ वन मे छिपकर खेलते है। सूरदास कहते है (ऊधो कहते हैं) तुम्हारे गुणों का स्मरण करके कोई कहना नही मानती ॥१७८॥ माधौ जू कहा कहौँ उनकी गति । देखत बनै कहत नहिँ आवै, अति प्रतीति तुम तैँ रति । जद्यपि हौँ षट मास रह्यो ढिग, लही नहीं उनकी मति । तासौँ कहौँ सबै एकै बुधि, परमोदी नहिँ मानति । तुम कृपालु करुनामय कहियत, तातैँ मिलत कहा छति । सूरदास प्रभु सोई कीजै, जातैँ तुम पावहु पति ॥१७९॥ अर्थ-कृष्ण उनकी गति कैसे कहूँ। देखते बनता है किन्तु कहते नही बनता उनका तुममें अत्यधिक विश्वास और प्रेम है। यद्यपि मैं छह महीना आपके पास रहा लेकिन उन जैसी बुद्धि प्राप्त नही की। इसी से कहता हूँ कि वे सभी एक जैसी बुद्धि वाली हैं समझाने पर मानती नही। तुम कृपाल तथा करुणामय कहलाते हो इसलिए उनसे मिलने मे कोई हानि नही। सूरदास कहते हैं (ऊधो कहते हैं) कृष्ण आप वही कीजिए जिससे आपको प्रतिष्ठा मिले ॥१७९॥ ब्रज मैँ एकै धरम रह्यौ । श्रुति सुसृति औ बेद पुराननि, सबै गोविंद कह्यौ । बालक वृद्ध तरुन अबलनि की, एक प्रेम निबह्यौ । सूरदास प्रभु छाँड़ि जमुन जल, हरि की सरन गह्यौ ।१८०॥ अर्थ-ब्रज मे एक ही धर्म व्याप्त था। श्रुति, स्मृति, वेद, पुराण सभी (उनके लिए) गोविंद की ही बात कहते । बालक, वृद्ध, तरुण तथा अबलाओ के एक प्रेम का एक समान निर्वाह हो रहा है। सूरदास कहते है (उद्धव कहते हैं) वे लोग यमुना जल छोडकर कृष्ण की शरण को ग्रहण किए है ॥१८०॥