सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउद्धव संदेश ३२८ औरौ कछू सँदेस सखी इक, कहत दूरि लौं आई। हुतौ कछू हमहूँ सौं नातौ, निपट कहा बिसराई। सूरदास प्रभु बन विनोद करि, जे तुम गाइ चराई। तें गाई अब ग्वाल न घेरत्त, मानौ भईँ पराई ॥१६८॥ अर्थ—गोस्वामी ब्रज की दशा सुनिये। (गोपियां) रथ की ध्वजा तथा पीला वस्त्र और भूषण देखकर उठकर दौड़ पड़ी। जो तुमने योग की बाते कही थी उन सबको हमने बताया। (उन्होने) कान मूंदकर मन को मग्न करके तुम्हारे गुण और कर्म का गान किया। एक सखी कुछ दूसरा ही संदेश कहते हुए दूर तक चली आई और कहा हमसे भी कुछ नाता था लेकिन हमें बिलकुल ही कैसे भुला दिया। सूरदास कहते हैं (ऊधो कहते हैं) वन मे विनोद करके तुमने जिन गायो को चराया था उन गायो को ग्वाल नही घेरते मानो वे पराई हो गई है ॥१६८॥ ब्रज के बिरही लोग दुखारे। बिन गोपाल ठगे से ठाढ़े, अति दुर्बल तन कारे। नंद जसोदा मारग जोवति, निसि-दिन साँझ सकारे। चहुँ-दिसि कान्ह-कान्ह कहि टेरत, अँसुवन बहत पनारे। गोपी, ग्वाल, गाइ, गो सुत सब, अतिहीँ दीन बिचारे। सूरदास-प्रभु बिनु यौँ देखियत, चंद बिना ज्यौँ तारे ॥१६६॥ अर्थ—ब्रज के विरही लोग दुखित हैं। बिना गोपाल के सब ठगे से खड़े रहे तथा वे शरीर से अत्यन्त दुर्बल तथा काले हो गये हैं। रात-दिन संध्या सबेरे नन्द और यशोदा मार्ग देखते है। चारों दिशाओं मे कान्ह-कान्ह कहकर पुकारती है तथा आंसुओ से परनाले बहते है। गोपी, ग्वाल, गाय तथा बछड़े (आदि) बेचारे अत्यन्त दीन हैं। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण के बिना वे वैसे ही हैं जैसे तारो के बिना चन्द्रमा ॥१६६॥ सुनहु स्याम वै सब ब्रज-बनिता, बिरह तुम्हारैं भईं बावरी। नाहीं बात और कहि आवति, छाँड़ि जहाँ लगि कथा रावरी। कबहूँ कहतिँ हरि माखन खायौ, कौन बसै या कठिन गाँव री। कबहूँ कहतिँ हरि ऊखल बाँधे, घर-घर ते लै चलौ दाँवरी। कबहूँ कहतिँ ब्रजनाथ बन गए, जोवत-मग भई दृष्टि झाँवरी। कबहूँ कहतिँ वा मुरली महियाँ, लै-लै बोलत हमरौ नाँवरी। कबहूँ कहतिँ ब्रजनाथ साथ तैं, चंद उयौ है इहै ठाँवरी। सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस बिनु, अब वह मूरति भई साँवरी ॥१७०॥ अर्थ—कृष्ण सुनो ब्रज की वे सब स्त्रियां तुम्हारे विरह से बावली हो गयी है। आपकी कथा छोडकर उन्हें कोई और बात नही सूझती। कभी कहती है कृष्ण मक्खन खा गये, इस कठिन गाँव मे कौन बसे। कभी कहती हैं कृष्ण ऊखल में बाँधे गये थे घर-घर से दाँवरी ले चलो। कभी कहती हैं कि कृष्ण वन गये, रास्ता जोहते दृष्टि