भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 288

३२८ सूरसागर सार सटीक गोप सखा दधि-भात खात वन, अरु चाखते चखाइ । गऊ बच्छ मुरली सुनि उमड़त, अब जु रहत किहिँ भाड़ । गोपिन गृह व्यवहार बिसारे, मुख सन्मुख मुख पाइ । पलट ओट निमि पर अनखातीँ, यह दुख कहाँ समाइ । एक सखी उनमैं जो राधा, लेति मनहिँ जु चुराइ । सूर स्याम यह बार बार कहि, मनहीँ मन पछिताइ ॥१५६६॥ अर्थ—उद्धव जब ब्रज जा पहुँचे (तब कृष्ण ने कहा) तब की (गोकुल पहुँचने की) कथा कृपा करके कहिये हम मन लगाकर सुनेंगे । बाबा नंद तथा यशोदा माता किस तरह (कितने स्नेह से) आकर मिले । कभी माखन का स्मरण करते है कि भुला दिये । गोप मित्र वन में दही-चावल खाते थे तथा चखाकर चखते थे । गाय तथा बछड़े मुरली (की ध्वनि) सुनकर उमड़ते थे अब किस तरह रहते हैं । मुख के सामने (दर्शन) सम्मुख सुख पाकर गोपियाँ घर के व्यवहार को भुला देती थी । क्षण भर के लिए पलक की ओट होने पर दुःखी होती थी अब यह दुख उनसे कैसे सहा जाता है । उनमें राधा नाम की जो एक सखी है जो मन को चुरा लेती थी (उसकी क्या दशा है) । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण बार-बार यह कहकर मन-ही-मन पछताते हैं ॥१५६६॥ जब मैं इहाँ तैं जु गयौ । तब ब्रजराज सकल गोपी जन, आगैं होइ लयौ । उतरे जाइ नंद बाबा कैँ, सबहीँ सोध लह्यौ । मेरी सौं मोसौँ साँची कहि, मैया कहा कह्यौ ? वारंबार कुसल पूछी मोहिं, लै लै तुम्हरी नाम । ज्यौं जल तृषा बढ़ी चातक चित, कृष्ण-कृष्ण बलराम । सुन्दर परम विचित्र मनोहर, यह मुरली दै घाली । लई उठाइ सुख मानि सूर प्रभु, प्रीति आनि उर साली ॥१५६७॥ अर्थ —(उद्धव उत्तर देते हैं) जब मैं यहाँ से गया तब ब्रजराज (नंद) तथा समस्त गोपीजन आगे हो लिये । (हम) नंद बाबा (के घर जाकर) उतरे तथा सभी बातों को समझा (कृष्ण कहते हैं कि) मेरी सौगंध मुझसे सच कहो, माता ने क्या कहा । (उद्धव कहते हैं) (माता ने) तुम्हारा नाम ले लेकर बार-बार मुझसे कुशल पूछा । जैसे पपीहे के मन में जल की तृष्णा होती है वैसे कृष्ण-कृष्ण तथा बलराम (रटती रहती हैं) उन्होंने परम सुन्दर तथा विचित्र मनोहर मुरली दी है । सूरदास कहते हैं (कि कृष्ण ने) सुख मानकर मुरली उठा ली उनके मन में प्रेम की भावना (चुभ) गयी ॥१५६७॥ सुनियै ब्रज की दसा गुसांईँ । रथ की धुजा पीत-पट भूषन, देखत ही उठि धाईँ । जो तुम कही जोग की बातैं, सो हम सबै बताईँ । श्रवन मूंदि गुन-कर्म तुम्हारे, प्रेम मगन मन गाईँ ।