भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 287, कुल 359 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 287

उद्धव संदेश ३२७ घुमली, पीली, काली गाये वन-वन घूमती हैं । अब अपनी समझ कर आकर सम्हालो तथा मन में चेतनता (जिम्मेदारी) धारण करो । तुम जग के जीवों के प्रतिपालक हो निष्ठुरता मत कीजिये । ग्वाल-बाल, बछड़े तथा गाये बिलखती हैं । सूरदास कहते हैं (यशोदा कहती है) कृष्ण उन्हे दर्शन दीजिए ।।१६३।। तब तैं छीन सरीर सुबाहु । आधी भोजन सुबल करत हैं, सब ग्वालनि उर दाहु । नंद गोप पिछवारे डोलत, नैननि नीर प्रवाहु । आनंद मिट्यौ मिटी सब लीला, काहू मन न उछाहू । एक बेर बहुरौ ब्रज आवहु, दूध पतूखी खाहु । सूर सपथ गोकुल जौ पैठहु, उलटि मधुपुरी जाहु ॥१६४॥ अर्थ-तब से सुबाहु (नाम के तुम्हारे मित्र) का शरीर क्षीण हो रहा है । सुवल (नामक मित्र भी) आधा (पेट) भोजन करता है (इस तरह) सभी ग्वालों के हृदय मे पीड़ा (जलन) है। नंद तथा गोप नैनो से आंसू का प्रवाह लिये पिछवाड़े घूमते रहते हैं (तुम्हारे चले जाने से) सारा आनन्द तथा समस्त लीला मिट गयी, किसी के भी मन मे उत्साह नही है । एक बार फिर ब्रज आओ तथा पत्ते के दोने मे दूध पियो । सूरदास कहते हैं (यशोदा कहती हैं) कि सौगन्ध है जब कि तुम्हे गोकुल मे अधिक देर तक पैठना (रुकना) पड़े (शीघ्र ही) लौटकर मधुपुरी चले जाना ॥१६४॥ कहियौ जसुमति की आसीस । जहाँ रहौ तहँ नंद लाड़िलौ, जीवौ कोटि बरीस । मुरली दई दोहनी घृत भरि, ऊधौ धरि लइ सीस । यह तौ घृत उनही सुरभिनि कौ, जे प्यारी जगदीस । ऊधौ चलत सखा मिलि आए, ग्वाल बाल दस-दीस । अबकैं यह ब्रज फेरि बसावहु, सूरदास के ईस ।।१६५।। अर्थ-यशोदा का आशीर्वाद कहियेगा । नंद के प्यारे (कृष्ण) जहां (भी) रहे वही हजारो वर्ष तक जीवित रहें। मुरली तथा दोहनी भर कर घृत दिया और ऊधो ने सिर पर रख लिया । यह घृत उन्ही गायो का है जो कृष्ण को प्रिय थी । ऊधो के चलते हुए दशों दिशाओ से ग्वाल तथा सखा मिलने आये । (यशोदा कहती है) कृष्ण एक बार इस ब्रज को फिर से बसाओ ।।१६५।। उद्धव मथुरा प्रत्यागमन तथा कृष्ण उद्धव संवाद ऊधौ जब ब्रज पहुँचे जाइ । तबकी कथा कृपा करि कहियै, हम सुनिहैं मन लाइ । बावा नंद, जसोदा मैया, मिले कौन हित आइ ? कबहुँ सुरति करत माखन की, किधौं रहे बिसराइ ।