सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४२ सूरसागर सार सटीक बलभद्र ब्रज यात्रा स्याम राम के गुन नित गाऊँ । स्याम राम ही सौं चित लाऊँ । एक बार हरि निज पुर छाए । हलधर जी बृन्दावन गए । रथ देखत लोगनि सुख पाए । जान्यौ स्याम राम दोउ आए । नन्द जसोमति जब सुधि पाई । देह गेह की सुरति भुलाई । आगैं ह्वै लैबे कौं धाए । हलधर दौरि चरन लपटाए । बल कौं हित करि गरैं लगाए । दै असीस बोले या भाए । तुम तौ भली करी बलराम । कहाँ रहे मन मोहन स्याम । देखो कान्हर की निठुराई । कबहुँ पाती हू न पठाई । आपु जाइ ह्वाँ राजा भए । हमकौं बिछुरि बहुत दुख दए । कहौ कबहुँ हमरी सुधि करत । हम तौ उन बिनु बहु दुख भरत । कहा करैं ह्वाँ कोउ न जात । उन बिनु पल पल जुग सम जात । इहिँ अन्तर आए सब ग्वार । भेंटे सबनि जथा ब्यौहार । नमस्कार काहूँ कौ कियौ । काहू कौं अंकम भरि लियौ । पुनि गोपी जुरि मिलि सब आईँ । तिन हित साथ असीस सुनाईँ । हरि सुधि करि सुधि बुधि बिसराई । तिनकौ प्रेम कह्यौ नहिं जाई । कोउ कहै हरि ब्याही बहु नार । तिनकौ बढ़्यौ बहुत परिवार । उनकौं यह हम देतिँ असीस । सुख सौं जीवैं कोटि बरीस । कोउ कहै हरि नाहीँ हम चीन्हौ । बिनु चीन्हैं उनकौं मन दीन्हौ । निसि दिन रोवत हमैँ बिहाइ । कहौ करैं अब कहा उपाइ । कोउ कहै इहाँ चरावत गाइ । राजा भए द्वारिका जाइ । काहे कौं वै आवैं इहाँ । भोग बिलास करत नित उहाँ । कोउ कहै हरि रिपु छै किए । अरु मित्रनि कौ बहु सुख दिए । बिरह हमारौ कहँ रहि गयौ । जिन हमकौं अति हीँ दुख दयौ । कोउ कहै जे हरि की रानी । कौन भाँति हरि कौं पतियानी । कोऊ चतुर नारि जो होइ । करै नहीं पतिआरी सोइ । कोउ कहै हम तुम कत पतियाईँ । उनकैं हित कुल लाज गवाईँ । हरि कछु ऐसौ टोना जानत । सबकौं मन अपनैं बस आनत । कोउ कहै हरि हम सब बिसराईं । कहा कहैं कछु कह्यौ न जाई । हरिकौं सुमिरि नयन जल धारैं । नैंकु नहीँ मन धीरज धारैं । यह सुनि हलधर धीरज धारि । कह्यौ आइहैं हरि निरधारि । जब बल यह संदेस सुनायौ । तब कछु इक मन धीरज आयौ । बल तहं बहुरि रहे द्वै मास । ब्रज बासिनि सौं करत विलास । सब सौं मिलि पुनि निजपुर आए । सूरदास हरि के गुन गाए ॥८॥