भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 303, कुल 359 में से

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पृष्ठ 303

द्वारिका चरित ३४३ अर्थ—श्याम (और) बलराम के गुणों को नित्य गाता हूँ (तथा) श्याम और बलराम में ही चित्त लगाता हूँ । एक बार (जब) हरि अपने पुर (मथुरा) में छाये थे (विद्यमान थे) हलधर जी वृन्दावन गये (आए) रथ देखते ही (वृन्दावन) के लोगों ने सुख पाया, समझा (कि) श्याम और बलराम दोनों आये हैं । नद (तथा) यशोदा ने जब खबर पायी तो उन्होने (प्रसन्नता से) (अपने) शरीर तथा घर की स्मृति भुला दी । दोनो आगे होकर लेने को दोडे । हलधर दौड़कर (उनके) चरणों से लिपट गये (नंद यशोदा ने) वलराम को स्नेह-पूर्वक गले से लगाया, (और) आशीर्वाद देकर इस प्रकार बोले । वलराम ! तुमने तो अच्छा किया (आ गए), लेकिन मनमोहन श्याम कहाँ रह गये ! कृष्ण की निष्ठुरता (तो) देखो, कभी पत्र भी नही भेजा । स्वयं तो वहाँ जाकर राजा हो गए, (लेकिन) बिछुड़कर हमको बहुत दुख दिया । कहो, (श्याम) कभी हमारा स्मरण करते हैं । हम तो उनके बिना बहुत दुख भोगते हैं । क्या करे, (यहाँ से) वहाँ कोई जाता नहीं, उनके बिना पल-पल युग के समान बीतता है । इसी बीच सभी ग्वाल आये (तथा) सबों ने यथाविधि भेट की (बलराम ने) किसी को नमस्कार किया, किसी को गले लगाया। फिर सब गोपियां मिलकर आईं, उन्होने प्रेमपूर्वक मंगल कामनाएं की । हरि का स्मरण करके (गोपियो की) सुध-बुध भूल गयी । उनके प्रेम को कहा नही जाता । कोई कहती है (कि) हरि ने बहुत-सी स्त्रियों से विवाह कर लिया है, (तथा) उनका परिवार बहुत बढ़ गया है ! उनको हम यह आशीर्वाद देती है (कि) (वे) सुखपूर्वक करोड़ो वर्ष जिये। कोई कहती हैं (कि) हरि ने हमें पहचाना नही; बिना पहचाने (हमने) (उन्हे) मन दे दिया । हमारा (समय) रात-दिन रोते ही व्यतीत होता है। कहो अब क्या उपाय करे । कोई कहती है (कि) गाय चराते थे द्वारिका जाकर राजा हो गये ! वे यहाँ क्यो आये, वहाँ नित्य भोग विलास करते हैं । कोई कहती है कि हरि ने शत्रुओ का नाश किया (तथा) मित्रो को बहुत सुख दिया । हमारा विरह कहाँ रह गया, जिन्होने हमे बहुत दुख दिया । कोई कहती है (कि) जो हरि की रानी हैं (उन्होंने) हरि पर कैसे विश्वास किया ? यदि कोई चतुर स्त्री होती तो उन पर विश्वास न करती । कोई (आपस मे) कहती है (कि) हमने-तुमने (उन पर) कैसे विश्वास किया; उनके लिए (अपने) कुल की लाज गंवा दी । हरि कुछ ऐसा टोना जानते हैं (जिससे) सबके मन को अपने वश मे कर लेते हैं । कोई कहती हैं (कि) हरि ने हम सब को भुला दिया, क्या कहे, कुछ कहा नही जाता ! हरि का स्मरण करके नयनो मे जल ढालती है। मन, तनिक भी, धीरज नही मानता। यह सुनकर हलधर ने धीरज धरकर कहा कि हरि निश्चित आयेगे । जब बलराम ने यह संदेश सुनाया तब मन मे थोड़ा-सा धीरज आया ! बलराम वहाँ दो महीने रहे (तथा) ब्रजवासियो से विलास करते रहे । सब से मिलकर फिर अपने पुर (मथुरा) आये, सूरदास ने (इस प्रकार) हरि का गुणगान किया ॥८॥

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