सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
पृष्ठ 305, कुल 359 में से
संदर्भ में पढ़ेंदरस परस हम भए सभागे, रह्यो न मन मैं एकहु पोर । सूर सुमति तंदुल चाबत हौं, कर पकर्यो कमला भई धीर ॥११॥ अर्थ—बल राम के भाई (कृष्ण) ने दूर से ही मलिन वस्त्र तथा क्षीण शरीर वाले अपने बाल मित्र सुदामा को देखा। परम रुचिकर पलंग पर लेटे थे, पास में (बैठी) रुक्मिणी चमर डुला रही थीं ! (कृष्ण ने) आकुल होकर (तथा) उठकर (सुदामा की) अगवानी की, मिलते ही (उनके) नेत्र जल से भर आये । (उसे) अपने आसन पर बिठा कर कृष्ण ने कुशल पूछी; धीर मति (सुदामा ने) बताया । (कृष्ण ने कहा) (कि) जो कुछ लाये हो उसे हमको क्यों नही देते, वस्त्र में क्या छिपाने लगे ? हम दर्शन (तथा) स्पर्श से सौभाग्यशाली हो गये, मन में एक भी पीड़ा नही रही । सूरदास (कहते हैं) (कि) सुमति (कृष्ण) को चावल चबाते देख कमला ने धीर (अधीर) होकर हाथ पकड़ लिया ॥११॥
ऐसी प्रीति की बलि जाऊँ । सिंहासन तजि चले मिलन कौं, सुनत सुदामा नाउँ । कर जोरे हरि विप्र जानि कै, हित करि चरन पखारे । अंकमाल दै मिले सुदामा, अर्धासन बैठारे । अर्धांगी पूछति मोहन सौं, कैसे हितू तुम्हारे । तन अति छीन मलीन देखियत, पाउँ कहाँ तैं धारे । संदीपन कैं हमऽरु सुदामा, पढ़े एक चटसार । सूर स्याम की कौन चलावै, भक्तनि कृपा अपार ॥१२॥
अर्थ—ऐसी प्रीति की (मैं) बलि जाता हूँ। सुदामा का नाम सुनकर (कृष्ण) सिंहासन छोड़कर मिलने चले । हरि ने (सुदामा को) ब्राह्मण जानकर हाथ जोड़े (उसे प्रणाम किया), (तथा) स्नेहपूर्वक चरण धोये । गले लगाकर सुदामा से मिले तथा अर्धासन (आधे आसन) पर (उसे) बिठाया । अर्द्धांगिनी ने कृष्ण से पूछा (कि) ये कैसे तुम्हारे मित्र हुए ? (इनका) शरीर अत्यन्त क्षीण है, मलिन दिखाई देते हैं, ये कहाँ से पधारे हैं ? (कृष्ण ने उत्तर दिया) हम और सुदामा संदीपन (ऋषि) के शिष्य हैं। एक ही पाठशाला में पढ़ते थे । सूरदास (कहते है) (कि) कृष्ण की (बात) कौन चलाये भक्तो पर (इनकी) अपार कृपा (रहती है) ॥१२॥
गुरु-गृह हम जब बन कौं जात । जोरत हमरे बदलैं लकरी, सहि सब दुख निज गात । एक दिवस बरषा भई बन मैं, रहि गए ताही ठौर । इनकी कृपा भयौ नहिं मोहिं श्रम, गुरु आए भए भोर । सो दिन मोहिं विसरत न सुदामा, जौ कीन्हौ उपकार । प्रति उपकार कहा करौं सूरजु, भाषत आप मुरार ॥१३॥