सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४६ सूरसागर सार सटीक अर्थ—गुरु के घर (से) जब हम वन जाते थे, (तब) हमारे बदले (ये) सब दुख सहकर लकड़ी जोड़ते (एकत्र करते) थे । एक दिन वन में वर्षा हुई, (हम लोग) उसी स्थान पर रह गये । इनकी कृपा से मुझे श्रम नही हुआ, प्रातः होने पर गुरु (के घर) आये । उस दिन सुदामा ने जो उपकार किया वह मुझे भूलता नही ! मुरारि (कृष्ण) स्वयं कहते हैं कि प्रत्युपकार (बदले) (के रूप) मे क्या करूँ ? ।।१३।। सुदामा गृह कौँ गमन कियौ । प्रगट बिप्र कौँ कछु न जनायौ, मन मैं बहुत दियौ । वेई चीर कुचील वहै विधि, मोकौँ कहा भयौ । धरिहौँ कहा जाय तिय आगैँ, भरि भरि लेत हियौ । सो संतोष मानि मन हीँ मन, आदर बहुत लियौ । सूरदास कीन्हे करनी बिनु, को पतियाइ बियौ ।।१४।। अर्थ—सुदामा ने घर के लिए प्रस्थान किया । प्रकट रुप मे विप्र को कुछ नही बताया, (लेकिन) मन मे बहुत दिया । (सुदामा सोचते है) वही मैले वस्त्र, वही विधि मुझे हुआ ही क्या (क्या मिला) ? पत्नी के आगे जाकर क्या रखूंगा; (सुदामा का) हृदय (दुख) से भर-भर आता था । (सुदामा ने) मन-ही-मन इस (बात पर) संतोष किया (कि) (कृष्ण ने) बहुत आदर से (मुझे) लिया (मेरा बहुत आदरपूर्वक स्वागत किया) । सूरदास (कहते है) (कि) करणी किये बिना दूसरा कौन विश्वास करेगा । (सुदामा सोचते है कि कृष्ण के अतिरिक्त दूसरा ऐसा कौन है जो मुझे जैसे अकर्मण्य का विश्वास कर इतना आदर देगा) ।।१४।। सुदामा मंदिर देखि डरचौ । इहाँ हुती मेरी तनक मड़ैया, को नृप आनि छरचौ । सीस धुनै दोऊ कर मीँड़े, अंतर सोच परचौ । ठाढ़ी तिया जु मारग जोवै, ऊँचै चरन धरयौ । तोहिँ आदरचौ त्रिभुवन कौ नायक, अब क्यौँ जात फिरचौ । सूरदास प्रभु की यह लीला, दारिद दुःख हरचौ ।।१५।। अर्थ—(घर लोटने पर) सुदामा मंदिर (अपना घर) देखकर डर गया ! यहां मेरी छोटी सी मड़इया थी, किस नृप ने आकर छल किया (छीन लिया) । (वे) सिर घुमाते हैं, दोनो हाथ मलते है, मन के भीतर सोचने लगे । चरणो को ऊँचा करके (ऊंचे स्थान पर खड़ी होकर) स्त्री खडी हुई मार्ग जोह रही है । (उसने कहा) त्रिभुवन के नायक ने आदर दिया अब (घर से) क्यो वापस जाते हो ! सूरदास (कहते हैं) (कि) यह प्रभु (कृष्ण) की लीला है कि (उन्होंने) (समस्त) दुख-दरिद्रता को हर लिया ।।१५।। हौँ फिरि बहुरि द्वारिका आयौ । समुझि न परी मोहिँ मारग की, कोउ बूझौ न बतायौ ।