भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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३० सूरसागर सार सटीक परम पवित्र गंगा का परित्याग करके दुर्बुद्धि प्यासा ही (प्यास बुझाने के लिए) कुआँ खोदने जा सकता है । जिस भौरे ने कमल के मकरंद का स्वाद पा लिया है उसे करील के (कसैले) फल क्यो अच्छे लगेगे ? सूरदास कहते हैं कि प्रभु, कामधेनु का त्याग करके बकरी कौन दुहावेगा ? अर्थात् सुलभ तथा आनन्द-प्रद हरि-भक्ति को छोडकर कष्टकर तथा अवांछित अन्य देवों की भक्ति के चक्कर मे पडने से बढकर कोई मूर्खता नही हो सकती ॥२५॥ हमैँ नंदनंदन मोल लिए। जम के फंद काटि मुकराए, अभय अजाद किये। भाल तिलक, श्रवननि तुलसीदल, मेटे अंक विये । मूँड़चौ मूँड़, कंठ बनमाला, मुद्रा-चक्र दिये। सब कोउ कहत गुलाम स्याम कौ, सुनत सिरात हिये । सूरदास कौं और बड़ी सुख, जूठनि खाइ जिये ॥२६॥ अर्थ-हम नन्द पुत्र (नन्द को आनन्दित करने वाले) श्रीकृष्ण के क्रीत दास है । यम के बन्धनो को काटकर उन्होने मुझे निर्भय तथा स्वतन्त्र कर दिया है [जैसे कोई उदार हृदय धनी किसी दास-व्यवसायी लुटेरे से उसके बन्धन मे पडे हुए व्यक्ति को मोल लेकर अपने यहाँ सुखो रूप मे रखता है]। [उन्होने यमराज रूपी दास- व्यवसायी द्वारा अकित चिन्हो को मिटाकर मुझे अपने दास के चिन्ह के रूप मे] भाल पर तिलक, कानो पर तुलसी-दल, और कंठ मे वनमाल धारण कराया, [मेरा] सिर मुँडवा दिया [तथा भुजा आदि पर] चक्र की छाप अकित करवा दी। [मुझे] सब श्याम [सुन्दर] का दास कहने लगे [जिसे] सुनकर हृदय शीतल होने लगा । सूरदास को एक ओर बड़ा सुख यह प्राप्त हुआ कि [आपकी] जूठन खाकर जीने लगा ॥२६॥ राखौ पति गिरिवर गिरि-धारी। अब तौ नाथ, रह्यौ कछु नाहिन, उघरत माथ अनाथ पुकारी। बैठी सभा सकल भूपनि की, भीषम-द्रौन-करन व्रतधारी। कहि न सकत कोउ बात बदन पर, इन पतितति मो आपत्ति बिचारी। पांडु-कुमार पवन से डोलत, भीम गदा कर तैं महि डारी। रही न पैज प्रबल पारथ की, जब तैं धरम-सुत घरनी हारी। अब तौ नाथ न मेरौ कोई, बिनु श्रीनाथ-मुकुंद-मुरारी । सूरदास अवसर के चूकैं फिरि पछितैहौ देखि उघारी ॥२७॥ अर्थ--(कौरव-सभा मे दुःशासन द्वारा निरावरण की जाती हुई द्रौपदी) अनाथ होकर पुकारने लगी है । गिरिधर (श्रीकृष्ण), मेरी लाज रख लीजिये । हे नाथ, अब और कोई सहारा नही रह गया है। सभी राजाओ की सभा बैठी है, जिसमे भीष्म, द्रोण कर्ण जैसे [न्याय के] व्रतधारी उपस्थित है [किन्तु इनमे] कोई [अन्यायी