भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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विनय तथा भक्ति ३१ दुर्योधन के] मुँह पर [उचित] बात नही कह पा रहा है। इन (दुर्योधनादि) पापियों ने मुझे निर्लज्ज करने का विचार कर लिया है। पाण्डु पुत्र (पांडव) हवा की तरह कांप रहे है, भीम ने [अपनी] गदा हाथ से छोड़कर पृथ्वी पर डाल दी है। जब से धर्म- पुत्र (युधिष्ठिर) (मुझ) पत्नी को [जुए मे] हार गये है, पराक्रमी पार्थ की संकल्प शक्ति भी नही रह गई । हे नाथ, अब [आप] लक्ष्मी पति मुकुन्द मुरारी के बिना मेरा कोई (सहायक) नही है—[आपके बिना मैं सर्वथा अनाथ (असहाय) हूँ, अर्थात् अब मुझे केवल आपका भरोसा है] सूरदास कहते हैं कि हे नाथ अवसर के निकल जाने पर, मुझे निर्वसना हुई देख लेने पर तो आप पछताते भर रह जायेगे ॥२७॥ भांवी करी गोपाल की सब होइ । जो अपनी पुरुषारथ मानत, अति झूठौ है सोइ । साधन, मंत्र, जंत्र, उद्यम, बल, ये सब डारौ धोइ । जो कछु लिखि राखी नँदनंदन, मेटि सकै नहिं कोइ । दुख-सुख, लाभ-अलाभ समुझि तुम, कतहिँ मरतहौ रोइ । सूरदास स्वामी करुनामय, स्याम-चरन मन पोइ ॥२८॥ अर्थ—गोपाल (श्रीकृष्ण) का ही किया हुआ सब कुछ होता है। जो अपना पुरुषार्थ मानता है (अपने पौरुष मे विश्वास करता है) वह बड़ा झूठा (मिथ्या गर्व वाला) है। युक्ति, मन्त्र, यन्त्र, परिश्रम तथा शक्ति इन सबको (जो भरोसा तुम्हारे मन मे है उसे) धो डालो । जो कुछ भगवान् ने (भाग्य में) लिख रखा है उसे कोई नही मिटा सकता । दुःख-सुख, लाभ हानि का विचार करके तुम क्यों रो-रो कर मर रहे हो ? सूरदास कहते हैं कि भगवान् कृपालु हैं, उन्ही श्याम के चरणो मे अपना मन पिरो दो, लगा दो ॥२८॥ होत सो जो रघुनाथ ठटै । पचि-पचि रहैँ सिद्ध, साधक, मुनि, तऊ न बढ़ै-घटै । जोगी जोग धरत मन अपनैं सिर पर राखि जटै । ध्यान धरत महादेवऽरु ब्रह्मा, तिनहूँ पै न छुटै । जती, सती, तापस आराधैँ, चारों बेद रटै । सूरदास भगवन्त-भजन बिनु, करम-फाँस न कटै ॥२६॥ अर्थ - भगवान् जो कुछ निर्धारित करते है। वही होता है। अनेक सिद्ध साधक तथा मुनि प्रयास करते-करते थक जाते हैं, किन्तु कुछ भी [उसमें] घटा-बढ़ा नही पाते । योगी सिर पर जटा रखकर मानसिक योग धारण करते है और शंकर तथा ब्रह्मा भी ध्यान मे लीन होते है किन्तु उनसे भी उसमे क्षीणता नही आती । सूरदास कहते हैं कि भगवद्भजन के बिना संन्यासियो, निष्ठावान् महात्माओ की आराधना तथा चारो वेदो के पाठ से भी कर्म-बन्धन नही कटता, शिथिल नही होता ॥२६॥

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