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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

विनय तथा भक्ति ३१ दुर्योधन के] मुँह पर [उचित] बात नही कह पा रहा है। इन (दुर्योधनादि) पापियों ने मुझे निर्लज्ज करने का विचार कर लिया है। पाण्डु पुत्र (पांडव) हवा की तरह कांप रहे है, भीम ने [अपनी] गदा हाथ से छोड़कर पृथ्वी पर डाल दी है। जब से धर्म- पुत्र (युधिष्ठिर) (मुझ) पत्नी को [जुए मे] हार गये है, पराक्रमी पार्थ की संकल्प शक्ति भी नही रह गई । हे नाथ, अब [आप] लक्ष्मी पति मुकुन्द मुरारी के बिना मेरा कोई (सहायक) नही है—[आपके बिना मैं सर्वथा अनाथ (असहाय) हूँ, अर्थात् अब मुझे केवल आपका भरोसा है] सूरदास कहते हैं कि हे नाथ अवसर के निकल जाने पर, मुझे निर्वसना हुई देख लेने पर तो आप पछताते भर रह जायेगे ॥२७॥ भांवी करी गोपाल की सब होइ । जो अपनी पुरुषारथ मानत, अति झूठौ है सोइ । साधन, मंत्र, जंत्र, उद्यम, बल, ये सब डारौ धोइ । जो कछु लिखि राखी नँदनंदन, मेटि सकै नहिं कोइ । दुख-सुख, लाभ-अलाभ समुझि तुम, कतहिँ मरतहौ रोइ । सूरदास स्वामी करुनामय, स्याम-चरन मन पोइ ॥२८॥ अर्थ—गोपाल (श्रीकृष्ण) का ही किया हुआ सब कुछ होता है। जो अपना पुरुषार्थ मानता है (अपने पौरुष मे विश्वास करता है) वह बड़ा झूठा (मिथ्या गर्व वाला) है। युक्ति, मन्त्र, यन्त्र, परिश्रम तथा शक्ति इन सबको (जो भरोसा तुम्हारे मन मे है उसे) धो डालो । जो कुछ भगवान् ने (भाग्य में) लिख रखा है उसे कोई नही मिटा सकता । दुःख-सुख, लाभ हानि का विचार करके तुम क्यों रो-रो कर मर रहे हो ? सूरदास कहते हैं कि भगवान् कृपालु हैं, उन्ही श्याम के चरणो मे अपना मन पिरो दो, लगा दो ॥२८॥ होत सो जो रघुनाथ ठटै । पचि-पचि रहैँ सिद्ध, साधक, मुनि, तऊ न बढ़ै-घटै । जोगी जोग धरत मन अपनैं सिर पर राखि जटै । ध्यान धरत महादेवऽरु ब्रह्मा, तिनहूँ पै न छुटै । जती, सती, तापस आराधैँ, चारों बेद रटै । सूरदास भगवन्त-भजन बिनु, करम-फाँस न कटै ॥२६॥ अर्थ - भगवान् जो कुछ निर्धारित करते है। वही होता है। अनेक सिद्ध साधक तथा मुनि प्रयास करते-करते थक जाते हैं, किन्तु कुछ भी [उसमें] घटा-बढ़ा नही पाते । योगी सिर पर जटा रखकर मानसिक योग धारण करते है और शंकर तथा ब्रह्मा भी ध्यान मे लीन होते है किन्तु उनसे भी उसमे क्षीणता नही आती । सूरदास कहते हैं कि भगवद्भजन के बिना संन्यासियो, निष्ठावान् महात्माओ की आराधना तथा चारो वेदो के पाठ से भी कर्म-बन्धन नही कटता, शिथिल नही होता ॥२६॥

३२ सूरसागर सार सटीक भावी काहूँ सौं न टरै । कहँ वह राहु, कहाँ वै रवि ससि, आनि संजोग परै । मुनि बसिस्ट पंडित अति ज्ञानी, रचि-पचि लगन धरै । तात-मरन, सिय हरन, राम वन-वपु धरि विपति भरै । रावन जीति कोटि तैंतीसौ, त्रिभुवन राज करै । मृत्युहिँ बाँधि कूप मैं राखै, भावी-बस सो मरै । अरजुन के हरि हुते सारथी, सोऊ बन निकरै । द्रुपद-सुता कौ राजसभा, दुस्सासन चीर हरै । हरीचंद सो को जगदाता. सो घर नीच भरै । जौ गृह छाँड़ि देस बहु धावै, तऊ वह सग फिरै । भावी कैं बस तीन लोक हैं, सुर नर देह धरै । सूरदास प्रभु रची सु ह्वै है, को करि सोच मरै ॥३०॥ अर्थ—भावी किसी से नही टाली जा सकती । कहाँ वह राहु है तथा कहाँ वे सूर्य तथा चन्द्रमा (किन्तु सूर्य-ग्रहण तथा चन्द्र-ग्रहण के रूप मे) उनका संयोग आ ही पड़ता है । वशिष्ठ मुनि अत्यन्त ज्ञानी पंडित थे और उन्होंने खूब सोच समझ कर [राम जानकी के विवाह का] लग्न निर्धारित किया, किन्तु पिता (दशरथ) की मृत्यु हुई तथा सीता-हरण आदि के रूप मे राम को वन मे वनवासी वेश धारण करके कष्ट उठाना पडा । रावण तैतीस करोड़ [देवताओ] को जीत कर तीनो लोको पर राज्य करता था । [और उसने] मृत्यु को बन्दी बना कर कुँए में [डाल] रखा था; किन्तु भावी-वश उसे [मनुष्य के हाथो] मरना पड़ा । भगवान् [स्वयं] अर्जुन के सारथि थे किन्तु (पांडवो को) वनवास करना पडा, और द्रौपदी का [उनकी पत्नी] दुश्शासन ने [भरी] राजसभा मे चीर-हरण किया । हरिश्चन्द्र के समान ससार में कौन दानी होगा किन्तु उन्हे भी नीच के घर भृत्य बनना पड़ा । यद्यपि मनुष्य घर छोड़कर अनेक देशो मे दौड़ता है [भ्रमण करता है] तथापि भावी उसके साथ-साथ ही जाती है । भावी के वश मे तीनो लोक [के प्राणी] हैं, चाहे देव-योनि-धारी हो या नर-योनि-धारी । सूरदास कहते हैं कि प्रभु ने जैसी व्यवस्था कर रखी है वैसा ही होगा [इसलिये भवितव्य के विषय मे] चिन्ता करके कौन मरे ? ॥३०॥ तातैँ सेइयै श्री जदुआइ । संपति बिपति, बिपति तैं संपत्ति, देह कौ यहै सुभाइ । तरुवर फूले, फरै, पतझरै, अपने कालहिँ पाइ । सरवर नीर भरै, भरि उमड़ै, सूखै खेह उड़ाइ । दुतिया चंद बढ़त ही बाढै, घटत-घटत घटि जाइ । सूरदास संपदा-आपदा, जिनि कोऊ पतिआई ॥३१॥

विनय तथा भक्ति ३३ अर्थ-यद॒राज श्रीकृष्ण ही इसलिए सेव्य हैं, क्योंकि उत्कर्ष तथा सुख की स्थिति से अपकर्ष तथा दुःख की स्थिति को प्राप्त होना और अपकर्ष तथा दुःख से उत्कर्ष तथा सुख की स्थिति को प्राप्त होते रहना शरीर धारियों का स्वभाव है । [जैसे हम देखते हैं कि] वृक्ष काल पाकर [समयानुसार] फूलता है, फलता है, (उसके) पत्ते झड़ते हैं । जलाशय पानी से भरता है, भर जाने पर उमड़ता है फिर सूख जाता है और उसमें धूल उड़ने लगती है । द्वितीया का चन्द्रमा बढ़ते-बढ़ते पूर्ण चन्द्र बन जाता है और [फिर] घटते-घटते समाप्त हो जाता है । [इसलिए] सूरदास कहते हैं कि उन्नति, अवनति, सुख-दुःख पर किसी को विश्वास नहीं करना चाहिए, तात्पर्य यह है कि परिवर्तन-शील संसार की सभी स्थितियाँ अस्थायी, विनश्वर हैं; अविनाश्वर स्थायी तत्व तो एकमात्र भगवान् हैं, अतएव उनकी प्राप्ति ही हमारा ध्येय होना चाहिए ॥३१॥ वैराग्य किते दिन हरि-सुमिरन बिनु खोए । पर-निंदा रसना के रस करि, केतिक जनम बिगोए । तेल लगाइ कियौ रुचि-मर्दन, बस्तर मलि-मलि धोए । तिलक बनाइ चले स्वामी व्है, विषयिनि के मुख जोए । काल बली तैं सब जग काँप्यौ, ब्रह्मादिक हूँ रोए । सूर अधम की कहौ कौन गति, उदर भरे, परि सोए ॥३२॥ अर्थ-मैंने अनगिनत दिन भगवान् को स्मरण किये बिना खो दिये । दूसरों की निन्दा को ही जिह्वा का स्वाद मानकर कितने ही जन्मो को व्यर्थ में गँवा दिया । तेल लगाकर शौक से मालिश किया और वस्त्रो को रगड़-रगड़ कर धोया किया [किन्तु] मन को स्वच्छ (पवित्र) नहीं किया । तिलक लगाकर स्वामी की तरह चलता रहा तथा विषयी व्यक्तियों का मुखापेक्षी बना रहा । बलशाली काल [के भय] से तो सारा संसार कांपता है । [उसकी भयंकरता देखकर] ब्रह्मा आदि को रोना पड़ता है, तो फिर उसके आगे अधम सूर का क्या बस, जो पेट भरने पर पड़कर सो जाना भर जानता है ॥३२॥ नर तैं जनम पाइ कह कीनौ ? उदर भरचौ कूकुर लौं, प्रभु कौ नाम न लीनौ । श्री भागवत सुनी नहिं श्रवननि, गुरु गोबिंद नहिं चीनौ । भाव-भक्ति कछु हृदय न उपजी, मन विषया मैं दीनौ । झूठो सुख अपनौ करि जान्यो, परस प्रिया कैं भीनौ । अघ कौ मेरु बढ़ाइ अधम तू, अत भयौ बलहीनौ । लख चौरासी जोनि भरमि कै, फिर वाहीँ मन दीनौ । सूरदास भगवंत-भजन बिनु, ज्यौँ अंजलि-जल छीनौ ॥३३॥ ३

६४ सूरसागर सार सटीक अर्थ—मनुष्य का [सुन्दर] जन्म पाकर तुमने क्या किया ? श्वान और शूकर की भांति उदरपूर्ति मे ही लगे रहे और [एक क्षण भी] प्रभु का नाम नही लिया । श्री- मद्भागवत [पुराण] की कथा कानो से नही सुनी तथा [मानव-जन्म के लक्ष्य की प्राप्ति कराने वाले] गुरु एवं ईश्वर की पहचान नही की । तुम्हारे हृदय मे भाव-भक्ति (ऐसी भक्ति जिसमे जीवन का स्वरूप बदल जाता है, और सगुण भक्त भगवान् के सेवक, सखा, स्नेही, माता-पिता या कांता के रूप मे ही आचरण करता है) नही उत्पन्न हुई, [और तुमने अपना] मन विषयो मे लगाया । तुमने झूठे सुखो को अपना समझा और प्रियतमा के आलिंगन मे मस्त रहे । हे पापी, तू अपने पापो को सुमेरु के समान बढाते हुए तुम अन्त मे [उनके सामने] बलहीन हो गये । चौरासी लाख योनियो में भ्रमते रहने [और उनके कष्ट भोगते रहने] पर भी तुमने इस भ्रमण मे पडे रहने मे ही अपना मन लगाया (उससे छुटकारे के लिए उद्योग-शील नही हुए) । सूरदास कहते हैं कि भगवद्भजन के बिना तुम्हारा जीवन अंजलि-गत जल के समान (प्रतिक्षण) घटता जा रहा है ॥३३॥ इत-उत देखत जनम गयौ । या झूठी माया कैँ कारन, दुहुँ दृग अंध भयौ । जनम-कष्ट तैं मातु दुखित भई, अति दुख प्रान सह्यौ । वै त्रिभुवनपति विसरि गए तोहिं, सुमिरत क्योँ न रह्यौ । श्रीभागवत सुन्यौ नहिं कवहूँ, बीचहिं भटकि मर्यौ । सूरदास कहै, सब जग वूड्यौ, जुग-जुग भक्त तर्यौ ॥३४॥ अर्थ—[सुख की आशा मे इधर-उधर ताकते-ताकते [मेरा] सारा जन्म [व्यर्थ मे ही] बीत चला । इस झूठी माया के कारण ही मैं दोनो नेत्रो का अन्धा हो गया । मेरे जन्म के कष्ट से मां को दु खो होना पडा तथा प्राणों को अत्यन्त कष्ट सहना पडा । [हे मन, झूठी माया मे पडकर] तीनो लोको के स्वामी को तुमने भुला दिया, उनका स्मरण क्यो नही करते रहे ? तुमने (श्रीमद्भागवत) की कथा कभी नही सुनी तथा बीच मे (सांसारिक भुलावों मे) ही भटक कर मरते रहे । सूरदास कहते हैं कि सारा संसार (संसार का प्राणि-समूह) डूबता रहा है, केवल [भगवान् के] भक्त प्रत्येक युग मे तरते रहे हैं (इस संसार-सागर से पार होते रहे है) ॥३४॥ सबै दिन गए विषय के हेतु । तीनौँ पन ऐसौँ ही खोए, केस भए सिर सेत । आँखिनि अंध, स्रवन नहिं सुनियत, थाके चरन समेत । गंगा-जल तजि पियत कूप-जल, हरि तजि पूजत प्रेत । मन-वच-क्रम जौ भजे स्याम कौं, चारि पदारथ देत । ऐसौ प्रभू छोड़ि क्योँ भटकै, अजहूँ चेति अचेत । राम नाम विनु क्यों छूटौगे, चंद गहैं ज्यौँ केत । सूरदास कछु खरच न लागत, राम नाम मुख लेत ॥३५॥

विनय तथा भक्ति ३५ अर्थ-[जीवन के] सारे दिन विषय वासनाओं के चक्कर में ही बीत गये। [बीती हुई] तीनों अवस्थाएँ (बाल्य, कौमार तथा यौवन) मैंने व्यर्थ मे ही खो दी [और अब वार्द्धक्य आ गया] शिर के केश श्वेत हो गये। आंखों से अन्धा हो गया, कानो से सुनाई नही पडता, तथा चरणों सहित सभी अंग शिथिल हो गये। [माया द्वारा वशीभूत मन] गंगा का पवित्र जल छोड़कर कुएँ का पानी पीता है, भगवान् का परित्याग कर प्रेत-पूजा करता है। जो मन, वाणी और कर्म से श्याम का भजन करता है [उसे वे] चारों पदार्थ (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) प्रदान करते हैं। ऐसे प्रभु का त्याग करके हे अचेत [मन] क्यो भटक रहे हो ? अब भी चेत जाओ । राम-नाम का स्मरण किये बिना तुम (आवागमन से) मुक्त नही हो सकते। (तुम उसी प्रकार काल के ग्रास हो) जैसे चन्द्रमा केतु-ग्रस्त होता है। सूरदास कहते हैं कि राम का नाम मुँह से लेने में कुछ खर्च भी तो नही लगता [फिर तुम राम नाम क्यों नही लेते ?] ॥३५॥ द्वै मैँ एकौ तौ न भई । ना हरि भज्यौ, न गृह सुख पायौ, वृथा विहाइ गई। ठानी हुती और कछु मन मैँ, औरै आनि ठई। अविगत-गति कछु समुझि परत नहिँ, जौ कछु करत दई। सुत सनेहि-तिय सकल कुटुंब मिलि, निसि-दिन होत खई। पद-नख-चंद चकोर विमुख मन, खात अँगार मई। विषय-विकार-दवानल उपजी मोह-बयारि लई। भ्रमत-भ्रमत बहुतै दुख पायौ, अजहुँ न टेँव गई। होत कहा अबके पछिताएँ, बहुत बेर बितई। सूरदास सेये न कृपानिधि, जो सुख सकल मई ॥३६॥ अर्थ-जीवन के दो लाभ कहे जाते है, एक सांसारिक दूसरा पारमार्थिक [इन] दोनो मे एक की भी तो प्राप्ति नही हुई [मैने] न तो भगवान् का भजन किया और न गृहस्थाश्रम का ही सुख प्राप्त किया, सम्पूर्ण आयु व्यर्थ मे ही बीत गयी। मन मे निश्चय किया था कुछ और किन्तु हो कुछ और ही गया। जो कुछ होता है, उसे देव (विधाता) ही करता है। किन्तु [उस] अविनाशी का अविज्ञात विधान कुछ समझ में नही आता । पुत्र, प्रेम करने वाली पत्नी आदि सम्पूर्ण परिवार में लगकर (आसक्त होकर) रात- दिन क्षय को प्राप्त होता रहता हूँ। [भगवान् के] पद-नख रूपी चन्द्रमा से विमुख मन रूपी चकोर अंगार-मयी (अंगारो के समान दाह-मयी) विषय-वासना जनित पीड़ाएँ भोगता है (जैसे चन्द्रमा के अदर्शन पर चकोर अगारे खाता है)। विषय-वासना और [मानसिक] विकारों की दावाग्नि उत्पन्न हुई जिसे मोह रूपी वायु ने और भी प्रज्वलित कर दिया। [उसके फलस्वरूप अनेक योनियो मे] भ्रमण करते-करते अनेक कष्ट सहे किन्तु आज भी वह पुराना ढर्रा, दूर नहीं हुआ। अब पश्चात्ताप करने से क्या लाभ (क्योकि) बहुत देर हो गयी। सूरदास कहते हैं कि [खेद है कि] कृपा-निधि

३६ सूरसागर सार सटीक भगवान् मेरे द्वारा सेवित नही हुए (उनकी) सेवा (आराधना मुझसे न हो सकी), जो सभी सुखो से भरी हुई निधि है। विशेष—पद के अन्त में 'मई' (मयी) शब्द निधि के मेल मे स्त्रीलिंग में है ॥३६॥ अब मैं जानी, देह बुढ़ानी । सीस, पाउँ, कर कह्यौ न मानत, तन की दशा सिरानी । आन कहत, आनै कहि आवत, नैन-नाक वहै पानी । मिटि गइ चमक-दमक अंग-अंग की, मति अरु दृष्टि हिरानी । नाहिं रहि कछु सुधि तन-मन की, भई जु बात विरानी । सूरदास अब होत विगूचनि, भजि लै सारँगपानी ॥३७॥ अर्थ—अब मैं जान गया कि शरीर वृद्ध हो गया। फिर, पैर, हाथ अब कहना नहीं मानते (न चाहने पर भी हिलते-कांपते रहते हैं) शरीर की (स्वाभाविक, स्वस्थ] दशा बीत गयी। कहते कुछ और हैं, मुख से शब्द कुछ और ही निकलते है। आंख और नाक से (अनावश्यक) पानी बहता रहता है। विभिन्न अंगो की चमक तथा आभा समाप्त हो गयी। स्मरण-शक्ति तथा [नेत्रों की दृष्टि] खो गयी। शरीर तथा मन का कुछ भी ध्यान न रहा, सभी बाते बदल गई। सूरदास कहते हैं कि अब दुर्दशा (छोछालेदर) होने लगी, इसलिए [ऐसी दशा में जब सांसारिक जीवन मे रस नही रहा] भगवान् (सारंग-पानी) का भजन ही कर ले ॥३७॥ मन प्रबोध सब तजि भजिऐ नन्द कुमार । और भजे तैँ काम सरै नहिँ, मिटै न सब जंभार । जिहिँ जिहिँ जोनि जन्म धायो, वहु जोर्यो अघ कौ भार । जिहिँ काटन कौँ समरथ हरि कौँ तीछन नाम-कुठार । वेद, पुरान, भागवत, गीता, सब कौ यह मत सार । भव समुद्र हरि-पद-नौका बिनु, कोउ न उतारै पार । यह जिय जानि, इहीँ छिन भजि, दिन बीते जात असार । सूर पाइ यह समौ लाहु लहि, दुर्लभ फिरि संसार ॥३८॥ अर्थ—[हे मन,] सब कुछ छोड़कर नन्दकुमार का भजन करना चाहिए । अन्य किसी का भजन करने से कार्य सिद्ध नही होता और न इस सांसारिक (जन्म-मरण के) बखेडे से ही छुटकारा मिलता है। जिस-जिस योनि मे जन्म लिया वहाँ [तुमने] बहुत अधिक पाप का भार एकत्र किया। उसे काटने मे हरि नाम रूपी तीक्ष्ण कुल्हाडी ही समर्थ है, वेद, पुराण, श्रीमद्भागवत तथा गीता सभी ग्रन्थों के मतों का यही तत्व है कि इस संसार रूपी सागर से भगवान् के चरण रूपी नौका के अतिरिक्त कोई पार नही उतार सकता। ऐसा मन में समझ कर इसी क्षण (भगवान् का) भजन [आरम्भ] करो [नही तो] दिन व्यर्थ मे ही बीतते जा रहे है। सूरदास कहते है कि

विनय तथा भक्ति ३७ [मनुष्य-जन्म का] यह सुअवसर जो संसार मे फिर दुष्प्राप्य है, प्राप्त करके इसकी (भगवद्-भजन-रूपी) सार्थकता (लाभ) प्राप्त कर लो ॥३८॥ जा दिन मन पंछी उड़ि जैहैँ । ता दिन तेरे तन-तरुवर कै, सबै पात झरि जैहैँ । या देही कौ गरब न करिये, स्यार-काग-गिध खैहैँ । तीननि में तन कृमि, कै बिष्टा कै ह्वै खाक उड़ैहैँ । कहँ वह नीर, कहाँ वह सोभा, कहँ रंग-रूप दिखैहैँ । जिन लोगनि सौँ नेह करत हैं, तेई देखि घिनैहैँ । घर के कहत सबारे काढ़ौ, भूत होइ घर खैहैँ । जिन पुत्रनिहिँ बहुत प्रतिपाल्यौ, देवी-देव मनैहैँ । तेई लै खोपरी बाँस दे, सीस फोरि बिखरैहैँ । अजहूँ मूढ़ करौ सतसंगति, सतानि मैँ कछु पैहैँ । नर-बपु धारि नाहिँ जन हरि कौँ, जम की मार सो खैहैँ । सूरदास भगवंत-भजन बिनु वृथा सु जनम गँवैहैँ ॥३६॥ अर्थ-हे मन, जिस दिन प्राण रूपी पक्षी उड़ जायेगा उस दिन तुम्हारे शरीर रूपी वृक्ष के सारे पत्ते झड़ जायेगे (सम्पूर्ण कायिक सौन्दर्य समाप्त हो जायेगा) । इस शरीर पर गर्व मत करो; [प्राण छूटने पर] इसे स्यार, कौवे, गिद्ध आदि खायेगे । शरीर का तीन मे से एक परिणाम होगा, या तो [गाडे जाने पर सड़कर यह] कीड़ों में परिणत होगा, या [स्यार, गिद्ध आदि द्वारा खाया जाकर] मल बन जायेगा, या [जलाया जाकर] खाक बन कर उड़ जायेगा । शरीर की वह आभा, वह सौन्दर्य, वह रंग-रूप तब कहाँ दिखाई पडेगा ? जिन लोगों से तुम स्नेह करते हो वे ही देख कर घृणा करने लगेगे । घर के लोग कहने लगेगे कि शीघ्र ही [इसे बाहर] निकालो, नही तो भूत बन कर पकड़ कर खाने लगेगा । जिन पुत्रो का बड़ा प्रतिपालन किया और [उनकी कुशलता के लिए] अनेक देवी देवताओ की मनोती मानी, वे ही तुम्हारी खोपड़ी पर बाँसो से प्रहारकरके उसे तोड कर बिखरा देगे । हे मूढ, अब भी सत्संगति करो, संतो में तुम्हेकुछ [अवश्य] प्राप्त होगा । मनुष्य का शरीर धारण करके जो भगवान् का भक्त (जन) नही होता उसे यमराज (काल) का दण्ड सहना पड़ेगा । सूरदास कहते हैं कि भगवान् के भजन के बिना मनुष्य का जन्म व्यर्थ ही नष्ट हो जायेगा ॥३६॥ तिहारौ कृष्न कहत कह जात ? बिछुरै मिलन बहुरि कब ह्वैहै, ज्यौँ तरवर के पात । सीत-वात-कफ कंठ बिरौधै, रसना टूटै बात । प्रान लए जम जात, मूढ़-मति देखत जननी-तात । छन इक माहिँ कोटि जुग बीतत, नर की केतिक बात । यह जग-प्रीति सुवा-सेमर ज्यौँ, चाखन ही उड़ि जात ।

३८ सूरसागर सार सटीक

जमकेँ फंद पर्यौ नहिं जब लगि, चरननि किन लपटात । कहत सूर बिरथा यह देही, एतौ कत इतरात ॥४०॥ अर्थ—कृष्ण कहने मे तुम्हारा क्या जाता है ? [इस संसार में] बिछुड जाने पर वृक्ष के [टूटे हुए] पत्तो की भाँति फिर मिलन कब होगा ? शीत-वात तथा कफ (के प्रकोप) से कण्ठ अवरुद्ध हो जाता है [और] जिह्वा से शब्द फूटने बन्द हो जाते हैं । हे मूर्ख [माता-पिता के] देखते-देखते यमराज प्राणो का हरण करके चल देते हैं । [विधाता के] एक ही क्षण मे [मर्त्यलोक के] करोडो युग बीत जाते है, मानव जीवन किस गिनती मे है ? यह सांसारिक प्रेम [आकर्षक लाल-लाल फूलो को देख कर] सुए द्वारा सेये गये सेमर के टेढे के समान [अन्तःसार-शून्य] है, जो चखना आरम्भ करते (चोच मारते) ही [रूई के रूप मे] उड़ जाता है । इसलिए, जब तक यमराज के बन्धन मे नही पड़ते तब तक [भगवान् श्रीकृष्ण के] चरणो से क्यों नही लिपट जाते । सूरदास कहते है कि [भगवद्भक्ति के बिना] यह शरीर व्यर्थ है, इस पर इतना क्यो इतराते हो ? ॥४०॥ मन, तोसोँ किती कही समुझाइ । नँदनंदन के चरन कमल भजि तजि पाखंड-चतुराइ । सुख-सपति, दारा-सुत, हय गय, छूट सबै समुदाइ । छनभंगुर यह सबै स्याम बिनु, अंत नाहिं सँग जाइ । जनमत-मरत बहुत जुग बीते, अजहुँ लाज न आइ । सूरदास भगवंत-भजन विनु, जैहै जनम गँवाइ ॥४१॥ अर्थ—हे मन, मैंने तुमसे कितना समझा कर कहा कि पाखण्ड और चतुराई (धूर्तता) छोडकर श्रीकृष्ण के चरण कमलो को भजो । सुख सम्पत्ति, स्त्री-पुत्र, घोड़ा- हाथी [आदि भोज्य पदार्थों] का सम्पूर्ण समूह यही छूट जाता है । यह सब क्षण-भगुर (नाशवान्) है, भगवान् श्रीकृष्ण की भक्ति के अतिरिक्त कुछ भी अन्त मे (मरने पर) साथ नही जाता । जन्म लेते और मरते अपरिमित समय बीत गया किन्तु तुम्हें आज भी लज्जा नही आती । सूरदास कहते हैं कि भगवान् के भजन के बिना यह जन्म व्यर्थ मे नष्ट हो जावेगा ॥४१॥ धोखैँ ही धोखैँ डहकायौ । समुझि न परी, विषय-रस गोध्यौ, हरि-हीरा घर माँझ गँवायौ । ज्यौँ कुरंग जल देखि अवनि कौ, प्यास न गई चहूँ दिसि धायौ । जनम-जनम बहु करम किए हैं, तिनमै आपुन आपु बँधायौ । ज्यौँ सुक सेमर सेव आस लगि, निसि-बासर हठि चित्त लगायो । रीति पर्यौ जबै फल चाख्यौ, उड़ि गयौ तूल, ताँवरौ आयौ । ज्यौँ कपि डोर बाँधि बाजीगर, कन-कन कौँ चौहहैँ नचायौ । सूरदास भगवंत-भजन विनु, काल-ब्याल पै आप डसायौ ॥४२॥

विनय तथा भक्ति ३६ अर्थ—[हे मन तुम,] धोखे में पड़े-पड़े ठगे गये । [इस ठगी को] तुम समझ नही पाये, विषय वासना के [क्षणिक] सुख मे फँसे रहे । भगवान् रूपी हीरा तुम्हारे घर मे ही वर्तमान है किन्तु तुम [उसे प्रत्यक्ष न करके] उससे वंचित रहे। जिस प्रकार मृग [सूखी] भूमि पर सूर्य किरणो की लहरों को (जिनमें जल का सर्वथा अभाव होता है) जल समझ कर चारों दिशाओ मे दौडता फिरता है किन्तु उसकी प्यास नही बुझती, उसी प्रकार जन्म-जन्मान्तर से [तुमने सुख के लिए] न जाने कितने कर्म किये हैं ओर उनके बन्धन मे अपने को स्वयं फँसा लिया है। जिस प्रकार शुक [लुभावने फूलो को देख कर बडे अच्छे फल पाने की] आशा से सेमल के पेड को रात-दिन मन लगा कर निष्ठापूर्वक सेता रहा किन्तु जब उसने उसके फल को चखा (उस पर चोच मारी) तो उसमे से रूई उड़ने लगी और उसके मनोरथ झूठे पड गये और उसे चक्कर आने लगा। तथा जिस प्रकार वाजीगर बन्दर को डोरी मे बाँध कर दाने-दाने के लिए चौराहो पर नचाता है [उसी प्रकार] सूरदास कहते हैं कि [हे मन,] भगवान् के भजन के बिना [सुख की आशा मे पडकर] काल-रूपी सर्प से अपने को खुद डँसवाते रहे (जन्म-मृत्यु के चक्कर मे पड़े रहे) । विशेष —मान्यता है कि सर्पदंश से मृत व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त नही होता ॥४२॥ भक्ति कब करिहौ, जनम सिरानौ । बालापन खेलतहीँ खोयौ, तरुनाई गरवानौ । बहुत प्रपंच किए माया के, तऊ न अधम अघानौ । जतन जतन करि माया जोरी, लै गयौ रंक न रानौ । सुत-वित-वनिता-प्रीति लगाई, झूठे भरम भुलानौ । लोभ-मोह तैँ चेत्यौ नाहीँ, सपनेँ ज्यौँ डहकानौ । विरध भएँ कफ कंठ विरोध्‍यौ, सिर धुनि-धुनि पछितानौ । सूरदास भगवंत-भजन-बिनु, जम कैँ हाथ विकानौ ॥४३॥ अर्थ—[हे मन,] जीवन बीत चला, [अब] भक्ति कब करोगे ? बचपन खेलने में ही खो दिया, युवावस्था मे गर्व से भर गये । हे अधम, माया के अनेक प्रपंच करने पर भी तुम्हारी तृप्ति नही हुई । अनेक उपायो से ऐश्वर्य जोड़ा, जिसे राजा से लेकर रंक तक कोई [अपने साथ] नही ले जा सका । पुत्र, धन, स्त्री आदि की आसक्ति मे पडे रहे और उनके सुख की झूठी आशा के भुलावे मे आ गये । लोभ-मोह [की अज्ञान- मयी रात्रि] मे [सोते हुए] तुम स्वप्न के से झूठ व्यवहारो में पड़कर ठगे गये, सावधान होकर जग न सके (लोभ-मोह की ठगी से मुक्त होकर अपने शुद्ध आनन्दमय चेतना स्वरूप को प्राप्त न कर सके) अब वृद्ध होने पर जब कफ ने कण्ठ अवरुद्ध कर दिया, सिर पीट-पीट कर पछताने लगे । सूरदास कहते हैं कि खेद है, भगवद्भजन के बिना तुम यम (काल) के हाथ बिक गये (जन्म-मरण के चक्कर मे पड़े रहे) ॥४३॥

४० सूरसागर सार सटीक तजौ मन, हरि बिमुखनि कौ संग । जिनकैँ संग कुमति उपजति है, परत भजन मेँ भंग । कहा होत पय पान कराएँ, विष नहिँ तजत भुजंग । कागहिँ कहा कपूर चुगाएँ, स्वान न्हवाएँ गंग । खर कौँ कहा अरगजा लेपन, मरकट भूषन अंग । गज कौँ कहा सरित अन्हवाएँ, बहुरि धरे वह ढंग । पाहन पतित बान नहिँ बेधत, रीतौ करत निषंग । सूरदास कारी कामरि पै, चढ़त न दूजो रंग ॥४४॥ अर्थ—हे मन, असन्तो (दुष्टो) का साथ छोड़ दो। उनके साथ [रहने से] दुर्बुद्धि उत्पन्न होती है तथा भगवान् के भजन मे बाधा पड़ती है। [तुम्हारा यह सोचना कि उन्हे अपने भजन-भाव, सदुपदेश आदि द्वारा प्रभावित कर सकोगे। निष्फल है।] सांप को दूध पिलाने से क्या लाभ ? इससे वह अपना विष नही छोड़ता। कौवे को कपूर चुगाने तथा कुत्ते को गंगा मे नहलाने से क्या [लाभ] होता है ? (वे पुनः अभक्ष्य-भक्षण करते हैं)। गधे को सुगन्धित लेप करने तथा बन्दर के अंगो मे आभूषण पहनाने से क्या होता है ? हाथी को नदी में नहलाने से क्या होता है, वह पुनः अपना वही (अपने शरीर पर धूल डालने का) ढंग अपनाता है। पतित रूपी पत्थर सदुपदेश रूपी बाणों से विद्ध (प्रभावित) नही हो सकता उसे विद्ध करने की चेष्टा मे व्यर्थ ही तरकश खाली होता है (वाणो की बरबादी होती है)। सूरदास कहते है कि काले कम्बल पर दूसरा रङ्ग नही चढ़ता। [इसी प्रकार दुष्ट स्वभाव वाले मनुष्यो पर भी अच्छी बातो का प्रभाव नही पडता, अतः उनका परित्याग कर देना चाहिये] ॥४४॥ रे मन मूरख जनम गँवायौ । करि अभियान विषय-रस गीध्यौ, स्याम-सरन नहिँ आयौ । यह संसार सुवा-सेमर ज्यौँ, सुन्दर देखि लुभायौ । चाखन लाग्यौ रुई गई उड़ि, हाथ कछू नहिँ आयौ । कहा होत अब के पछिताएँ, पहिलेँ पाप कमायौ । कहत सूर भगवंत-भजन बिनु, सिर धुनि-धुनि पछतायौ ॥४५॥ अर्थ—रे मूर्ख मन, तुमने व्यर्थ ही यह जन्म गंवा दिया। अहंकार करके विषय वासना में लीन हो गये और श्याम (श्रीकृष्ण) की शरण मे नही आये। यह [सार- शून्य] संसार सुए द्वारा सेचित सेमल के समान है, [जिसके] सुन्दर फूलों को देखकर वह लुब्ध (आकर्षित) हुआ। किन्तु वह जब उसके फल का आस्वादन करने लगा तो रुई उड़ने लगी, और कुछ भी उसके हाथ नही लगा। अब पश्चात्ताप करने से क्या लाभ है ? अब तक तुम पाप ही कमाते रहे। सूरदास कहते है कि भगवान् के भजन के बिना अब सिर पीट-पीट कर [व्यर्थ] पश्चाताप करना ही रह गया ॥४५॥

विनय तथा भक्ति ४१ चित्-बुद्धि-संवाद चकई री, चलि चरन-सरोवर, जहाँ न प्रेम वियोग । जहँ भ्रम-निसा होति नहिं कबहुँ, सोइ सागर सुख जोग । जहाँ सनक-सिव हंस मीन मुनि, नख रवि-प्रभा प्रकास । प्रफुलित कमल, निमिष नहिं ससि-डर, गुजत निगम सुवास । जिहिं सर सुभग-मुक्ति-मुक्ताफल, सुकृत-अमृत-रस पीजै । सो सर छांड़ि कुबुद्धि बिहंगम, इहाँ कहा रहि कीजै । लखमी सहित होति नित क्रीड़ा, सोभित सूरउदास । अब न सुहात विषय-रस छीलर, वा समुद्र की आस ॥४६॥ अर्थ-हे बुद्धि रूपी चक्रवी, भगवान् के चरण रूपी सरोवर को चलो जहाँ प्रेम मे वियोग (का दुःख) नही सहना पड़ता । जहाँ पर मिथ्या ज्ञान [भ्रम] रूपी रात्रि कभी नही होती वही अपार जल-राशि (सागर) के सुख के [लिए] योग्य [स्थान] है, जहाँ सनकादि तथा शिव रूपी हंस, मुनि रूपी मीन [सदा विहार करते हैं] और भगवान् के नख रूपी सूर्य-बिंब का सदा प्रकाश रहता है (कभी रात नही होती, एक क्षण [के लिए भी तुम्हे विरह का सन्ताप देने वाली] चन्द्रमा-युक्त रात्रि का भय नहीं रहता, [सदा] कमल खिलते है, और उनकी सुगन्ध से मत्त निगम वेद रूपी भ्रमर गुन्जार करते हैं (वेद ध्वनि होती रहती है), जिस सरोवर मे सुन्दर मुक्ति रूपी मोती प्राप्त होता है, और [इस सरोवर तक जाने के श्रम के] पारितोषिक रूप अमृतरस का पान करो । हे दुर्बुद्धि रूपी पक्षी ऐसे सरोवर का परित्याग कर यहाँ रह कर क्या कर रहे हो ? सूरदास कहते है कि [उस सरोवर मे] भगवान् के दास शोभा पाते, और लक्ष्मी सहित भगवान् की नित्य लीला में मग्न रहते हैं। अब मुझे उस [अगाध अपार] जलाशय की आशा मे यह विषय वासनाओ वाली छिछली तलैया नही सुहाती ॥४६॥ सुवा, चलि तो वन कौ रस पीजै । जा बन राम-नाम अमृत-रस, श्रवन पात्र भरि लीजै । को तेरौ पुत्र, पिता तू काकौ, घरनी, घर को तेरौ ? काग सृगाल-स्वान कौ भोजन, तू कहै मेरौ मेरौ ! बन बारानसि मुक्ति क्षेत्र है, चलि तोकौ दिखराऊँ । सूरदास साधुनि की संगति, बड़े भाग्य जो पाऊं ॥४७॥ अर्थ-हे शुक, चल कर उस [सत्संग रूपी] वन के रस का पान करो, जिस वन मे राम-नाम रूपी अमृतोपम रस प्राप्त होता है, उसे अपने कर्णरूपी पात्र मे भर लो । [इस नश्वर जगत मे] कौन तुम्हारा पुत्र है, तुम किसके पिता हो, कौन तुम्हारी गृहिणी है तथा कौन तुम्हारा घर है ? [ये सभी सम्बन्धी] कौवे, स्यार तथा कुत्ते के आहार हैं, [किन्तु] तुम कहते हो यह मेरा है, वह मेरा है। [यह सत्संग रूपी] वन

४२ सूरसागर सार सटीक वाराणसी [के समान] मुक्ति दायी क्षेत्र है, चलो तुम्हें [इसे] दिखला दूँ । सूरदास कहते हैं कि सन्तों की संगति ही यह [मुक्ति दायी वन-वाराणसी है], इसे पा जाऊँ तो मेरे धन्य भाग्य ! ॥४७॥ हरिविमुख-निन्दा अचंभौ इन लोगनि कौ आवै । छाँड़ि स्याम-नाम-अमृत फल, माया-विष-फल भावै । निंदत मूढ मलय चंदन कौं, राख अंग लपटावै । मानसरोवर छोड़ि हंस तट काग-सरोवर न्हावै । पग तर जरत न जानै मूरख, घर तजि घूर बुझावै । चौरासी लख जोनि स्वाँग धरि, भ्रमि-भ्रम जमहि हँसावै । मृगतृष्ना आचार-जगत जल, ता सँग मन ललचावै । कहतु जु सूरदास संतनि मिलि हरि जस काहे न गावै ॥४८॥ अर्थ—इन [असन्त (माया-ग्रस्त)] लोगो को देखकर आश्चर्य होता है । ये नाम रूपी अमरता प्रदान करने वाले फल का परित्याग करके माया रूपी विष फल को पसन्द करते हैं । ये मूर्ख (हरिविमुख) मलय चन्दन की निन्दा करते हैं और शरीर मे भस्म रमाते हैं । [इनका मन रूपी] हंस मानसरोवर के तट का परित्याग करके कौवो के तालाब में स्नान करता है । ये मूर्ख अपने पैरों के नीचे की जलन को नही जानते घर मे लगी हुई आग को छोड़कर घूरे की आग बुझाते हैं । [भाव यह है कि हृदयस्थ लोभ-मोहादि रूपी ताप को नही बुझाते वरन् बाह्य अंगो को जो ताप के वास्तविक स्थल नही हैं स्नानादि द्वारा सींचते हैं] चौरासी लाख योनियों मे विभिन्न पशु-पक्षियो के रूप धारण कर भ्रमते हुए यमराज (काल) की हँसी के पात्र बनते हैं । सांसारिक वाह्याचार समष्टि मृग-तृष्णा के जल के समान [भ्रम-मय तथा धोखा देने वाली] है, किन्तु इसी से ये [मूर्ख हरि विमुख] अपने मन मे तृप्ति पाने का लोभ करते हैं । सूरदास कहते है कि वे सन्तो के साथ मिलकर भगवान् का यशोगान [न जाने] क्यो नही करते ॥४८॥ भजन बिनु कूक़र-सूकर जैसौ । जैसे घर विलाव के मूसा, रहत विषय-वस बैसौ । वन-वगुली अरु गीध-गीधिनी, आइ जनम लियो तैसौ । उनहूँ केँ गृह, सुत, दारा हैं, उन्हैं भेद कहु कैसौ । जीव मारि के उदर भरत हैं, तिनकौ लेखौ ऐसौ । सूरदास भगवत-भजन विनु, मनौ ऊँट-वृष-भैंसौ ॥४६॥ अर्थ—[भगवान् के] भजन के बिना मनुष्य कुत्ते और सूअर के समान [निकृष्ट और अपवित्र] है। जैसे चूहा विलाव वाले घर मे [खाद्य पदार्थों के लोभ मे पड़कर]

विनय तथा भक्ति ४३ रहता है [और बिलाव का शिकार बनता है] वैसे ही [भजन-विहीन मनुष्य] विषयों के वशीभूत हो [काल का शिकार बन कर] रहता है। बगला-बगली, गृद्ध-गृद्धपत्नी [जैसे अपवित्र प्राणियो] की भाँति ही ऐसे स्त्री-पुरुषों ने [इस पृथ्वी पर] जन्म लिया है। [इनके समान] उनके भी तो घर, पुत्र और पत्नी हैं फिर बतलाइए, उनमे और इनमे क्या अन्तर है ? [जो लोग] जीव-हत्या करके अपना पेट भरते हैं, उनके विषय में इसी प्रकार की बात कही जा सकती है। सूरदास कहते हैं कि भगवान् के भजन के बिना मनुष्य ऊँट, बैल और भैंसे के समान [भार-वाही मात्र] है ॥४९॥ सत्संग-महिमा जा दिन संत पाहुने आवत । तीरथ कोटि सनान करैँ फल जैसौ दरसन पावत । नयौ नेह दिन-दिन प्रति उनकैँ चरन-कमल चित-लावत । मन-बच कर्म और नहिँ जानत, सुमिरत औ सुमिरावत । मिथ्याबाद-उपाधि-रहित ह्वैँ, बिमल-विमल जस गावत । बंधन कर्म जे पहिले, सोऊ काटि बहावत । संगति रहैँ साधु की अनुदिन, भव-दुख दूरि नसावत । सूरदास संगति करि तिनकी, जे हरि-सुरति कहावत ॥५०॥ अर्थ-जिस दिन [किसी सद्गृहस्थ के यहां] सन्त अतिथि [के रूप मे] आते हैं, उस दिन [उसे] करोड़ों तीर्थस्थानों जैसा फल [पुण्य] उनके दर्शन से प्राप्त हो जाता है। उनके चरणो में चित्त लगाने से [भगवान् के प्रति] नित-नूतन प्रेम उत्पन्न होता है। वे मन, वाणी तथा कर्म से और कुछ नहीं जानते, [भगवान् का] स्मरण [स्वयं] करते हैं और [दूसरों से] कराते हैं। झूठे वाद-विवाद और झगड़ों से अलग रहकर वे भगवान् का पवित्रयश का गान करते हैं [जन्म-जन्मान्तर के] कर्मों का जो कठिन बन्धन पहले से चला आ रहा है उसे भी वे समाप्त कर देते है। नित्य प्रति सत्संगति में रहने से जन्म-मरण का कष्ट दूर हो जाता है [तथा समूल] विनष्ट हो जाता है। सूरदास कहते हैं कि उन्ही [सन्तों] का साथ करो जो भगवान् का स्मरण कराते हैं ॥५०॥ स्थितप्रज्ञ हरि-रस तौँ डब जाइ कहुँ लहियै । गएँ सोच आएँ नहिँ आनंद, ऐसौ मारग गहियै । कोमल बचन, दीनता सब सौँ, सदा अनँदित रहियै । वाद बिवाद, हर्ष-आतुरता, इतौ द्वैंद जिय सहियै । ऐसी जो आवै या मन मैँ, तौ सुख कहँ लौँ कहियै । अष्ट सिद्धि, नवनिधि, सूरज प्रभु, पहुँचै जो कछु चहियै ॥५१॥

४४ सूरसागर सार सटीक अर्थ— अब तो (संसार तथा उसके सुखों का का मिथ्यात्व स्पष्ट हो जाने पर) कही जाकर भगवान् के भजन का आनन्द प्राप्त करना चाहिए । ऐसा मार्ग (जीवन- क्रम) ग्रहण करना चाहिए जिसमे [किसी वस्तु के नष्ट हो] जाने (हानि) पर चिन्ता न हो तथा (कोई वस्तु) आने (लाभ) पर आनन्द न हो, सभी के साथ मधुरवाणी तथा दैन्य भाव युक्त व्यवहार के साथ निरन्तर आनन्दपूर्ण जीवन हो [और] वाद-विवाद, हर्ष-व्याकुलता आदि द्वन्द्वो [के उद्वेगो) को मन मे सह लिया जाय । ऐसी भावना यदि मन मे घर कर ले तो उस सुख का वर्णन कहां तक शक्य है ? सूरदास कहते हैं कि [ऐसी स्थिति को पहुँच जाने पर] जो कुछ चाहिये—आठो सिद्धियां, नवो निधियां, आदि—सब कुछ प्राप्त हो जाता है ॥५१॥ जौ लौं मन-कामना न छूटै । तो कहा जोग-जज्ञ-व्रत कीन्हें बिन कन तुस कीँ कूटै । कहा सनान कियैँ तीरथ के, अंग भस्म जट जूटे । कहा पुरान जु पढैँ अठारह, ऊर्ध्व धूम के घूटे । जग शोभा की सफल बड़ाई इनतैँ कछू न खूटै । करनी और, कहैँ कछु औरै, मन दसहूँ दिसि टूटै । काम, क्रोध, मद, लोभ शत्रु हैं, जो इतनति सौँ छूटै । सूरदास तबहीँ तम नासै ज्ञान-अगिनि-झर फूटै ॥५२॥ अर्थ—जब तक मनोकामनाएं क्षीण नही पडती या दूर नही हो जाती तब तक योग साधन, यज्ञ तथा व्रत करने से क्या होता है ? [यह सब उसी प्रकार निरर्थक है जैसे] बिना दाने की भूसी का कूटना । [तब तक] तीर्थों मे स्नान करने, अंग मे भस्म रमाने तथा जटा जूट धारण करने से क्या लाभ ? पुराणो के अध्ययन तथा उल्टा लट- कते हुए नीचे जलती आग काधुआं पीने से क्या लाभ? इन सब से प्राप्त यश सांसारिक दिखावा संसार की समस्त शोभा मात्र है, [इनसे मनोकामनाओ मे] कुछ भी कमी नही आती । [इस प्रकार के जीवन मे] करनी ओर कथनी का भेद दूर नही होता ओर मन दसो दिशाओ मे दौड़ता हुआ [विषयो पर] झपटता रहता है । काम, क्रोध, मद और लोभ [बडे प्रबल] शत्रु हैं, मनुष्य जब इनसे छुटकारा पा लेता है तभी अज्ञानता का अन्धकार नष्ट होता है और ज्ञान रूपी अग्नि की ज्वाला प्रस्फुटित होती है ॥५२॥ आत्मज्ञान अपुनपौ आपुन ही बिसरचौ । जैसेँ स्वान कांच-मंदिर मैँ, भ्रमि-भ्रमि भूकि परचौ । ज्यौँ सौरभ मृग-नाभि वसत है, द्रुम तृन सूँघि फिरचौ । ज्यौँ सपने मैं रंक भूप भयौ, तसकर अरि पकरचौ । ज्यौँ केहरि प्रतिबिंब देखि कै, आपुन कूप परचौ । जैसेँ गज लखि फटिकसिला मैँ, दसननि जाइ अरचौ ।

विनय तथा भक्ति ४५ मर्कट मूठि छांड़ि नहीं दीनी, घर-घर-द्वार फिरयौ । सूरदास नलिनी को सुवटा, कहि कौनैं पकरयौ ॥५३॥ अर्थ—[हमारा आनन्दमय] आत्म-स्वरूप स्वयं हमारे द्वारा भुला दिया गया है जैसे शीश महल का कुत्ता शीशे मे [अपनी ही परछांइयां देख] भ्रमित हो होकर बार- बार भूक पड़ता है (भूकि पर्यो) या भूंकता हुआ मरता है (भूमि पर्यो), अर्थात् परेशान होता है । जैसे कस्तूरी (सौरभ) मृग की नाभि में रहती है किन्तु वह [बाहर] पौधों और घासो को सूंघता [हुआ उसे ढूंढता] फिरता है । जैसे स्वप्न मे राजा अपने को दरिद्र हुआ, अथवा डाकू या शत्रु द्वारा वन्दी बनाया गया मानता है । [और दुःखी होता है] । जैसे सिंह [कुएं में] अपना प्रतिबिम्ब देखकर [मूर्खता-वश उसमे] कूद पड़ा । जैसे हाथी बिल्लोर पत्थर (स्फटिक शिला) मे [अपना प्रतिबिम्ब देख] जाकर [उससे] दांतो से भिड़ गया । [जैसे] बन्दर ने [सँकरे मुंह वाले बर्तन में चनों से भर कर लोभ- वश] अपनी मुट्ठी नही छोड़ी और [इस प्रकार फँसकर] घर-घर के दरवाजे पर फिरता रहा । सूरदास कहते हैं कि नलिका पर बैठे हुए शुक को भला किसने पकड़ रखा है । (अपने बैठने के भार से नलिका के झुक जाने से सिर नीचा पैर ऊपर हो जाने पर भ्रम वह शुक स्वयं को को आबद्ध समझकर बहेलिये के आने पर उड़ नही जाता, और पकड़ा जाता है) ॥५३॥ अपनपौ आपुन ही मै पायौ । सब्दहि सब्द भयौ उजियारी, सतगुरु भेद बतायौ । ज्यौं कुरंग-नाभी कस्तूरी, ढूँढ़त फिरत भुलायौ । फिरि चितयौ जब चेतन ह्वै करि, अपनैं ही तन छायौ । राज-कुमारि कंठ-मनि-भूषन भ्रम भयौ कहूँ गँवायौ । दियौ बताइ और सखियनि तब, तनु कौ ताप नसायौ । अपने माहिं नारि कौं भ्रम भयौ बालक कहूँ हिरायौ । जागि लख्यौ, ज्यौं कौ त्यौं ही है ना कहूँ गयौ न आयौ । सूरदास समुझे को यह गति, मनहीं मन मुसुकायौ । कहि न जाइ या सुख की महिमा, ज्यौं गूँगैं गुर खायौ ॥५४॥ अर्थ—[अपना विस्मृत] आत्म-स्वरूप अपने [शरीर के] भीतर ही [फिर] उप- लब्ध हुआ । जब सद्गुरु ने मर्म बताया तो [उनके] शब्द (उपदेश नामोपदेश) से अनाहत नाद प्रकट हुआ, जो अन्तर्ज्योति (आत्म-प्रकाश) मे परिवर्तित हो गया । जैसे मृग की नाभि मे ही कस्तूरी होती है किन्तु वह [उसके बाहर होने के] भ्रम मे पड़कर [उसे चारों तरफ] ढूंढता फिरता है, किन्तु जब पुनः चेत कर विचार करता है तो [जान जाता है कि वह] अपने ही शरीर मे छिपी हुई (आच्छादित) है । राजकुमारी के कण्ठ में ही मणि-जटित आभूषण वर्तमान था किन्तु उसे भ्रम हुआ कि कही खो गया, परन्तु जब

४६ सूरसागर सार सटीक उसे अन्य सहेलियों ने बताया तब उसके शरीर (मन) का कष्ट नष्ट हुआ । स्वप्न में किसी स्त्री को भ्रम हो गया कि बच्चा कही खो गया है, किन्तु उसने जगकर देखा कि वह [पार्श्व मे] ज्यों का त्यों ही वर्तमान है, न कही गया है न कही से आया है । सूरदास जी कहते हैं कि [आत्म स्वरूप के] ज्ञान की ऐसी ही दशा है कि उसमें ज्ञानी मन ही मन मुसकरा कर रह जाता है । इस सुख की महिमा वर्णनातीत है, जैसे गूंगे द्वारा गुड के स्वाद की अभिव्यक्ति अशक्य होती है ॥५४॥

गोकुल लीला कृष्ण जन्म आनंदै आनंद बढ़यो अति । देवनि दिवि दुंदभी बजाई, सुनि मथुरा प्रगटे जादवपति । विद्याधर-किन्नर कलोल मन उपजावत मिलि कंठ अमित गति । गावत गुन गंधर्व पुलकि तन नाचतिँ सब सुर-नारि रसिक अति । बरषत सुमन सुदेस सूर सुर, जय-जयकार करत, मानत रति । सिव-विरंचि-इन्द्रादि अमर मुनि, फूले सुख न समात मुदित मति ॥१॥ अर्थ – मथुरा मे यदुपति श्री कृष्ण का प्रकट होना सुनकर देवताओं ने स्वर्ग में दुन्दुभिनाव किया ओर (चारो ओर) अत्यधिक आनन्द ही आनन्द बढ गया । विद्याधर तथा किन्नर लोग विनोदपूर्ण मन से (कलोलमन) परस्पर मिलकर (समवेत रूप में) स्व- कंठों मे (संगीत की) अमित गति (स्वर लहरियाँ) उत्पन्न करते हैं । गन्धर्व पुलकित होकर (भगवान् का) गुणगान करते हैं तथा अत्यधिक रसिक सभी देवांगनाये नृत्य कर रही हैं। सूरदास जी कहते हैं कि देवता पुष्पवृष्टि करते हैं, (भगवान् कृष्ण की) जय- जयकार करते है तथा (उनके प्रति) प्रेम-भाव प्रदर्शित करते हैं । शिव, ब्रह्मा तथा इन्द्र आदि देवता तथा ऋषि प्रसन्नमन होकर सुख से फूले नही समाते ॥१॥ देवकी मन मन चकित भई । देखहु आइ पुत्र-मुख काहे न, ऐसी कहुँ देखी न दई । सिर पर मुकुट, पीत उपरैना, भृगु-पद-उर भुज चारि धरे । पूरब कथा सुनाइ कही हरि, तुम माँग्यौ इहिँ भेष करे । छोरे निगड़, सोआए पहरू, द्वारे कौ कपाट उघरचौ । तुरत मोहिँ गोकुल पहुँचावहु, यह कहिके सिसु वेष धरचौ । तब बसुदेव उठे यह सुनतहिँ, हरषवंत नंद-भवन गए । बालक धरि, लै सुरदेवी कौँ, आइ सूर मधुपुरी ठए ॥२॥ अर्थ-देवकी मन ही मन चकित हो गयी । (उन्होने वसुदेव से कहा कि) आकर पुत्र का मुंह क्यों नही देखते, हे भगवान् ! ऐसा (विचित्र रूप) मैने कही नही देखा । (इनके) शिर पर मुकुट (सुशोभित) है तया इन्हो पीला उत्तरीय, हृदय पर भृगु के पद (चिह्न) तथा चार भुजाये धारण की है। भगवान् ने पूर्व कथा सुनाकर कहा कि "तुमने

४६ सूरसागर सार सटीक मुझे इसी वेष में मांगा था । (मैंने तुम्हारे) बन्धनों (बेड़ियो) को तोड़ दिया । पहरेदारों को सुला दिया तथा (कारावास के) किवाड़ों को खोल दिया है । तुरन्त मुझे गोकुल पहुँचा दो" ऐसा कहकर भगवान् ने शिशु रूप धारण कर लिया । यह सुनते ही वासुदेव हर्षित होकर उठे और नन्द के घर गये । सूरदास कहते हैं कि बालक (श्री कृष्ण) को (वहां रखकर सुरदेवी (नन्द कन्या) को लेकर मथुरा आ गये ॥२॥ गोकुल प्रगट भए हरि आइ । अमर-उधारन, असुर-सँहारन अंतरजामी त्रिभुवन राइ । माथैँ धरि बसुदेव जुं ल्याए, नद-महर-घर गए पहुँचाई । जागी महरि, पुत्र-मुख देख्यौ, पुलकि अंग उर मैं न समाइ । गदगद कंठ, बोल नहिं आवै, हरषवंत ह्वै नंद बुलाई । आवहु कंत, देव परसन भये, पुत्र भयौ, मुख देखौ धाइ । दौरि नद गए, सुत-मुख देख्यौ, सो सुख मोपे बरनि न जाई । सूरदास पहिलैँ ही माँग्यौ, दूध पियावन जसुमति माइ ॥३॥ अर्थ भगवान् श्रीकृष्ण गोकुल मे आकर प्रकट हुये । देवताओ का उद्धार करने वाले, असुरो का संहार करने वाले, अतर्यामी तथा त्रिभुवन पति (श्री कृष्ण) को वसुदेव मस्तक (सिर) पर रखकर लाये और बाबा नन्द के घर पहुँचा दिया । महरि (नन्दरानी) जागी, पुत्र का मुंह देखा शरीर पुलकित हो उठा और प्रसन्नता उनके हृदय मे नही समाती थी । (प्रसन्नता से) कण्ठ गदगद हो गया था, (मुंह से) शब्द नही निकल रहे थे हर्षित होकर उन्होने नन्द को बुलाया । पतिदेव आइये, देवता प्रसन्न हुए, पुत्र हुआ, दौड़कर आइए और उसका मुंह देखिये । नन्द दौड़कर गये और पुत्र का मुंह देखा, उस सुख का वर्णन मुझसे वर्णित नही किया जाता । सूरदासजी कहते है कि (कृष्ण भगवान् को पुत्र के रूप मे) यशोदा ने पहले ही मांग लिया था, अब वे उन्हे दूध पिला रही हैं ॥३॥ हौं इक नई बात सुनि आई । महरि जसोदा ढोटा जायौ, घर-घर होति बधाई । द्वारैँ भीर गोपि-गोपिनि की, महिमा बरनि न जाई । अति आनन्द होत गोकुल मैं, रतन भूमि सब छाई । नाचत वृद्ध, तरुन अरु बालक, गोरस-कीच मचाई । सूरदास स्वामी सुख-सागर, सुन्दर स्याम कन्हाई ॥४॥ अर्थ - (हे सखि) मैं एक नई बात सुन आयी हूँ । माँ यशोदा ने पुत्र जन्म दिया है तथा हर घर मे बधाइयाँ हो रही हैं । द्वार पर उपस्थित ग्वालो और गोपियो की भीड़ की महिमा का वर्णन नही किया जा सकता । गोकुल मे अत्यधिक आनन्द उत्पन्न हो रहा है तथा भूमि अब रत्नो से ढँक गई है । वृद्ध, तरुण और बालक नृत्य कर रहे हैं तथा गोरस (दूध, दही आदि) से (गोकुल मे) कीचड़ उत्पन्न कर दी है ।

गोकुल लीला ४६ सूरदास कहते हैं कि (सम्पूर्ण जगत के) स्वामी सुन्दर श्याम कृष्ण, सुख के सागर हैं ॥४॥ आजु नन्द के द्वारैं भीर। इक आवत, एक जात बिदा ह्वै, इक ठाढ़े मन्दिर कैं तीर । कोउ केसरि कौ तिलक बनावति, कोउ पहिरति कंचुकी सरीर । एकनि कौं गौ-दान समर्पत, एकनि कौं पहिरावत चीर । एकनि कौं भूषन पाटंबर, एकनि कौं जु देत नग हीर । एकनि कौं पुहुपनि की माला, एकनि कौं चन्दन घसि नीर । एकनि मथैं दूध-रोचना, एकनि कौं बोधति दै धीर । सूरदास धनि स्याम सनेही, धन्य जसोदा पुन्य-सरोर ॥५॥ अर्थ—आज नन्द के दरवाजे पर भीड़ लगी है। एक आता है, एक विदा होकर जाता है और एक मन्दिर के पास खडा रहता है। कोई केशर का तिलक रचाती है और कोई अपने अंगो पर कंचुकी (चोली) धारणा करती है। (माँ यशोदा) किसी को गोदान कर रही हैं किसी को साडी (वस्त्र) पहना रही हैं, किसी को आभूषण और रेशमी-वस्त्र तथा किसी को नग-हीरा आदि रत्न, दे रही है। किसी को पुष्पो की माला, किसी को जल मे घिस कर चंदन लगा रही है। माता यशोदा किसी के मस्तक पर दूब और गोरो- चन डालती हैं। और किसी को धैर्य देकर सम्बोधित कर रही है। सूरदास कहते है कि श्याम के स्नेही और पुण्यशरीर धारण करने वाली मां यशोदा धन्य है ॥५॥ सोभा सिंधु न अन्त रही री। नंद-भवन भरि पूरि उमँगि चलि, ब्रज की बीथिनि फिरति वही री। देखी जाइ आजु गोकुल मैं, घर-घर बेँचति फिरति दही री। कहँ लगि कहौं बनाइ बहुत विधि, कहत न मुख सहसहुँ निबही री। जसुमति-उदर-अगाध-उदधि तैं उपजी ऐसी सबनि कही री। सूरश्याम प्रभु इंद्र-नीलमनि, ब्रज-बनिता उर लाइ गही री ॥६॥ अर्थ – एक गोपी दूसरी गोपी से कहती है कि हे सखि, श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव से उत्पन्न शोभा के सागर का कोई अन्त नही रहा। नन्द के भवन को तृप्त करके उमंग मे आकर वह (शोभा) ब्रज की गलियो मे वह रही है। आज मैंने घर-घर जाकर दही बेचते समय (गोकुल मे इस अपूर्व शोभा) को देखा। मैं उसका (शोभा का) वर्णन किस प्रकार अनेक प्रकार से करूँ। हजारो मुखो से भी प्रशंसा करने पर उसका (उस शोभा के वर्णन का) निर्वाह नही किया जा सकता। ऐसा सभी ने कहा कि (वह शोभा) यशोदा के उदररूपी अगाध समुद्र से उत्पन्न हुयी है। सूरदास कहते है कि इन्द्रनीलमणि के समान भगवान् को ब्रजांगनाओ ने हृदय से लगा कर पकड़ रखा है ॥६॥ ४

५० सूरसागर सार सटीक शैशव चरित्र जसोदा हरि पालनै झुलावै । हलरावै, दुलराइ मल्हावै, जोइ-सोइ कछू गावै । मेरे लाल कौं आउ निँदरिया, काहैं न आनि सुवावै । तू काहैं नहिं वेगहिं आवै, तोकों कान्ह बुलावै । कबहुँक पलक हरि मूँदि लेत हैं, कबहुँ अधर फरकावै । सोवत जानि मौन ह्वै रहि, करि करि सैन बतावै । इहिं अन्तर अकुलाइ उठे हरि, जसुमति मधुरैं गावै । जो सुख सूर अमर-मुनि दुरलभ, सो नंद भामिनि पावै ॥७॥ अर्थ — यशोदा भगवान् (कृष्ण) को पालने मे झुला रही हैं। वे उन्हे हिलाती हैं, दुलराती हुई मल्हारती हैं तथा जैसा-तैसा कुछ गाती हैं, यशोदा गाती हुई कहती हैं कि नीद मेरे लाल के पास आओ, क्यो नही (यहाँ) आकर (इन्हे) सुलाती है। तू जल्दी क्यो नही आती, तुझे कृष्ण बुला रहे हैं। कभी भगवान् (कृष्ण) पलके बन्द कर लेते है, कभी होठ फडफड़ाने लगते हैं। उन्हे सोता हुआ समझकर (मां यशोदा) मौन होकर इशारे से बताती है। इसी बीच भगवान् व्याकुल हो उठे और यशोदा जी पुनः मधुर गीत गाने लगती है। सूरदास जी कहते हैं कि जो सुख देवताओं और मुनियो को भी दुर्लभ है उसे नन्द-पत्नी (यशोदा) प्राप्त कर रही है ॥७॥ कपट करि ब्रजहिँ पूतना आई । अति सुरूप, विष अस्तन लाए, राजा कस पठाई । मुख चूमति अरु नैन निहारति, राखति कठ लगाई । भाग बड़े तुम्हरे नन्दरानी, जिहिँ के कुँवर कन्हाई । कर गहि छीर पियावति अपनी, जानत केसवराई । बाहर ह्वैं कै असुर पुकारी, अब बलि लेहु छुड़ाई । गइ मुरछाइ, परी धरनी पर, मनौ भुवंगम खाई । सूरदास प्रभु तुम्हरी लीला, भक्तनि गाइ सुनाई ॥८॥ अर्थ—पूतना कपट रूप धारण करके ब्रज मे आयी। राजा कंस द्वारा भेजी गयी वह बहुत रूपवती तथा विषाक्त स्तनों युक्त होकर आयी थी। वह भगवान् कृष्ण के मुख का चुम्बन लेती, उनके नेत्रों को देखती और उन्हें गले से लगा लेती। (कृष्ण के प्रति इस प्रकार झूठा प्रेम दिखाकर वह बोली नन्दरानी तुम्हारे भाग्य प्रबल है — जिसके कृष्ण जैसा कुमार है। वह उन्हे अपने हाथ मे लेकर अपना दूध पिलाने लगी। श्रीकृष्ण सब कुछ जानते थे) । बाहर होकर राक्षसी ने पुकारा कि हे बलि (दैत्यराज) अब मुझे छुड़ा लो। अथवा (हे कृष्ण मैं तुम्हारी बलिहारी हूँ मुझे छोड़ दो) वह मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी मानो उसे सांप ने काट लिया हो। सूरदास जी कहते हैं हे भगवान् आपकी लीला को भक्तो ने गाकर सुनाया ॥८॥